म्यांमार में 28 दिसंबर 2025 को बहुदलीय आम चुनाव का पहला चरण आयोजित होगा (तस्वीर क्रेडिट@msbabu_x)

म्यांमार में 28 दिसंबर को बहुदलीय आम चुनाव का पहला चरण,आपातकाल खत्म कर राजनीतिक भविष्य की तैयारी

यांगून,19 अगस्त (युआईटीवी)- म्यांमार में राजनीतिक परिदृश्य लंबे समय से अस्थिरता और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। फरवरी 2021 में सैन्य तख्तापलट के बाद देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया ठहर सी गई थी और आपातकाल की स्थिति लगातार बढ़ाई जाती रही,लेकिन अब म्यांमार एक बार फिर से चुनावी प्रक्रिया की ओर बढ़ रहा है। सोमवार को संघ चुनाव आयोग ने आधिकारिक घोषणा करते हुए बताया कि 28 दिसंबर 2025 को बहुदलीय आम चुनाव का पहला चरण आयोजित होगा। आयोग ने कहा कि यह चुनाव संविधान और संबंधित कानूनों के अनुरूप संपन्न कराए जाएँगे। हालाँकि,बाकी चरणों की तिथियाँ बाद में घोषित की जाएँगी। इस घोषणा के साथ ही म्यांमार में एक नई राजनीतिक शुरुआत की उम्मीदें बढ़ गई हैं।

म्यांमार के शीर्ष नेता और रक्षा सेवा प्रमुख वरिष्ठ जनरल मिन आंग ह्लाइंग ने पहले ही जून महीने में संकेत दिए थे कि आम चुनाव दिसंबर और जनवरी के बीच कराए जाएँगे। अब आयोग की औपचारिक घोषणा से यह स्पष्ट हो गया है कि देश में लंबे समय बाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल होने जा रही है,लेकिन इस प्रक्रिया के साथ कई सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या यह चुनाव पूरी तरह स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे? क्या विपक्षी दलों को समान अवसर मिलेगा? और क्या जनता वास्तव में अपनी पसंद की सरकार चुन पाएगी?

गौरतलब है कि पिछले महीने म्यांमार की राष्ट्रीय रक्षा और सुरक्षा परिषद (एनडीएससी) ने महत्वपूर्ण राजनीतिक बदलावों की घोषणा की थी। इसके तहत नई संघ सरकार का गठन किया गया था,जिसकी कमान प्रधानमंत्री उ न्यो सॉ को सौंपी गई है। इसके अलावा राज्य सुरक्षा एवं शांति आयोग का गठन भी हुआ,जिसकी अध्यक्षता खुद वरिष्ठ जनरल मिन आंग ह्लाइंग कर रहे हैं। यही नहीं,एनडीएससी ने वह आदेश भी निरस्त कर दिया जिसके तहत संप्रभु शक्ति रक्षा सेवा के कमांडर-इन-चीफ को सौंप दी गई थी। इस फैसले ने चुनाव कराने के लिए कानूनी और संवैधानिक रास्ता साफ कर दिया।

राज्य प्रशासन परिषद के प्रवक्ता जॉ मिन तुन ने इस बारे में स्पष्ट किया कि आम चुनाव आयोजित करने के लिए आपातकाल की स्थिति समाप्त करने का निर्णय लिया गया है। याद दिला दें कि फरवरी 2021 में तत्कालीन कार्यवाहक राष्ट्रपति यू म्यिंट स्वे ने एक साल के आपातकाल की घोषणा की थी और संप्रभु शक्ति रक्षा सेवा प्रमुख को हस्तांतरित कर दी थी। इसके बाद कमांडर-इन-चीफ के नेतृत्व में राज्य प्रशासन परिषद का गठन किया गया था,जिसकी कमान भी मिन आंग ह्लाइंग के पास रही। यह आपातकाल लगातार कई बार छह-छह महीने के लिए बढ़ाया गया और अंततः 31 जुलाई 2025 तक इसकी अवधि तय की गई थी,लेकिन अब इस आपातकाल को समाप्त कर लोकतांत्रिक चुनाव कराने की घोषणा देश के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हो सकती है।

म्यांमार में होने वाले इस चुनाव को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी गहरी नजरों से देखा जा रहा है। पश्चिमी देशों,खासकर अमेरिका और यूरोपीय संघ,ने बार-बार म्यांमार में लोकतांत्रिक व्यवस्था बहाल करने और विपक्षी नेताओं की रिहाई की माँग की है। वहीं चीन और रूस जैसे देशों ने म्यांमार की सैन्य सरकार के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखे हैं। ऐसे में आगामी चुनाव केवल म्यांमार की आंतरिक राजनीति ही नहीं,बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरणों के लिए भी महत्वपूर्ण साबित होंगे।

इसी बीच,म्यांमार अपनी अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने की कोशिश में भी जुटा हुआ है। देश डिजिटल इकोनॉमी रोडमैप 2030 के तहत डिजिटल परिवर्तन को गति देने पर काम कर रहा है। हाल ही में नाय पी तॉ में वाणिज्य मंत्रालय के भीतर डिजिटल इकोनॉमी डेवलपमेंट कमेटी (डीईडीसी) की समन्वय बैठक आयोजित हुई,जिसमें डिजिटल अर्थव्यवस्था से जुड़े प्रगति कार्यों की समीक्षा की गई और आगे की प्राथमिकताओं पर चर्चा हुई। इस बैठक में परिवहन और संचार मंत्री एवं समिति के संरक्षक जनरल म्या तुन ऊ ने कहा कि डिजिटल साधनों के माध्यम से विकासशील देश तेजी से आगे बढ़ सकते हैं। उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में डिजिटल अर्थव्यवस्था वैश्विक जीडीपी में 15 प्रतिशत योगदान देती है और 2030 तक इसके 25 प्रतिशत से अधिक होने की उम्मीद है। म्यांमार भी इसी दिशा में आगे बढ़कर अपना डिजिटल भविष्य मजबूत करने का प्रयास कर रहा है।

हालाँकि,म्यांमार में राजनीतिक स्थिरता के बिना कोई भी आर्थिक पहल सफल नहीं हो सकती। देश में जातीय हिंसा,विद्रोह और आंतरिक संघर्ष लगातार जारी हैं। कई क्षेत्रों में सशस्त्र समूहों और सेना के बीच झड़पें हो रही हैं। आम जनता अब भी भय और असुरक्षा के माहौल में जी रही है। ऐसे में दिसंबर में होने वाले चुनाव तभी सफल होंगे जब सभी पक्षों को इसमें समान भागीदारी का अवसर मिले और परिणामों को निष्पक्षता से स्वीकार किया जाए।

म्यांमार के लिए यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन या राजनीतिक बदलाव का अवसर नहीं है,बल्कि यह उसकी खोई हुई लोकतांत्रिक साख को बहाल करने का भी मौका है। अगर चुनाव सही तरीके से आयोजित होते हैं,तो म्यांमार एक नई राह पर चल सकता है,जहाँ लोकतंत्र,विकास और स्थिरता एक साथ आगे बढ़ें,लेकिन अगर यह चुनाव केवल दिखावा साबित हुआ,तो न केवल म्यांमार की जनता निराश होगी बल्कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का विश्वास भी टूट जाएगा।

दिसंबर का चुनाव म्यांमार के इतिहास का एक निर्णायक अध्याय साबित हो सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि लंबे समय तक आपातकाल और सैन्य शासन झेल चुके इस देश की जनता अब किसे अपना प्रतिनिधि चुनती है और क्या वास्तव में लोकतंत्र की बहाली संभव हो पाती है।