ट्रंप प्रशासन एच-1बी वीजा में करने जा रहा बड़ा बदलाव (तस्वीर क्रेडिट@AIRNewsHindi)

ट्रंप प्रशासन एच-1बी वीजा में करने जा रहा बड़ा बदलाव? भारतीय पेशेवरों पर पड़ सकता है असर,जानिए क्या है पूरा मामला

वॉशिंगटन,26 अगस्त (युआईटीवी)- अमेरिका में काम करने वाले विदेशी पेशेवरों, खासकर भारतीयों के लिए एच-1बी वीजा से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने एच-1बी वीजा कार्यक्रम में संभावित बड़े बदलाव की दिशा में कदम आगे बढ़ा दिया है। अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग ने एच-1बी वीजा कार्यक्रम में सुधार से संबंधित एक प्रस्तावित नियम व्हाइट हाउस के सूचना एवं नियामक मामलों के कार्यालय के पास समीक्षा के लिए भेजा है। हालाँकि,प्रस्ताव के विस्तृत प्रावधान अभी सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि प्रशासन एच-1बी वीजा की योग्यता, वेतन, नियोक्ताओं की जरूरत, चयन प्रक्रिया या अन्य नियमों में किस तरह का बदलाव करने की तैयारी कर रहा है।

एच-1बी वीजा अमेरिका में विदेशी पेशेवरों के लिए सबसे महत्वपूर्ण कार्य वीजा श्रेणियों में से एक है। हर साल हजारों भारतीय पेशेवर इसी कार्यक्रम के जरिए अमेरिका में नौकरी करने जाते हैं। तकनीक, इंजीनियरिंग, वित्त, स्वास्थ्य सेवा और शोध जैसे क्षेत्रों में अमेरिकी कंपनियाँ बड़ी संख्या में एच-1बी कर्मचारियों को नियुक्त करती हैं। ऐसे में इस कार्यक्रम में होने वाला कोई भी बड़ा बदलाव भारतीय पेशेवरों और उन्हें नियुक्त करने वाली अमेरिकी कंपनियों दोनों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग ने सोमवार को ‘एच-वन-बी नॉनइमिग्रेंट वीजा क्लासिफिकेशन प्रोग्राम में सुधार’ नाम से प्रस्तावित नियम को व्हाइट हाउस के सूचना एवं नियामक मामलों के कार्यालय के पास भेजा है। इस प्रस्ताव को आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण श्रेणी में रखा गया है। इसका अर्थ है कि प्रस्तावित नियम का अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर पड़ने की संभावना मानी जा रही है। ऐसे नियमों का आर्थिक प्रभाव कम से कम 10 करोड़ डॉलर होने की संभावना हो सकती है या वे नौकरियों,उत्पादकता, प्रतिस्पर्धा अथवा अर्थव्यवस्था के किसी महत्वपूर्ण क्षेत्र को प्रभावित कर सकते हैं।

संघीय नियामक डॉकेट में इस प्रस्ताव को अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा के तहत प्रस्तावित नियम के रूप में दर्ज किया गया है। हालाँकि,अभी इसमें प्रस्तावित बदलावों का पूरा विवरण उपलब्ध नहीं कराया गया है। यही वजह है कि इस समय यह कहना मुश्किल है कि ट्रंप प्रशासन एच-1बी व्यवस्था में वास्तव में किस स्तर का परिवर्तन करने जा रहा है।

प्रस्तावित नियम की समीक्षा व्हाइट हाउस के सूचना एवं नियामक मामलों के कार्यालय की ओर से की जाएगी। यह कार्यालय प्रबंधन एवं बजट कार्यालय का हिस्सा है और महत्वपूर्ण संघीय नियमों की अंतिम प्रक्रिया से पहले समीक्षा करता है। समीक्षा के दौरान यह देखा जाता है कि प्रस्तावित नियम का आर्थिक,प्रशासनिक और नीतिगत प्रभाव क्या हो सकता है। समीक्षा पूरी होने के बाद कार्यालय प्रस्ताव को मंजूरी दे सकता है,उसे बदलाव के लिए संबंधित एजेंसी के पास वापस भेज सकता है या संशोधन के साथ आगे बढ़ने की अनुमति दे सकता है।

