डोनाल्ड ट्रंप (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

ईरान युद्ध पर ट्रंप प्रशासन को बड़ा झटका,अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने सैन्य कार्रवाई खत्म करने का प्रस्ताव किया पारित

वॉशिंगटन,4 जून (युआईटीवी)- ईरान के खिलाफ जारी अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को लेकर अमेरिकी राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने एक महत्वपूर्ण द्विदलीय ‘वॉर पावर्स रेजोल्यूशन’ पारित कर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों को चुनौती दी है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य ईरान के खिलाफ जारी सैन्य अभियान को समाप्त करना और युद्ध संबंधी निर्णयों पर कांग्रेस की संवैधानिक भूमिका को पुनर्स्थापित करना है। प्रस्ताव के पारित होने को ट्रंप प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक झटका माना जा रहा है,क्योंकि हाल के महीनों में इस संघर्ष को लेकर कांग्रेस के भीतर और अमेरिकी जनता के बीच असंतोष लगातार बढ़ता गया है।

यह प्रस्ताव बुधवार को प्रतिनिधि सभा में पेश किया गया था। इसे हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के वरिष्ठ डेमोक्रेट सदस्य ग्रेगरी मीक्स ने प्रस्तुत किया। प्रस्ताव को कई वरिष्ठ डेमोक्रेट नेताओं का समर्थन प्राप्त हुआ,जिनमें एडम स्मिथ और जिम हाइम्स प्रमुख रहे। मतदान के दौरान प्रस्ताव के पक्ष में 215 और विरोध में 208 वोट पड़े,जिसके बाद यह बेहद करीबी अंतर से पारित हो गया। इस परिणाम ने यह संकेत दिया कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को लेकर अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था के भीतर गंभीर मतभेद मौजूद हैं।

प्रस्ताव के पारित होने के बाद ग्रेगरी मीक्स ने इसे एक ऐतिहासिक और निर्णायक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि यह मतदान राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा ईरान के खिलाफ चलाए जा रहे अवैध और महँगे युद्ध के खिलाफ कांग्रेस की स्पष्ट प्रतिक्रिया है। उनके अनुसार यह केवल एक प्रस्ताव नहीं,बल्कि उस युद्ध को समाप्त करने की दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम है, जिसने अमेरिका को आर्थिक,राजनीतिक और रणनीतिक रूप से नुकसान पहुँचाया है।

मीक्स ने कहा कि यह संघर्ष अपने घोषित उद्देश्यों को हासिल करने में विफल रहा है। उनका तर्क था कि युद्ध के कारण क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ी है और कूटनीतिक समाधान की संभावनाएँ कमजोर हुई हैं। उन्होंने कहा कि जिस उद्देश्य से सैन्य कार्रवाई शुरू की गई थी, वह पूरा नहीं हुआ,बल्कि हालात पहले की तुलना में अधिक जटिल और चुनौतीपूर्ण बन गए हैं।

हाउस आर्म्ड सर्विसेज कमेटी के वरिष्ठ सदस्य एडम स्मिथ ने भी प्रस्ताव के समर्थन में तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि प्रतिनिधि सभा का यह मतदान राष्ट्रपति ट्रंप को स्पष्ट संदेश देता है कि ईरान के खिलाफ उनकी चुनी हुई युद्ध नीति को तुरंत समाप्त किया जाना चाहिए। स्मिथ के अनुसार प्रशासन उन प्रमुख लक्ष्यों को हासिल करने में असफल रहा है जिनका हवाला देकर सैन्य कार्रवाई शुरू की गई थी।

उन्होंने कहा कि न तो ईरान के परमाणु कार्यक्रम को प्रभावी ढंग से रोका जा सका है,न ही उच्च संवर्धित यूरेनियम के मुद्दे का समाधान हुआ है और न ही शासन परिवर्तन जैसा कोई लक्ष्य पूरा हो पाया है। इसके विपरीत,उनके अनुसार ईरान क्षेत्रीय राजनीति में और अधिक प्रभावशाली होकर उभरा है तथा वहाँ अधिक कठोर विचारधारा वाले नेतृत्व को मजबूती मिली है।

स्मिथ ने यह भी दावा किया कि इस संघर्ष के कारण अमेरिका को अतिरिक्त आर्थिक और रणनीतिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य,जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है,युद्ध से पहले खुला और सुरक्षित था, लेकिन अब अमेरिका को उसके संचालन और स्थिरता को बनाए रखने के लिए अतिरिक्त कीमत चुकानी पड़ सकती है।

