वाशिंगटन,25 नवंबर (युआईटीवी)- अमेरिकी राजनीति में इन दिनों एच-1बी वीज़ा को लेकर गहमागहमी तेज़ है। इसी बीच व्हाइट हाउस ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों और उनकी वीज़ा नीति का बचाव करते हुए कहा है कि इस मुद्दे पर राष्ट्रपति का रुख न तो कट्टर है और न ही एकतरफा,बल्कि पूरी तरह संतुलित और सामान्य समझ पर आधारित है। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने सोमवार को पत्रकारों से बातचीत में कहा कि कई लोग राष्ट्रपति ट्रंप की सोच को ठीक से समझ नहीं पा रहे हैं। उनका कहना है कि ट्रंप विदेशी कामगारों को पूरी तरह रोकने के पक्ष में नहीं हैं,बल्कि वे एक स्पष्ट व्यवस्था चाहते हैं,जिसमें शुरुआती चरण में विदेशी विशेषज्ञों की मदद से उद्योगों की नींव रखी जा सके और बाद में इन उद्योगों में अमेरिकी नागरिकों को रोज़गार के अवसर मिलें।
कैरोलिन लेविट ने कहा कि राष्ट्रपति की नीति का मकसद अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब कोई बड़ी कंपनी अमेरिका में कारखाना स्थापित करती है,तो शुरुआत में उसे विशेषज्ञ कर्मचारियों की आवश्यकता होती है,जो तकनीकी रूप से उस परियोजना को जमीन पर उतार सकें। ऐसे विशेषज्ञ कई बार विदेशों से आते हैं और ट्रंप मानते हैं कि यह उद्योगों की शुरुआती ज़रूरत है,लेकिन जैसे-जैसे ये परियोजनाएँ आगे बढ़ती हैं,वहाँ स्थानीय अमेरिकी कामगारों को नियुक्त किया जाना चाहिए। व्हाइट हाउस के अनुसार,राष्ट्रपति का उद्देश्य अमेरिकी नौकरी बाजार में स्थायी और दीर्घकालिक प्रभाव पैदा करना है,ताकि देश की युवा पीढ़ी और स्थानीय कामगारों को अधिक अवसर मिलें।
यह बयान ऐसे समय पर आया है जब कुछ दिनों पहले ही ट्रंप ने लीगल इमिग्रेशन को समर्थन देने की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि अमेरिका टेक इंडस्ट्री में उच्च स्तरीय विशेषज्ञता के क्षेत्र में दुनिया भर से “हजारों लोगों” का स्वागत करेगा। उन्होंने अरबों डॉलर की लागत से एरिज़ोना में स्थापित होने वाले बड़े कंप्यूटर चिप कारखाने का उदाहरण देते हुए कहा था कि कंपनियाँ बेरोजगारों की लाइन में लगे लोगों को उठा कर ऐसे उच्च विशेषज्ञता वाले उद्योगों में नहीं लगा सकतीं। ऐसे उद्योगों की स्थापना और संचालन के लिए शुरूआती चरण में विदेशी विशेषज्ञों की आवश्यकता पड़ती है,जो न केवल मशीनों को चलाने और उत्पादन प्रक्रिया को संभालने में मदद करते हैं,बल्कि अमेरिकी कामगारों को इन तकनीकों का प्रशिक्षण भी देते हैं।
ट्रंप ने कहा था कि विदेशी वर्कफोर्स अमेरिकी कर्मचारियों को “कंप्यूटर चिप्स और दूसरी चीजें” बनाना सिखाएगी और यह लंबे समय में अमेरिका के हित में होगा। उन्होंने यह भी माना कि वीज़ा नीति में किए जा रहे कुछ बदलावों को लेकर उन्हें अपने समर्थकों की आलोचना का सामना करना पड़ सकता है,लेकिन वे मानते हैं कि यह देश के भविष्य के लिए आवश्यक है।
हालाँकि,ट्रंप के इन बयानों के बाद देश में तीखी राजनीतिक बहस छिड़ गई है। कई रिपब्लिकन नेता एच-1बी वीज़ा कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने की माँग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि विदेशी कामगार अमेरिकी नौकरियों पर कब्जा कर लेते हैं और यह कार्यक्रम बड़ी टेक कंपनियों द्वारा वर्षों से दुरुपयोग किया जा रहा है। नए एच-1बी वीज़ा नियमों को लेकर पहले ही कई सांसदों ने विरोध जताया है और इन प्रावधानों के खिलाफ अदालतों में मुकदमे भी दाखिल किए जा चुके हैं।
कुछ दिन पहले ही व्हाइट हाउस ने आईएएनएस को बताया था कि नए एच-1बी आवेदन पर 100,000 डॉलर शुल्क लगाना इस प्रणाली के दुरुपयोग को रोकने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। व्हाइट हाउस के प्रवक्ता टेलर रोजर्स ने कहा था कि राष्ट्रपति ट्रंप ने आव्रजन कानूनों को सख्त बनाने और अमेरिकी कामगारों को प्राथमिकता देने के लिए जितना प्रयास किया है,उतना आधुनिक समय में किसी और अमेरिकी राष्ट्रपति ने नहीं किया।
एच-1बी वीज़ा को लेकर ट्रंप प्रशासन के भीतर एक दोहरी रणनीति दिखाई दे रही है,एक तरफ वह विदेशी विशेषज्ञों को शुरुआती औद्योगिक जरूरतों के लिए आवश्यक मानता है,जबकि दूसरी ओर वह अमेरिकी कामगारों को दीर्घकालिक प्राथमिकता देने की नीति पर कायम दिखता है। इससे यह संकेत मिलता है कि आने वाले दिनों में वीज़ा नीति में और परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं। उद्योग जगत,राजनीतिक दलों, इमिग्रेशन समर्थकों और अमेरिकी आम जनता के बीच इस मुद्दे पर बहस अभी और तेज़ होने की संभावना है।
