नई दिल्ली,12 जनवरी (युआईटीवी)- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को कहा कि आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का विरोध करने वाली ताकतें आज भी अलग-अलग रूपों में सक्रिय हैं। गुजरात में एक जनसभा में बोलते हुए प्रधानमंत्री ने इस पूजनीय मंदिर के पुनर्निर्माण के दौरान हुए ऐतिहासिक प्रतिरोध को याद किया और इसे देश में चल रहे वैचारिक विरोध से जोड़ा।
पीएम मोदी ने कहा कि सोमनाथ मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं है,बल्कि भारत की सांस्कृतिक दृढ़ता और सभ्यतागत निरंतरता का एक सशक्त प्रतीक है। उन्होंने श्रोताओं को याद दिलाया कि सदियों से बार-बार हुए आक्रमणों और विनाश के बावजूद,सोमनाथ से जुड़ी भावना कभी क्षीण नहीं हुई। उनके अनुसार,जब देश स्वतंत्र हुआ और मंदिर का पुनर्निर्माण शुरू हुआ,तो कुछ वर्गों ने इसका विरोध किया और भारत की प्राचीन विरासत के प्रतीकों को पुनर्जीवित करने के खिलाफ तर्क दिए।
प्रधानमंत्री ने सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे नेताओं की भूमिका पर प्रकाश डाला,जिनका दृढ़ विश्वास था कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण राष्ट्रीय आत्मसम्मान की बहाली के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा कि पटेल पुनर्निर्माण को केवल एक धार्मिक कार्य नहीं,बल्कि एक नैतिक और सांस्कृतिक कर्तव्य मानते थे। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि उस समय दिखाया गया दृढ़ संकल्प आज भी भारत की यात्रा को प्रेरित करता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा कि आज भी कुछ ऐसी ताकतें हैं जो भारत द्वारा अपने इतिहास,आस्था और परंपराओं को आत्मविश्वास से व्यक्त करने पर असहज महसूस करती हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा विरोध हमेशा खुलकर सामने नहीं आता,लेकिन सांस्कृतिक पुनरुद्धार और राष्ट्रीय गौरव पर सवाल उठाने वाले कथनों के माध्यम से मौजूद रहता है। उनके अनुसार,भारत की विरासत की रक्षा के लिए इस मानसिकता को पहचानना और समझना महत्वपूर्ण है।
एकता पर जोर देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की ताकत अपने अतीत का सम्मान करते हुए विकास और समावेशिता की राह पर आगे बढ़ने में निहित है। उन्होंने आगे कहा कि इतिहास को स्वीकार करना देश को विभाजित नहीं करता,बल्कि इसकी सामूहिक पहचान को मजबूत करता है।
भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक सोमनाथ मंदिर का आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्व बहुत अधिक है। स्वतंत्रता के बाद इसका पुनर्निर्माण औपनिवेशिक काल के बाद के भारत में एक महत्वपूर्ण मोड़ था,जो देश के अपनी सांस्कृतिक विरासत को पुनः प्राप्त करने और संरक्षित करने के संकल्प का प्रतीक है। गुजरात में प्रधानमंत्री मोदी के भाषण ने एक बार फिर इस विरासत और इतिहास,पहचान और राष्ट्रीय चेतना पर व्यापक बहस को सुर्खियों में ला दिया।