फिलहाल इस समीक्षा को पूरा करने के लिए कोई निश्चित कानूनी समयसीमा तय नहीं की गई है। आम तौर पर प्रस्तावित नियम की विस्तृत जानकारी तब सामने आती है,जब व्हाइट हाउस की समीक्षा पूरी हो जाती है और नियम को संघीय रजिस्टर में प्रकाशित किया जाता है। इसके बाद आम जनता,कंपनियों,पेशेवर संगठनों और अन्य संबंधित पक्षों से प्रस्ताव पर टिप्पणियाँ और आपत्तियाँ माँगी जाती हैं। इन टिप्पणियों पर विचार करने के बाद गृह सुरक्षा विभाग यह तय करता है कि प्रस्ताव को अंतिम नियम बनाया जाए,उसमें बदलाव किया जाए या उसे वापस लिया जाए।

इसका मतलब है कि फिलहाल एच-1बी वीजा के मौजूदा नियमों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। इसलिए अभी एच-1बी वीजा धारकों,संभावित आवेदकों या उन्हें नियुक्त करने वाले नियोक्ताओं को इस प्रस्ताव के कारण तत्काल किसी विशेष कार्रवाई की जरूरत नहीं है। जब तक कोई नया नियम अंतिम रूप से लागू नहीं होता,तब तक मौजूदा व्यवस्था के तहत ही वीजा प्रक्रिया जारी रहेगी।

यह प्रस्ताव मंगलवार को सामने आए एच-1बी से जुड़े एक अन्य प्रस्ताव से अलग है। उस अलग प्रस्ताव के तहत सीमा के दायरे में आने वाली हर एच-1बी याचिका पर 1,03,265 डॉलर की अतिरिक्त फीस लगाने का सुझाव दिया गया है। यह प्रस्ताव पहले से ही एच-1बी वीजा को लेकर चल रही बहस को और महत्वपूर्ण बना रहा है। प्रस्तावित फीस नियमित सालाना सीमा के तहत आने वाली याचिकाओं को प्रभावित कर सकती है, जबकि अमेरिकी विश्वविद्यालयों से उच्च डिग्री प्राप्त विदेशी पेशेवरों के लिए अलग प्रावधान का उल्लेख किया गया है।

कुछ संस्थानों को प्रस्तावित फीस से बाहर रखने की बात भी कही गई है। विश्वविद्यालयों, सरकारी शोध संगठनों और गैर-लाभकारी शोध संगठनों की ओर से दायर सीमा-मुक्त एच-1बी याचिकाओं पर यह फीस लागू नहीं होगी। इस प्रस्ताव पर 24 सितंबर तक जनता और संबंधित पक्षों से टिप्पणियाँ माँगी गई हैं। टिप्पणियों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद गृह सुरक्षा विभाग यह तय करेगा कि प्रस्ताव को अंतिम रूप दिया जाए,इसमें बदलाव किए जाएँ या इसे वापस ले लिया जाए।

ट्रंप प्रशासन विदेशी छात्रों और कर्मचारियों से जुड़े आव्रजन नियमों के दूसरे पहलुओं की भी समीक्षा कर रहा है। इनमें वैकल्पिक व्यावहारिक प्रशिक्षण यानी ओपीटी के लिए प्रस्तावित फीस का मुद्दा भी शामिल है। ओपीटी के तहत विदेशी छात्र अपनी डिग्री से संबंधित क्षेत्र में एक निर्धारित अवधि तक व्यावहारिक काम का अनुभव हासिल कर सकते हैं। अमेरिकी विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले बड़ी संख्या में विदेशी छात्रों के लिए यह व्यवस्था महत्वपूर्ण मानी जाती है,क्योंकि इससे उन्हें अपनी पढ़ाई से जुड़े क्षेत्र में काम करने का अवसर मिलता है।

इसके अलावा प्रशासन एच-1बी और कुछ अन्य विदेशी कर्मचारियों को नौकरी जाने के बाद मिलने वाली 60 दिन की ग्रेस अवधि को खत्म करने के एक अन्य प्रस्ताव पर भी विचार कर रहा है। वर्तमान व्यवस्था में नौकरी खत्म होने के बाद विदेशी कर्मचारी को 60 दिनों तक अमेरिका में रहकर नई नौकरी खोजने या अपने आव्रजन दर्जे में बदलाव करने का अवसर मिलता है। यदि इस अवधि को समाप्त करने का प्रस्ताव आगे बढ़ता है,तो नौकरी गंवाने वाले विदेशी कर्मचारियों के लिए अमेरिका में बने रहना और नई नौकरी तलाशना अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

