रुपए में बड़ी गिरावट (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

रुपए में बड़ी गिरावट: डॉलर के मुकाबले 95 के पार फिसला,कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से बढ़ी चिंता

मुंबई,30 अप्रैल (युआईटीवी)- अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बढ़ती अस्थिरता और मध्य पूर्व में गहराते तनाव के बीच गुरुवार को भारतीय मुद्रा पर दबाव साफ नजर आया। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होकर 95 के स्तर के पार फिसल गया,जिसने निवेशकों और अर्थशास्त्रियों के बीच चिंता बढ़ा दी है। दिन की शुरुआत में रुपया 94.82 के स्तर पर खुला,लेकिन शुरुआती कारोबार में ही इसमें तेज गिरावट दर्ज की गई और सुबह करीब 11:15 बजे यह 0.50 प्रतिशत गिरकर 95.29 तक पहुँच गया। यह गिरावट ऐसे समय आई है,जब वैश्विक आर्थिक माहौल पहले से ही अनिश्चितताओं से घिरा हुआ है।

विशेषज्ञों के अनुसार,रुपए में इस कमजोरी की सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव है,जिसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी ने भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए स्थिति को और जटिल बना दिया है। ब्रेंट क्रूड का दाम 6 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 125 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुँच गया है,जो पिछले चार वर्षों का उच्चतम स्तर है। वहीं डब्ल्यूटीआई क्रूड भी 3 प्रतिशत से ज्यादा बढ़कर 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चला गया है।

कच्चे तेल की कीमतों में इस उछाल का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है,क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। जब तेल महँगा होता है,तो आयात बिल बढ़ता है और इससे चालू खाता घाटा बढ़ने की आशंका रहती है। यही कारण है कि रुपए पर दबाव और अधिक बढ़ जाता है। इसके अलावा,महँगाई बढ़ने की संभावना भी प्रबल हो जाती है,जिससे आम जनता की जेब पर असर पड़ता है।

रुपए में गिरावट के पीछे एक और अहम कारण अमेरिकी मौद्रिक नीति को भी माना जा रहा है। फेडरल रिजर्व ने हाल ही में अपनी ब्याज दरों को 3.5 से 3.75 प्रतिशत के बीच स्थिर बनाए रखने का फैसला किया है। हालाँकि,यह निर्णय स्थिरता का संकेत देता है,लेकिन इसके साथ ही फेड ने यह भी कहा है कि मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण महँगाई का दबाव बढ़ सकता है। इस बयान के बाद डॉलर मजबूत हुआ है,जिससे उभरते बाजारों की मुद्राओं,खासकर रुपए पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

वर्ष 2026 की शुरुआत से अब तक रुपए में डॉलर के मुकाबले करीब 5.93 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की जा चुकी है। यह आँकड़ा इस बात का संकेत है कि वैश्विक आर्थिक परिस्थितियाँ भारतीय मुद्रा के लिए अनुकूल नहीं हैं। निवेशक सुरक्षित निवेश के विकल्प के रूप में डॉलर की ओर रुख कर रहे हैं,जिससे डॉलर की माँग बढ़ रही है और रुपया कमजोर हो रहा है।

इस बीच अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि जब तक परमाणु समझौते पर कोई सहमति नहीं बनती,तब तक ईरान के बंदरगाहों पर नौसैनिक नाकेबंदी जारी रहेगी। दूसरी ओर ईरानी अधिकारियों ने भी किसी तरह के समझौते के संकेत नहीं दिए हैं,जिससे स्थिति और अधिक जटिल होती जा रही है। इस टकराव का असर वैश्विक बाजारों पर साफ दिखाई दे रहा है।

रुपए में गिरावट और तेल की कीमतों में तेजी का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी पड़ा है। प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी दोनों में 1 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है। निवेशकों में अनिश्चितता और जोखिम से बचने की प्रवृत्ति बढ़ने के कारण बाजार में बिकवाली का दबाव बना हुआ है। खासतौर पर तेल और ऊर्जा से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में ज्यादा उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है।

आर्थिक जानकारों का मानना है कि यदि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तनाव कम नहीं हुआ,तो आने वाले दिनों में रुपए पर दबाव और बढ़ सकता है। इसके साथ ही महँगाई और चालू खाता घाटे की स्थिति भी बिगड़ सकती है। हालाँकि,भारतीय रिजर्व बैंक स्थिति पर नजर बनाए हुए है और जरूरत पड़ने पर बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है,लेकिन वैश्विक कारकों के सामने उसकी भूमिका सीमित हो जाती है।

रुपए में आई यह गिरावट केवल एक दिन की घटना नहीं है,बल्कि यह वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों का परिणाम है। जब तक अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम नहीं होता और कच्चे तेल की कीमतें स्थिर नहीं होतीं,तब तक भारतीय मुद्रा पर दबाव बना रह सकता है। ऐसे में निवेशकों और नीति निर्माताओं दोनों को सतर्क रहने की जरूरत है,ताकि संभावित आर्थिक जोखिमों से निपटा जा सके।