भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में हुई वृद्धि (तस्वीर क्रेडिट@garrywalia_)

विदेशी मुद्रा भंडार में एक और उछाल,मजबूत होती बुनियाद—भारत 696.61 बिलियन डॉलर पर पहुँचा

नई दिल्ली,3 जनवरी (युआईटीवी)- भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार दूसरे सप्ताह बढ़ोतरी दर्ज की गई है,जिससे देश की आर्थिक स्थिरता और बाहरी झटकों से निपटने की क्षमता को लेकर भरोसा और मजबूत हुआ है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी ताज़ा आँकड़ों के अनुसार, 26 दिसंबर को समाप्त हुए सप्ताह में देश का फॉरेक्स रिजर्व 3.293 बिलियन डॉलर बढ़कर 696.610 बिलियन डॉलर पर पहुँच गया। यह वृद्धि ऐसे समय में हुई है,जब वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता,महँगाई और भू-राजनीतिक तनाव निवेशकों को सावधानी बरतने के लिए मजबूर कर रहे हैं। इसके बावजूद भारत का रिजर्व लगातार मजबूत रफ्तार से ऊपर जा रहा है,जो अर्थव्यवस्था की बेहतर स्थिति और पूँजी प्रवाह के सकारात्मक माहौल की ओर इशारा करता है।

इससे पिछले सप्ताह भी फॉरेक्स रिजर्व में 4.368 बिलियन डॉलर की बढ़ोतरी हुई थी। दो हफ्तों में हुई यह संयुक्त वृद्धि संकेत देती है कि विदेशी निवेश,निर्यात आय और रिजर्व मैनेजमेंट में आरबीआई की रणनीति ने संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई है। खास बात यह है कि विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग सिर्फ आयात भुगतान या ऋण दायित्वों तक सीमित नहीं होता,बल्कि यह किसी भी संकट की घड़ी में देश की वित्तीय ढाल का काम करता है। जब दुनिया भर में बाजार अस्थिर होते हैं,तब मजबूत फॉरेक्स रिजर्व निवेशकों को भरोसा देता है कि भारत अपनी मुद्रा और बाहरी भुगतान व्यवस्था को सुरक्षित रख सकता है।

रिजर्व के घटकों पर नज़र डालें तो सबसे बड़ा हिस्सा—फॉरेन करेंसी एसेट्स—26 दिसंबर को समाप्त सप्ताह में 184 मिलियन डॉलर बढ़कर 559.612 बिलियन डॉलर पर पहुँच गया। ये एसेट्स विभिन्न मुद्राओं में रखे जाते हैं और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव के साथ इनकी वैल्यू बदलती रहती है। इनके अलावा सोने के भंडार में उल्लेखनीय उछाल देखने को मिला। गोल्ड रिजर्व की वैल्यू 2.956 बिलियन डॉलर बढ़कर 113.320 बिलियन डॉलर हो गई। इस तेज बढ़त की मुख्य वजह अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में उछाल है,जो फिलहाल लगभग 4,400 डॉलर प्रति औंस के करीब चल रही हैं। निवेशक अस्थिर माहौल में अक्सर सोने को सुरक्षित निवेश मानते हैं,इसलिए इसकी कीमतों में बढ़ोतरी से भारत के रिजर्व की कुल वैल्यू भी ऊपर पहुँच गई।

इसके साथ ही विशेष आहरण अधिकार यानी एसडीआर का मूल्य 60 मिलियन डॉलर बढ़कर 18.803 बिलियन डॉलर हो गया। वहीं,अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के पास भारत की रिजर्व पोजिशन भी 93 मिलियन डॉलर बढ़कर 4.875 बिलियन डॉलर पर दर्ज की गई। इन सभी घटकों का संयुक्त प्रभाव भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार को नई ऊँचाइयों तक ले गया है। यह स्थिति बताती है कि भारत वैश्विक वित्तीय संरचना में अपनी स्थिति को और मजबूत कर रहा है तथा बहुपक्षीय संस्थानों के साथ उसका भरोसा भी सुदृढ़ हो रहा है।

विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश के आर्थिक स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। यह न केवल आयात भुगतान जैसे रोजमर्रा के दायित्वों को निभाने में मदद करता है,बल्कि देश की क्रेडिट प्रोफाइल और मुद्रा स्थिरता को भी मजबूत बनाता है। उदाहरण के तौर पर,यदि किसी समय डॉलर के मुकाबले रुपया तेज दबाव में आ जाए और उसकी कीमत गिरने लगे,तो भारतीय रिजर्व बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग कर बाजार में डॉलर की बिक्री कर सकता है। इससे रुपया स्थिर रहने में मदद मिलती है और अचानक होने वाली गिरावट से अर्थव्यवस्था को बचाया जा सकता है। इस तरह फॉरेक्स रिजर्व विनिमय दर को नियंत्रित रखने का एक सशक्त साधन बन जाता है।

बढ़ता हुआ विदेशी मुद्रा भंडार यह भी दर्शाता है कि भारत में विदेशी पूँजी का भरोसा कायम है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश,पोर्टफोलियो निवेश और प्रेषणों के माध्यम से डॉलर की आवक अच्छी बनी हुई है। इसके साथ ही सेवाओं के निर्यात—खासकर आईटी और बिज़नेस प्रोसेस सेवाओं से भी लगातार विदेशी मुद्रा अर्जित हो रही है। वैश्विक अस्थिरता के बीच यह प्रवाह बताता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को निवेश के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित और आकर्षक माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऊँचे स्तर का रिजर्व भारत को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में एक मजबूत स्थिति देता है। आयातक कंपनियाँ भविष्य के भुगतान को लेकर अधिक निश्चिंत रहती हैं,जबकि सरकार भी ऊर्जा,रक्षा और बुनियादी ढाँचे जैसे आवश्यक क्षेत्रों में दीर्घकालिक अनुबंधों पर आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकती है। साथ ही, अगर वैश्विक वित्तीय बाजारों में अचानक गिरावट आती है,तो फॉरेक्स रिजर्व आर्थिक झटकों को सोखने वाली कुशन का काम करता है।

हालाँकि,रिजर्व का स्तर बढ़ने के साथ यह चर्चा भी होती है कि इसका उपयोग किस तरह अधिक उत्पादक बनाया जाए। कुछ अर्थशास्त्री मानते हैं कि अत्यधिक रिजर्व रखने की लागत भी होती है,क्योंकि इन संपत्तियों पर मिलने वाला रिटर्न अक्सर कम रहता है,लेकिन वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में,कई विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए “सुरक्षा का मार्जिन” बनाए रखना ज्यादा जरूरी है। भारत के मामले में यह मार्जिन निवेशकों के भरोसे और आर्थिक स्थिरता—दोनों के लिए फायदेमंद साबित हो रहा है।

696.61 बिलियन डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार भारत की आर्थिक कहानी में एक सकारात्मक अध्याय जोड़ रहा है। यह संकेत देता है कि देश बाहरी जोखिमों का बेहतर ढंग से सामना करने की स्थिति में है और घरेलू आर्थिक नीतियाँ संतुलन की दिशा में काम कर रही हैं। आने वाले समय में आरबीआई की नीतियाँ,वैश्विक कमोडिटी कीमतें और पूँजी प्रवाह का रुख तय करेगा कि यह रफ्तार कितनी टिकाऊ साबित होती है,लेकिन फिलहाल इतना स्पष्ट है कि बढ़ता फॉरेक्स रिजर्व भारत की अर्थव्यवस्था के लिए भरोसे का एक मजबूत स्तंभ बन गया है।