मुंबई,1 सितंबर (युआईटीवी)- भारतीय अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2026-27 की शुरुआत मजबूत आर्थिक वृद्धि के साथ की है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून के बीच देश की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई। यह पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में दर्ज 6.9 प्रतिशत की वृद्धि दर से 0.9 प्रतिशत अधिक है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की ओर से सोमवार को जारी आँकड़ों ने भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत गति को रेखांकित किया है।
सरकारी आँकड़ों के मुताबिक,पहली तिमाही में वास्तविक जीडीपी वृद्धि के साथ-साथ मौजूदा कीमतों पर आधारित नाममात्र जीडीपी में भी उल्लेखनीय तेजी देखने को मिली है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में नाममात्र जीडीपी की वृद्धि दर 10.3 प्रतिशत रही, जबकि वित्त वर्ष 2025-26 की इसी तिमाही में यह 8.1 प्रतिशत थी। इस तरह नाममात्र जीडीपी की वृद्धि में भी पिछले साल की तुलना में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है।
अर्थव्यवस्था के समग्र प्रदर्शन को समझने के लिए सकल मूल्य वर्धन यानी जीवीए के आँकड़े भी महत्वपूर्ण हैं। पहली तिमाही में वास्तविक जीवीए 8.2 प्रतिशत की दर से बढ़ा। वहीं,मौजूदा कीमतों पर नाममात्र जीवीए की वृद्धि दर 11.5 प्रतिशत रही। जीवीए अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों की वास्तविक आर्थिक गतिविधियों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और इसके आँकड़े बताते हैं कि देश के उत्पादन से जुड़े क्षेत्रों में भी गतिविधियाँ मजबूत बनी हुई हैं।
पहली तिमाही में आर्थिक विकास को सबसे बड़ा सहारा सेवा क्षेत्र से मिला। तृतीयक क्षेत्र की वृद्धि दर 10 प्रतिशत रही। देश की अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र का योगदान लगातार महत्वपूर्ण बना हुआ है और इस तिमाही में भी इसी क्षेत्र ने समग्र विकास दर को ऊँचाई देने में प्रमुख भूमिका निभाई। सेवा क्षेत्र के भीतर वित्त,रियल एस्टेट, सूचना प्रौद्योगिकी और पेशेवर सेवाओं ने विशेष रूप से शानदार प्रदर्शन किया।
इन क्षेत्रों में पहली तिमाही के दौरान 12.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। वित्तीय गतिविधियों के विस्तार,रियल एस्टेट में गतिविधियों और सूचना प्रौद्योगिकी तथा पेशेवर सेवाओं की मजबूत माँग ने सेवा क्षेत्र को गति देने में मदद की। वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत के सेवा क्षेत्र का मजबूत प्रदर्शन अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
द्वितीयक क्षेत्र ने भी पहली तिमाही में अच्छी वृद्धि दर्ज की। स्थिर कीमतों पर इस क्षेत्र की विकास दर 8.6 प्रतिशत रही। औद्योगिक और विनिर्माण गतिविधियों के साथ निर्माण क्षेत्र से जुड़ी गतिविधियाँ अर्थव्यवस्था की वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। दूसरी ओर, प्राथमिक क्षेत्र की वृद्धि दर 2.9 प्रतिशत रही। कृषि और इससे जुड़े क्षेत्रों ने इस दौरान 3.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की।
कृषि क्षेत्र की वृद्धि सेवा और औद्योगिक क्षेत्र की तुलना में भले ही कम रही हो, लेकिन ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए इसका प्रदर्शन महत्वपूर्ण है। कृषि क्षेत्र में वृद्धि का सीधा असर ग्रामीण आय,रोजगार और निजी उपभोग पर पड़ता है। ऐसे में आने वाली तिमाहियों में कृषि गतिविधियों का प्रदर्शन अर्थव्यवस्था की समग्र गति के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।
पहली तिमाही के आँकड़ों में निवेश से जुड़ा प्रदर्शन भी खास तौर पर उल्लेखनीय रहा। सकल स्थिर पूँजी निर्माण यानी जीएफसीएफ की वृद्धि दर 11.9 प्रतिशत रही। पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में यह वृद्धि दर महज 5.8 प्रतिशत थी। इस तरह एक साल के भीतर स्थिर पूँजी निर्माण की वृद्धि में काफी तेजी आई है। इससे संकेत मिलता है कि अर्थव्यवस्था में निवेश गतिविधियों ने गति पकड़ी है और उत्पादन क्षमता बढ़ाने से जुड़े खर्च में भी मजबूती आई है।
