राँची,21 अगस्त (युआईटीवी)- झारखंड में विभिन्न सरकारी पदों पर नियुक्ति से जुड़ी 22 परीक्षाओं और उनसे हुई नियुक्तियों को एक साथ रद्द करने के राज्य सरकार के फैसले की कानूनी वैधता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने सरकार की कार्रवाई पर तत्काल रोक लगाते हुए नियमित नियुक्तियों को बिना व्यक्तिगत जाँच और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए समाप्त करने के तरीके पर महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। गुरुवार को तीन अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई के बाद अदालत ने 11वीं से 13वीं झारखंड लोक सेवा आयोग संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा और फूड सेफ्टी ऑफिसर भर्ती से संबंधित नियुक्तियों को रद्द करने के फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी।
हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किए गए अंतरिम आदेश के बाद यह मामला और महत्वपूर्ण हो गया है। अदालत ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया है कि यदि किसी भर्ती प्रक्रिया में अनियमितता या भ्रष्टाचार के आरोप सामने आते हैं,तो उसकी जाँच जरूरी है, लेकिन केवल इस आधार पर कि पूरी प्रक्रिया में गड़बड़ी की आशंका है,क्या उस प्रक्रिया के जरिए नियुक्त सभी अभ्यर्थियों की नियुक्तियां बिना व्यक्तिगत जाँच के समाप्त की जा सकती हैं,यह एक अलग कानूनी सवाल है। इसी मुद्दे को अदालत ने गंभीरता से उठाया है।
न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने सरकार से भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की जाँच की पूरी स्थिति और अब तक हुई कार्रवाई का विस्तृत ब्योरा माँगा है। अदालत यह जानना चाहती है कि जाँच कहाँ तक पहुँची है,किन लोगों के खिलाफ क्या सामग्री सामने आई है और सरकार ने नियुक्तियों को रद्द करने का निर्णय किन तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर लिया। मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को होगी। इस सुनवाई में सरकार की ओर से जाँच की स्थिति और अपने फैसले के समर्थन में विस्तृत जवाब पेश किए जाने की संभावना है।
अदालत की शुरुआती टिप्पणियों का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने कहा है कि नियमित नियुक्तियों को बिना संबंधित व्यक्तियों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिए समाप्त नहीं किया जा सकता। यदि किसी अभ्यर्थी की नियुक्ति नियमित प्रक्रिया के बाद हुई है और बाद में भर्ती में अनियमितता का आरोप सामने आता है,तो यह देखना जरूरी होगा कि उस अभ्यर्थी की व्यक्तिगत भूमिका क्या थी। केवल भर्ती प्रक्रिया पर सामूहिक आरोप होने के आधार पर सभी नियुक्त व्यक्तियों को समान रूप से दोषी मान लेना कानूनी रूप से उचित है या नहीं,अदालत इसी सवाल की जाँच कर रही है।
फूड सेफ्टी ऑफिसर के पदों पर हुई नियुक्तियों से जुड़े मामले में अदालत ने विशेष रूप से कहा कि फिलहाल सरकार के पास ऐसा कोई स्पष्ट आधार या सामग्री दिखाई नहीं देती, जिससे यह निर्धारित किया जा सके कि कौन-कौन से अभ्यर्थी कथित भ्रष्टाचार या अनियमितता में शामिल थे। ऐसे में यदि भर्ती प्रक्रिया में बड़े स्तर पर गड़बड़ी हुई भी है,तो क्या उसमें शामिल प्रत्येक अभ्यर्थी की नियुक्ति स्वतः समाप्त की जा सकती है,यह महत्वपूर्ण प्रश्न है।
सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि विभिन्न नागरिकों की शिकायतों के आधार पर सीआईडी ने मामले की गहन जाँच शुरू की है। जाँच के दौरान कुछ गिरफ्तारियाँ भी हुई हैं। सरकार का तर्क है कि भर्ती प्रक्रिया में गंभीर और व्यापक स्तर पर अनियमितताएँ सामने आई हैं। इसी आधार पर सरकार ने पूरी प्रक्रिया और उससे संबंधित नियुक्तियों को रद्द करने का निर्णय लिया। सरकार की ओर से यह भी संकेत दिया गया कि यदि भर्ती प्रक्रिया ही दूषित हो गई हो तो उसके आधार पर हुई नियुक्तियों को बनाए रखना प्रशासनिक और कानूनी रूप से उचित नहीं होगा।