ग्रेगरी मीक्स ने अपने वक्तव्य में युद्ध के कूटनीतिक प्रभावों पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि सैन्य कार्रवाई ने बातचीत और समझौते के रास्ते को कमजोर किया है। उनके अनुसार यदि कूटनीति को प्राथमिकता दी जाती तो परमाणु कार्यक्रम सहित कई मुद्दों पर बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते थे। उन्होंने आरोप लगाया कि युद्ध ने ईरान को अपनी राजनीतिक और सैन्य ताकत प्रदर्शित करने का अवसर दिया है और क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ाया है।

उन्होंने कहा कि इस संघर्ष का सबसे बड़ा बोझ आम अमेरिकी नागरिकों पर पड़ा है। युद्ध शुरू होने के बाद से ईंधन की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है,जिससे महँगाई और जीवन-यापन की लागत पर असर पड़ा है। उनके अनुसार अमेरिकी करदाताओं को हर सप्ताह अरबों डॉलर ऐसे युद्ध पर खर्च करने पड़ रहे हैं,जिसका व्यापक जनसमर्थन नहीं है।

इस बीच प्रतिनिधि सभा की सदस्य प्रमिला जयपाल ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया, हालांकि वह मतदान के दौरान उपस्थित नहीं थीं। उन्होंने बताया कि अपनी माँ की अचानक स्वास्थ्य समस्या के कारण वह भारत में थीं और इसी वजह से मतदान में हिस्सा नहीं ले सकीं। जयपाल ने कहा कि यदि वह वॉशिंगटन में होतीं तो निश्चित रूप से इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करतीं।

उन्होंने कहा कि अमेरिकी संविधान के अनुसार युद्ध घोषित करने का अधिकार कांग्रेस के पास है और किसी भी सैन्य अभियान को इस संवैधानिक व्यवस्था का सम्मान करना चाहिए। उनके अनुसार ईरान के खिलाफ यह संघर्ष एक ऐसा युद्ध है,जिसे चुनकर शुरू किया गया और जिसकी आवश्यकता पर गंभीर प्रश्न उठते हैं।

प्रमिला जयपाल ने युद्ध के मानवीय प्रभावों पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि इस संघर्ष के कारण अमेरिकी सैनिकों के साथ-साथ ईरान और लेबनान के अनेक नागरिकों को भी नुकसान उठाना पड़ा है। बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए हैं और क्षेत्र में मानवीय संकट गहराया है। उन्होंने कहा कि आर्थिक लागत के साथ-साथ मानवीय कीमत भी अत्यंत भारी रही है।

जयपाल ने कहा कि अमेरिकी जनता इस युद्ध की कीमत सीधे और परोक्ष दोनों रूपों में चुका रही है। उनके अनुसार युद्ध पर होने वाला खर्च घरेलू विकास कार्यक्रमों,सामाजिक सुरक्षा योजनाओं और अन्य आवश्यक क्षेत्रों से संसाधनों को दूर ले जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि युद्ध का प्रत्येक दिन संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करता है।

विश्लेषकों का मानना है कि प्रतिनिधि सभा में पारित यह प्रस्ताव केवल एक विधायी कदम नहीं है,बल्कि यह अमेरिकी राजनीति में बदलते माहौल का संकेत भी है। कांग्रेस के भीतर बढ़ती असहमति और जनता के बीच बढ़ते विरोध ने प्रशासन की विदेश नीति पर दबाव बढ़ा दिया है। विशेष रूप से ऐसे समय में जब अमेरिकी अर्थव्यवस्था महँगाई और वैश्विक अस्थिरता जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है,युद्ध को लेकर सवाल और अधिक तीखे हो गए हैं।

हालाँकि,यह प्रस्ताव पारित हो चुका है,लेकिन इसके आगे की प्रक्रिया अभी बाकी है। अब यह मामला सीनेट के समक्ष जाएगा,जहाँ इस पर चर्चा और मतदान होना है। प्रस्ताव के समर्थकों का कहना है कि सीनेट को भी जनता की भावना और संवैधानिक जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए कार्रवाई करनी चाहिए।

ग्रेगरी मीक्स और एडम स्मिथ दोनों ने कहा कि प्रतिनिधि सभा का यह मतदान अमेरिकी जनता की बढ़ती नाराजगी का प्रतिबिंब है। मीक्स ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब सीनेट की जिम्मेदारी है कि वह भी इस प्रस्ताव पर आगे बढ़े और राष्ट्रपति को यह संदेश दे कि ईरान के खिलाफ जारी युद्ध को समाप्त करने का समय आ चुका है।

फिलहाल प्रतिनिधि सभा का यह फैसला अमेरिकी राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को लेकर समर्थन पहले जैसा मजबूत नहीं रहा और अब इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक बहस छिड़ चुकी है। आने वाले दिनों में सीनेट की प्रतिक्रिया और प्रशासन का रुख यह तय करेगा कि इस प्रस्ताव का अमेरिकी विदेश नीति पर कितना प्रभाव पड़ता है।