भारतीय चुनाव आयोग

मतदाता सूची की सुनवाई में बीएलए की अनुमति पर विवाद,ईसीआई ने स्पष्ट किया अपना रुख

कोलकाता,2 जनवरी (युआईटीवी)- पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के मसौदे पर दावों और आपत्तियों से जुड़ी सुनवाई को लेकर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस द्वारा बूथ-स्तरीय एजेंटों (बीएलए) को सुनवाई सत्र में शामिल करने की माँग खारिज किए जाने के बाद,भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने अपने रुख को साफ करते हुए कहा है कि यह निर्णय व्यावहारिक कारणों से लिया गया है और इसका किसी राजनीतिक दल को लाभ या नुकसान पहुँचाने से कोई संबंध नहीं है। आयोग से जुड़े सूत्रों के अनुसार,मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) के दूसरे चरण में चल रही इस प्रक्रिया का उद्देश्य पारदर्शिता और समयबद्धता सुनिश्चित करना है और अत्यधिक लोगों की मौजूदगी सुनवाई प्रक्रिया को बाधित कर सकती है।

मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) कार्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अगर तृणमूल कांग्रेस की माँग मान ली जाती,तो राज्य की अन्य सभी रजिस्टर्ड राजनीतिक पार्टियों को भी समान अधिकार देना पड़ता। इसका मतलब यह होता कि हर सुनवाई टेबल पर इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ईआरओ),असिस्टेंट इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (एईआरओ),माइक्रो ऑब्जर्वर के साथ आठ अलग-अलग पार्टियों के प्रतिनिधि मौजूद होते। इतनी बड़ी संख्या में लोगों के बीच सुनवाई संचालित करना,दस्तावेज़ों की जाँच करना और समय पर निर्णय लेना लगभग असंभव जैसा हो जाता। यही कारण है कि आयोग ने सुनवाई सत्र में बीएलए को शामिल करने की संभावना को खारिज कर दिया।

सीईओ कार्यालय के सूत्रों ने साफ कहा कि सुनवाई के दौरान व्यवस्था और अनुशासन बनाए रखना सबसे बड़ी प्राथमिकता है। अगर हर टेबल पर 11 लोग बैठेंगे,तो न तो मतदाता अपनी बात स्पष्ट तरीके से रख पाएँगे और न ही अधिकारी स्वतंत्र और सहज तरीके से फैसले ले सकेंगे। इसलिए आयोग की ओर से यह साफ संकेत दिया गया है कि बीएलए की मौजूदगी सुनवाई प्रक्रिया को बोझिल बना सकती है और इससे मतदाता सूची तैयार करने का असल मकसद प्रभावित होगा।

राज्य की राजनीतिक पृष्ठभूमि को देखते हुए तृणमूल कांग्रेस के इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया भी काफी आक्रामक रही है। पार्टी नेतृत्व का आरोप है कि निर्वाचन आयोग ने जानबूझकर उनकी याचिका खारिज की,क्योंकि उसे पता है कि अन्य दल,विशेषकर भाजपा,हर बूथ के लिए बीएलए तैनात करने की क्षमता नहीं रखते। तृणमूल कांग्रेस के अनुसार,अगर उनकी माँग स्वीकार कर ली जाती,तो वे सुनवाई प्रक्रिया के हर चरण में सक्रिय भागीदारी कर पाते और मतदाता सूची से जुड़े संभावित विवादों पर अधिक बारीकी से नजर रख सकते थे।

हालाँकि,आयोग के सूत्रों ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया। उनका कहना है कि ईसीआई किसी भी पार्टी की संगठनात्मक ताकत या सीमाओं का आकलन करके नियम तय नहीं कर सकता। मतदाता सूची जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में समान नियम और पारदर्शी व्यवस्था ही सभी राजनीतिक दलों और मतदाताओं के विश्वास को बनाए रखती है। सूत्रों के मुताबिक, “निर्वाचन आयोग को ऐसे नियम बनाने होते हैं,जो सभी पर समान रूप से लागू हों और जिन्हें बिना किसी बाधा के पूरे राज्य में लागू किया जा सके। इसीलिए बीएलए के प्रवेश पर रोक का फैसला किसी एक पार्टी को ध्यान में रखकर नहीं,बल्कि पूरी चुनावी व्यवस्था को सुचारु रखने के लिए लिया गया है।”

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक दो मान्यता प्राप्त राज्य पार्टियाँ हैं,जबकि भाजपा,कांग्रेस,सीपीआईएम,आम आदमी पार्टी,बहुजन समाज पार्टी और नेशनल पीपल्स पार्टी (एनपीपी) राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त दल हैं। अगर सभी को सुनवाई सत्र में बीएलए भेजने की अनुमति दी जाती,तो राज्यभर में हजारों सुनवाई केंद्रों पर बेहद जटिल और लंबी प्रक्रियाएँ चलतीं, जिससे समय सीमा का पालन करना मुश्किल हो जाता।

इस बीच, ड्राफ्ट मतदाता सूची 16 दिसंबर को प्रकाशित की जा चुकी है। इसके बाद दावों और आपत्तियों की प्रक्रिया तेज़ी से आगे बढ़ रही है। निर्वाचन आयोग के कार्यक्रम के अनुसार,अंतिम मतदाता सूची 14 फरवरी को जारी की जाएगी। इसके तुरंत बाद उम्मीद की जा रही है कि आयोग राज्य विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा करेगा। इसलिए मौजूदा चरण में पारदर्शिता और दक्षता दोनों ही चुनावी तैयारियों के लिए बेहद अहम मानी जा रही हैं।

चुनावी पर्यवेक्षकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से जुड़े विवाद नए नहीं हैं,लेकिन इस बार आयोग का रुख स्पष्ट और सख्त दिखाई दे रहा है। वह किसी भी राजनीतिक दबाव के आगे झुके बिना प्रक्रियागत नियमों पर कायम रहना चाहता है। वहीं,राजनीतिक पार्टियाँ भी मतदाता सूची को भविष्य के चुनावी नतीजों से जोड़कर देखती हैं,इसलिए हर फैसला राजनीतिक बहस को जन्म देता है।

फिलहाल,ईसीआई का तर्क यही है कि सुनवाई सत्र में बीएलए को शामिल करने से व्यवस्था बिगड़ सकती है और इससे मतदाताओं की शिकायतों का समाधान करने में देरी होगी। दूसरी ओर,तृणमूल कांग्रेस इस निर्णय को अपने खिलाफ “पक्षपातपूर्ण रवैया” बताकर राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है। आने वाले दिनों में यह बहस और तेज़ हो सकती है,लेकिन आयोग फिलहाल अपने निर्णय पर अडिग दिख रहा है और उसका जोर इस बात पर है कि मतदाता सूची की प्रक्रिया बिना किसी व्यवधान के और समय पर पूरी हो सके,ताकि राज्य में होने वाले चुनाव सुचारु और निष्पक्ष तरीके से संपन्न कराए जा सकें।