हालाँकि,अदालत ने सरकार के इस तर्क और नियुक्तियाँ रद्द करने के तरीके के बीच अंतर किया है। अदालत ने यह माना है कि परीक्षा में गड़बड़ी की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता और इस मामले में जाँच भी चल रही है,लेकिन जाँच के अंतिम निष्कर्ष आने से पहले उन सभी अभ्यर्थियों की नियुक्तियाँ कैसे समाप्त की जा सकती हैं, जिनके खिलाफ व्यक्तिगत रूप से कोई आरोप या आपराधिक भूमिका सामने नहीं आई है, यह सवाल अदालत के सामने महत्वपूर्ण बना हुआ है।
11वीं से 13वीं जेपीएससी संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा से संबंधित मामले में भी अदालत ने पहली नजर में माना कि नियमित नियुक्तियों को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए बिना प्रभावित नहीं किया जा सकता। जिन अभ्यर्थियों ने चयन प्रक्रिया पूरी की, परीक्षा उत्तीर्ण की और उसके बाद नियमित नियुक्ति प्राप्त की,उन्हें सेवा से हटाने से पहले यह निर्धारित करना आवश्यक है कि उनकी नियुक्ति में उनकी स्वयं की कोई भूमिका थी या नहीं। यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ कोई व्यक्तिगत आरोप नहीं है,तो केवल सामूहिक रूप से परीक्षा में अनियमितता का हवाला देकर उसकी नियुक्ति समाप्त करना न्यायिक समीक्षा के दायरे में आएगा।
अदालत ने सरकार की ओर से जारी अधिसूचना को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत को प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत हुआ कि अधिसूचना में नियुक्तियाँ रद्द करने के इस कदम को पर्याप्त रूप से उचित ठहराने वाले तथ्य स्पष्ट नहीं हैं। हालाँकि,हाईकोर्ट ने यह नहीं कहा है कि परीक्षा में कोई गड़बड़ी हुई ही नहीं। इसके विपरीत,अदालत ने माना है कि परीक्षा से जुड़ी अनियमितताओं की जाँच का आधार मौजूद है और जाँच जारी है,लेकिन जाँच का होना और जाँच पूरी होने से पहले सभी नियुक्तियों को समाप्त कर देना दो अलग-अलग प्रश्न हैं।
यही अंतर इस पूरे मामले का केंद्रीय कानूनी मुद्दा बन गया है। यदि जाँच के दौरान कुछ अभ्यर्थियों,अधिकारियों या अन्य व्यक्तियों की भूमिका सामने आती है,तो उनके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है,लेकिन जिन अभ्यर्थियों के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष आरोप नहीं है,उनके अधिकारों और नौकरी की सुरक्षा का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है। हाईकोर्ट का अंतरिम आदेश इसी संतुलन को ध्यान में रखते हुए सामने आया है।
झारखंड हाईकोर्ट के अधिवक्ता योगेंद्र यादव के अनुसार,अदालत ने अंतरिम राहत देने के दौरान ‘बैलेंस ऑफ कन्वीनियंस’ यानी सुविधा के संतुलन और ‘पब्लिक इंटरेस्ट’ यानी जनहित को भी महत्वपूर्ण माना। जेपीएससी से जुड़े मामले में अदालत ने माना कि याचिकाकर्ताओं को प्रभावी रूप से बिना पर्याप्त विधिक प्रक्रिया का पालन किए सेवा से हटा दिया गया है। ऐसी स्थिति में अंतरिम संरक्षण देना न्यायहित में आवश्यक है।
अदालत की ओर से जनहित को लेकर की गई टिप्पणी भी महत्वपूर्ण है। यदि नियमित रूप से नियुक्त अधिकारी केवल एक प्रशासनिक अधिसूचना के आधार पर अपनी नौकरी खो देते हैं और उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं मिलता,तो इससे न केवल संबंधित कर्मचारियों और अधिकारियों पर असर पड़ता है,बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर,यदि वास्तव में भर्ती प्रक्रिया में गंभीर भ्रष्टाचार हुआ है तो दोषियों को बचाना भी जनहित के खिलाफ होगा। इसलिए अदालत के सामने चुनौती यह है कि दोनों पक्षों के अधिकारों और हितों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
हाईकोर्ट के आदेश का अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने 11वीं से 13वीं जेपीएससी परीक्षा या फूड सेफ्टी ऑफिसर भर्ती की नियुक्तियों को अंतिम रूप से वैध घोषित कर दिया है। अदालत ने केवल सरकार के उस निर्णय के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगाई है, जिसके तहत नियुक्तियों को समाप्त किया गया था। मामले की अंतिम वैधता पर फैसला आगे की सुनवाई और सरकार द्वारा पेश किए जाने वाले दस्तावेजों,जाँच रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों के आधार पर होगा।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि याचिकाकर्ताओं को संबंधित आपराधिक मामले में ट्रायल कोर्ट के अंतिम फैसले का पालन करना होगा। इसके लिए उन्हें शपथपत्र या अंडरटेकिंग देने को कहा गया है। इसका मतलब यह है कि यदि आपराधिक जाँच या मुकदमे के दौरान किसी नियुक्त व्यक्ति के खिलाफ ऐसा अंतिम निष्कर्ष सामने आता है, जिससे उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई जरूरी हो जाती है,तो सरकार कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र रहेगी।
