पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध से तेल बाजार में भूचाल

पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध से तेल बाजार में भूचाल,ब्रेंट 82 डॉलर के पार; भारत की अर्थव्यवस्था पर बढ़ा दबाव

नई दिल्ली,2 मार्च (युआईटीवी)- पश्चिम एशिया में तेज होते सैन्य टकराव के बीच वैश्विक कच्चे तेल बाजार में जबरदस्त उथल-पुथल देखने को मिली है। सोमवार को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 7 प्रतिशत से अधिक की तेजी दर्ज की गई,जिसने निवेशकों और आयातक देशों की चिंताओं को बढ़ा दिया है। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए सैन्य हमलों के बाद पैदा हुई अनिश्चितता ने ऊर्जा बाजार में जोखिम प्रीमियम को बढ़ा दिया है। इसी का असर रहा कि ब्रेंट क्रूड के वायदा भाव बढ़कर 82.37 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गए,जो जनवरी 2025 के बाद का उच्चतम स्तर माना जा रहा है।

दिन के कारोबार में ब्रेंट क्रूड की कीमत 7.60 प्रतिशत उछलकर 78.41 डॉलर प्रति बैरल पर रही,जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) क्रूड के वायदा भाव 7.19 प्रतिशत बढ़कर 71.86 डॉलर प्रति बैरल पर पहुँच गए। यह उछाल अचानक नहीं आया,बल्कि इसके पीछे पश्चिम एशिया में तेजी से बदलते भू-राजनीतिक समीकरण हैं। रिपोर्टों के अनुसार ईरान ने रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले नौवहन को बंद कर दिया है,जिससे वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर गंभीर असर पड़ने की आशंका है।

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में से एक है। वैश्विक स्तर पर लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल का परिवहन इसी मार्ग से होता है। भारत के लिए यह मार्ग और भी महत्वपूर्ण है,क्योंकि देश के कुल कच्चे तेल आयात का 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा इसी रास्ते से आता है। ऐसे में यदि यहाँ लंबे समय तक व्यवधान बना रहता है,तो ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों दोनों पर गहरा असर पड़ सकता है।

हालाँकि,इस संकट के बीच पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन ओपेक ने अगले महीने से उत्पादन बढ़ाने का फैसला किया है। सऊदी अरब और रूस के नेतृत्व में प्रमुख सदस्य देशों ने प्रतिदिन 2 लाख 6 हजार बैरल अतिरिक्त उत्पादन पर सहमति जताई है। इसका उद्देश्य बाजार में आपूर्ति को संतुलित रखना और कीमतों में अत्यधिक अस्थिरता को सीमित करना है,लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि यदि क्षेत्रीय तनाव और बढ़ता है,तो उत्पादन वृद्धि भी कीमतों को काबू में रखने के लिए पर्याप्त नहीं होगी।

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिका और इजरायल के हमले ने ऊर्जा बाजार को बड़ा भू-राजनीतिक झटका दिया है। इससे वैश्विक तेल जोखिम प्रीमियम बढ़ गया है और निवेशकों ने सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करना शुरू कर दिया है। सोना और चाँदी जैसे कीमती धातुओं की माँग में तेजी देखी जा रही है। अनिश्चितता के माहौल में निवेशक जोखिम भरे परिसंपत्तियों से दूरी बनाकर सुरक्षित ठिकानों की तलाश कर रहे हैं।

भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। ब्रिकवर्क रेटिंग्स में मानदंड, मॉडल विकास और अनुसंधान प्रमुख राजीव शरण ने कहा कि भारत लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से घरेलू ईंधन की कीमतों में इजाफा हो सकता है। इससे महँगाई दर पर दबाव बढ़ेगा और चालू खाते का घाटा भी बढ़ सकता है। यदि तेल कीमतें लंबे समय तक ऊँचे स्तर पर बनी रहती हैं,तो भारतीय रिजर्व बैंक के लिए मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ब्याज दरों में संभावित कटौती टल सकती है और मौद्रिक नीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है।

भारतीय शेयर बाजार पहले ही इस भू-राजनीतिक जोखिम को भांपते हुए सतर्क रुख अपना चुके हैं। निवेशकों में जोखिम से बचाव की प्रवृत्ति बढ़ी है। विदेशी संस्थागत निवेशकों की निकासी की आशंका जताई जा रही है। वाहन,वित्त और ऊर्जा-आधारित क्षेत्रों के शेयरों पर विशेष दबाव देखा जा सकता है,क्योंकि ईंधन लागत में बढ़ोतरी से इन क्षेत्रों की लाभप्रदता प्रभावित हो सकती है। बाजार विश्लेषकों का कहना है कि निकट भविष्य में बाजार का रुख कंपनियों की आय के बजाय कच्चे तेल की कीमतों और पश्चिम एशिया की स्थिति पर अधिक निर्भर रहेगा।

रिपोर्टों के अनुसार यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान जारी रहता है,तो ब्रेंट क्रूड की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर सकती है। यदि व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष की स्थिति बनती है तो कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर जा सकती हैं। ऐसी स्थिति वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है,खासकर उन देशों के लिए जो ऊर्जा आयात पर अत्यधिक निर्भर हैं।

जेएम फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशनल सिक्योरिटीज की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि कच्चे तेल की कीमत में हर 1 डॉलर की वृद्धि से भारत का वार्षिक आयात बिल लगभग 2 अरब डॉलर बढ़ जाता है। इससे व्यापार संतुलन पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और रुपये पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है। लंबे समय तक ऊँची कीमतें बनी रहने से सरकार के राजकोषीय प्रबंधन पर भी प्रभाव पड़ सकता है,क्योंकि ईंधन सब्सिडी या टैक्स संरचना में बदलाव की आवश्यकता उत्पन्न हो सकती है।

ऊर्जा आपूर्ति के अलावा परिवहन और समुद्री बीमा लागत में वृद्धि की भी आशंका है। खाड़ी क्षेत्र के समुद्री मार्ग बाधित होने से वैश्विक शिपिंग दरों में उछाल आ सकता है। इससे वस्तुओं की कीमतों में व्यापक स्तर पर वृद्धि हो सकती है,जो पहले से ही महँगाई से जूझ रही वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अतिरिक्त बोझ साबित होगी।

राजीव शरण का मानना है कि तेल बाजार में बना अतिरिक्त जोखिम प्रीमियम तब ही कम होगा,जब तेहरान में नेतृत्व को लेकर स्पष्टता आएगी और तनाव कम करने के ठोस प्रयास सामने आएँगे। साथ ही,होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों के खुले रहने का भरोसा भी बाजार को स्थिर करने में अहम भूमिका निभाएगा। जब तक यह भरोसा कायम नहीं होता,तब तक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है।

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। तेल की कीमतों में उछाल केवल एक आर्थिक संकेतक नहीं,बल्कि व्यापक भू-राजनीतिक तनाव का प्रतिबिंब है। भारत सहित दुनिया के कई देश इस संकट की दिशा पर नजर बनाए हुए हैं,क्योंकि आने वाले दिनों में स्थिति किस ओर मुड़ती है,उसी पर वैश्विक अर्थव्यवस्था की गति काफी हद तक निर्भर करेगी।