एच-1बी कार्यक्रम की मौजूदा व्यवस्था के तहत अमेरिकी कंपनियाँ ऐसे विदेशी पेशेवरों को नियुक्त कर सकती हैं,जिनके पास किसी विशेष क्षेत्र का ज्ञान या विशेषज्ञता हो। आमतौर पर इसके लिए कम से कम स्नातक डिग्री या उसके बराबर योग्यता आवश्यक होती है। तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों के साथ-साथ वित्त,स्वास्थ्य सेवा,इंजीनियरिंग और अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में भी इस वीजा का व्यापक इस्तेमाल किया जाता है।

अमेरिकी कांग्रेस ने नियमित एच-1बी वीजा के लिए हर साल 65,000 की सीमा तय कर रखी है। इसके अलावा अमेरिकी विश्वविद्यालयों से उच्च डिग्री हासिल करने वाले विदेशी पेशेवरों के लिए 20,000 अतिरिक्त वीजा उपलब्ध होते हैं। इन सीमित सीटों के कारण एच-1बी वीजा प्रक्रिया पहले से ही अत्यधिक प्रतिस्पर्धी है। कंपनियों और विदेशी पेशेवरों के बीच इसकी माँग लगातार बनी रहती है।

भारतीय पेशेवर एच-1बी कार्यक्रम के सबसे बड़े लाभार्थियों में शामिल रहे हैं। खासकर भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ,इंजीनियर,वैज्ञानिक और अन्य कुशल पेशेवर अमेरिकी कंपनियों में बड़ी संख्या में काम करते हैं। इसलिए एच-1बी कार्यक्रम से संबंधित किसी भी नीतिगत बदलाव का भारत पर भी व्यापक असर पड़ सकता है। हालाँकि,मौजूदा प्रस्ताव में भारतीय नागरिकों के लिए कोई अलग प्रावधान या विशेष बदलाव सार्वजनिक नहीं किया गया है।

ट्रंप प्रशासन लंबे समय से यह संकेत देता रहा है कि वह अमेरिकी आव्रजन व्यवस्था में ऐसे बदलाव करना चाहता है,जिनसे अमेरिकी श्रमिकों और घरेलू रोजगार बाजार को प्राथमिकता मिले। एच-1बी कार्यक्रम को लेकर अमेरिका में यह बहस भी चलती रही है कि विदेशी कुशल कर्मचारियों की नियुक्ति से अमेरिकी कंपनियों को विशेषज्ञ प्रतिभा मिलती है,जबकि दूसरी ओर कुछ लोग इसे अमेरिकी श्रमिकों के रोजगार और वेतन पर संभावित प्रभाव से जोड़ते हैं। प्रस्तावित नियम इसी व्यापक आव्रजन और रोजगार नीति का हिस्सा माना जा रहा है।

फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एच-1बी कार्यक्रम में किसी अंतिम बदलाव की घोषणा नहीं हुई है। प्रस्ताव अभी समीक्षा के चरण में है और उसके विस्तृत प्रावधान भी सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। इसलिए संभावित बदलावों को लेकर सामने आ रही अटकलों को अंतिम नीति नहीं माना जा सकता। आगे की प्रक्रिया में व्हाइट हाउस की समीक्षा,संघीय रजिस्टर में प्रकाशन और सार्वजनिक टिप्पणियों के बाद ही तस्वीर साफ होगी।

यदि प्रस्तावित सुधारों में एच-1बी वीजा के चयन,वेतन,नियोक्ताओं की पात्रता या अनुपालन व्यवस्था में बड़े बदलाव किए जाते हैं,तो इसका असर अमेरिकी कंपनियों के साथ-साथ भारत जैसे देशों से आने वाले पेशेवरों पर भी पड़ सकता है। वहीं,भारी अतिरिक्त फीस,ओपीटी से जुड़े संभावित शुल्क और नौकरी जाने के बाद 60 दिन की ग्रेस अवधि में बदलाव जैसे अलग-अलग प्रस्ताव विदेशी छात्रों और कर्मचारियों के लिए अमेरिकी आव्रजन व्यवस्था को पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण बना सकते हैं।

इस समय भारतीय पेशेवरों और कंपनियों के लिए सबसे अहम बात यही है कि वे आधिकारिक नियमों में बदलाव होने तक मौजूदा एच-1बी व्यवस्था के तहत ही अपनी प्रक्रियाएँ जारी रखें। नए प्रस्ताव के अंतिम रूप और उसके वास्तविक प्रावधान सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि ट्रंप प्रशासन एच-1बी कार्यक्रम को किस दिशा में ले जाना चाहता है और इसका अमेरिकी कंपनियों तथा भारतीय पेशेवरों पर कितना प्रभाव पड़ेगा।