इस व्यवस्था से फिलहाल सैकड़ों नियुक्त अधिकारियों और कर्मचारियों को तत्काल राहत मिली है। सरकार के नियुक्तियाँ समाप्त करने के फैसले के कारण जिन लोगों की नौकरी पर संकट खड़ा हो गया था,उन्हें अंतरिम आदेश के बाद फिलहाल संरक्षण मिल गया है। हालांकि यह राहत अंतिम नहीं है। आगे की जाँच और अदालत की अंतिम सुनवाई इस मामले की दिशा तय करेगी।
पूरे विवाद का एक बड़ा सवाल यह भी है कि यदि परीक्षा में अनियमितता साबित होती है तो उसका दायरा क्या होगा। क्या पूरी परीक्षा को दूषित मानते हुए सभी नियुक्तियों को समाप्त करना उचित होगा या जाँच के जरिए वास्तविक दोषियों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई करते हुए निर्दोष अभ्यर्थियों की नियुक्तियाँ बचाई जा सकती हैं? यह प्रश्न केवल झारखंड की इन भर्तियों तक सीमित नहीं है,बल्कि भर्ती परीक्षाओं में कथित पेपर लीक, नकल,फर्जीवाड़ा या अन्य अनियमितताओं के मामलों में व्यापक कानूनी महत्व रखता है।
सरकार की दलील है कि यदि भर्ती प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई है,तो पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठता है। ऐसी स्थिति में केवल कुछ लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने से भर्ती की मूल विश्वसनीयता बहाल नहीं हो सकती। वहीं याचिकाकर्ताओं का पक्ष यह है कि यदि किसी व्यक्ति ने स्वयं किसी अनियमितता में हिस्सा नहीं लिया और वह निर्धारित प्रक्रिया से चयनित होकर नियुक्त हुआ है,तो उसकी नौकरी केवल सामूहिक आरोप के आधार पर समाप्त नहीं की जानी चाहिए।
यही कारण है कि अब 15 सितंबर की सुनवाई पर सबकी निगाहें रहेंगी। सरकार को अदालत के सामने जाँच की विस्तृत स्थिति,गिरफ्तारियों का विवरण,सामने आए साक्ष्य और नियुक्तियाँ रद्द करने के आधार से जुड़े दस्तावेज रखने होंगे। अदालत इन तथ्यों के आधार पर यह देखेगी कि सरकार की कार्रवाई कानून और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप थी या नहीं।
इस मामले का असर झारखंड की भर्ती व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। राज्य में सरकारी नौकरियों को लेकर पहले से ही अभ्यर्थियों के बीच परीक्षा की पारदर्शिता और नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर संवेदनशीलता बनी हुई है। ऐसे में 22 परीक्षाओं को एक साथ रद्द करने का फैसला और उसके बाद हाईकोर्ट की रोक ने भर्ती प्रक्रिया की वैधानिकता और प्रशासनिक निर्णय लेने के तरीके पर बहस को और तेज कर दिया है।
फिलहाल हाईकोर्ट का अंतरिम आदेश नियुक्त अभ्यर्थियों के लिए बड़ी राहत के रूप में सामने आया है,लेकिन अदालत ने जाँच के रास्ते बंद नहीं किए हैं। यदि जाँच में किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत संलिप्तता सामने आती है या आपराधिक मामले में उसके खिलाफ अंतिम फैसला आता है,तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। इसलिए इस आदेश को नियुक्तियों की अंतिम जीत के रूप में देखना जल्दबाजी होगी।
अब इस पूरे मामले का भविष्य सरकार की जाँच और 15 सितंबर को होने वाली अगली सुनवाई पर निर्भर करेगा। सबसे अहम सवाल यही रहेगा कि कथित परीक्षा अनियमितताओं के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान किस तरह की जाती है और क्या दोषियों तथा निर्दोष अभ्यर्थियों के बीच कानूनी रूप से स्पष्ट अंतर किया जा सकता है। झारखंड हाईकोर्ट की अंतरिम टिप्पणी ने फिलहाल सरकार के सामूहिक कार्रवाई वाले फैसले पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं और यह संकेत दिया है कि नियुक्तियाँ समाप्त करने जैसे कठोर कदम के लिए व्यक्तिगत अधिकारों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