निवेश के साथ-साथ देश में निजी उपभोग व्यय में भी तेजी देखने को मिली। पहली तिमाही में स्थिर कीमतों पर निजी अंतिम उपभोग व्यय में 7.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। निजी खर्च में यह वृद्धि घरेलू माँग की मजबूती को दर्शाती है। जब उपभोक्ताओं की ओर से वस्तुओं और सेवाओं पर खर्च बढ़ता है,तो इसका असर उत्पादन, कारोबार और रोजगार से जुड़ी गतिविधियों पर भी पड़ता है।
जीडीपी के ताजा आँकड़े भारतीय रिजर्व बैंक के अनुमान से भी बेहतर रहे हैं। अगस्त की शुरुआत में मौद्रिक नीति समिति के फैसलों की घोषणा के दौरान रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के लिए जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान 7 प्रतिशत रखा था। वास्तविक वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रहने से यह अनुमान पीछे छूट गया है। इससे पता चलता है कि पहली तिमाही में आर्थिक गतिविधियों ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया।
हालाँकि,वैश्विक परिस्थितियाँ अभी भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बनी हुई हैं। रिजर्व बैंक के गवर्नर ने मौद्रिक नीति से जुड़े आकलन के दौरान पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष का भी उल्लेख किया था। उनके अनुसार,जून 2026 के बाद संघर्ष के कारण आपूर्ति पक्ष पर पड़ने वाला दबाव कुछ कम हुआ था,लेकिन जुलाई के पहले सप्ताह से संघर्ष के दोबारा बढ़ने के कारण ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ गया और आपूर्ति श्रृंखला को लेकर अनिश्चितता फिर से पैदा हो गई।
ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव भारत जैसी बड़ी आयातक अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण चुनौती है। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से आयात बिल बढ़ सकता है और महँगाई पर भी दबाव पड़ सकता है। वहीं,वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी तरह की बाधा से उद्योगों की लागत और उत्पादन प्रभावित हो सकता है। ऐसे माहौल में भारतीय अर्थव्यवस्था की पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि उल्लेखनीय मानी जा रही है।
जीडीपी के आँकड़ों से यह भी स्पष्ट होता है कि आर्थिक वृद्धि को केवल एक क्षेत्र का सहारा नहीं मिला है। सेवा क्षेत्र की दो अंकों की वृद्धि, द्वितीयक क्षेत्र का मजबूत प्रदर्शन, निवेश में तेज बढ़ोतरी और निजी उपभोग में लगातार विस्तार ने अर्थव्यवस्था को व्यापक आधार दिया है। हालाँकि,प्राथमिक क्षेत्र की अपेक्षाकृत धीमी वृद्धि को देखते हुए कृषि क्षेत्र पर आगे विशेष ध्यान देने की आवश्यकता बनी रहेगी।
कुल मिलाकर,वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के आँकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत स्थिति को दर्शाते हैं। 7.8 प्रतिशत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि पिछले साल की तुलना में बेहतर है और रिजर्व बैंक के अनुमान से भी ऊपर रही है। नाममात्र जीडीपी में 10.3 प्रतिशत की वृद्धि,वास्तविक जीवीए में 8.2 प्रतिशत का विस्तार,पूँजी निर्माण में 11.9 प्रतिशत की तेजी और निजी उपभोग में 7.1 प्रतिशत की वृद्धि अर्थव्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों में मजबूती का संकेत देती है।
अब चुनौती इस विकास दर को आने वाली तिमाहियों में बनाए रखने की होगी। वैश्विक संघर्ष,ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी अनिश्चितताओं के बीच भारत को घरेलू माँग,निवेश और उत्पादन की गति कायम रखनी होगी। पहली तिमाही के मजबूत आँकड़ों ने फिलहाल भारतीय अर्थव्यवस्था को सकारात्मक शुरुआत दी है और आगे की आर्थिक दिशा के लिए मजबूत आधार तैयार किया है।
