नई दिल्ली,20 मार्च (युआईटीवी)- पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत ने एक बार फिर सक्रिय कूटनीति का संकेत दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जॉर्डन के राजा किंग अब्दुल्ला द्वितीय के बीच गुरुवार को इस महीने दूसरी बार फोन पर बातचीत हुई,जिसमें दोनों नेताओं ने क्षेत्र की गंभीर स्थिति पर चिंता व्यक्त की और शांति बहाली के लिए संवाद व कूटनीति को सबसे जरूरी रास्ता बताया।
यह बातचीत ऐसे समय में हुई है,जब पश्चिम एशिया में हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं और इसका असर वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस बातचीत के दौरान किंग अब्दुल्ला को ईद की अग्रिम शुभकामनाएँ दीं और दोनों देशों के बीच मजबूत संबंधों को दोहराया।
प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर जानकारी साझा करते हुए कहा कि उन्होंने अपने “भाई” किंग अब्दुल्ला द्वितीय से बात की और उन्हें ईद की मुबारकबाद दी। उन्होंने बताया कि दोनों नेताओं ने क्षेत्र में बदलते हालात पर गंभीर चिंता व्यक्त की और इस बात पर सहमति जताई कि शांति,सुरक्षा और स्थिरता को जल्द-से-जल्द बहाल करने के लिए बातचीत और कूटनीति ही सबसे प्रभावी रास्ता है।
इस बातचीत में ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा भी प्रमुख रूप से उठाया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि क्षेत्र में ऊर्जा ठिकानों पर हो रहे हमले निंदनीय हैं और ये तनाव को और बढ़ा सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत और जॉर्डन दोनों ही ऊर्जा और अन्य जरूरी उत्पादों के निर्बाध आवागमन के पक्षधर हैं,क्योंकि इसका सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और आम लोगों के जीवन पर पड़ता है।
प्रधानमंत्री ने जॉर्डन द्वारा संकटग्रस्त क्षेत्र में फँसे भारतीय नागरिकों की सुरक्षित वापसी में किए जा रहे प्रयासों की भी सराहना की। उन्होंने इस सहयोग के लिए किंग अब्दुल्ला और जॉर्डन सरकार का आभार व्यक्त किया। यह पहल भारत-जॉर्डन संबंधों की मजबूती और मानवीय सहयोग का उदाहरण मानी जा रही है।
यह उल्लेखनीय है कि दोनों नेताओं के बीच इससे पहले भी 2 मार्च को बातचीत हो चुकी है। लगातार दूसरी बार संवाद इस बात का संकेत है कि भारत और जॉर्डन क्षेत्रीय संकट को लेकर गंभीरता से विचार-विमर्श कर रहे हैं और समाधान के लिए सक्रिय भूमिका निभाना चाहते हैं।
पश्चिम एशिया में मौजूदा संकट 28 फरवरी को शुरू हुआ,जब ईरान पर अमेरिका और इजरायल द्वारा हमले किए गए। इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और कई शीर्ष सैन्य अधिकारियों के मारे जाने की खबरें सामने आईं। इसके जवाब में ईरान ने भी आक्रामक रुख अपनाते हुए क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी और इजरायली ठिकानों पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए।
इस टकराव ने पूरे क्षेत्र में अस्थिरता को बढ़ा दिया है और कई देशों के लिए चिंता का कारण बन गया है। खासतौर पर ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंता जताई जा रही है। भारत,जो ऊर्जा के लिए इस क्षेत्र पर काफी हद तक निर्भर है,इस स्थिति पर करीब से नजर बनाए हुए है।
प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीतिक सक्रियता भी इस संदर्भ में काफी अहम मानी जा रही है। पिछले कुछ दिनों में उन्होंने मलेशिया,ओमान,फ्रांस,कुवैत,संयुक्त अरब अमीरात,इज़राइल, सऊदी अरब,बहरीन और कतर समेत कई देशों के नेताओं से बातचीत की है। बुधवार से गुरुवार के बीच ही उन्होंने पांच देशों के प्रमुख नेताओं से संपर्क साधा,जो इस संकट के समाधान के लिए भारत की सक्रिय भूमिका को दर्शाता है।
इन सभी बातचीतों में एक बात समान रही—सभी नेताओं ने मौजूदा संकट से निपटने के लिए बातचीत और कूटनीति को ही सबसे बेहतर विकल्प माना। यह वैश्विक स्तर पर एक साझा समझ को भी दर्शाता है कि सैन्य टकराव के बजाय संवाद ही स्थायी समाधान दे सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की यह कूटनीतिक पहल न केवल क्षेत्रीय शांति के लिए महत्वपूर्ण है,बल्कि यह वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती भूमिका को भी दर्शाती है। भारत लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि वह एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में शांति,स्थिरता और सहयोग को प्राथमिकता देता है।
प्रधानमंत्री मोदी और किंग अब्दुल्ला द्वितीय के बीच हुई यह बातचीत पश्चिम एशिया में जारी संकट के बीच एक सकारात्मक संकेत मानी जा रही है। दोनों देशों के बीच समन्वय और सहयोग न केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करेगा,बल्कि क्षेत्रीय शांति बहाली के प्रयासों को भी गति दे सकता है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि इस तरह की कूटनीतिक पहलें किस हद तक तनाव कम करने में सफल होती हैं।
