भारत के संयुक्त राष्ट्र मिशन के काउंसलर गौरव कुमार ठाकुर (तस्वीर क्रेडिट@OrissaPOSTLive)

संयुक्त राष्ट्र में भारत का कड़ा रुख,अल्पसंख्यक रिपोर्ट को बताया ‘तथ्यों के विपरीत’ और ‘शत्रुतापूर्ण’

संयुक्त राष्ट्र,20 मार्च (युआईटीवी)- संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भारत ने एक बार फिर अपनी स्पष्ट और सख्त कूटनीतिक स्थिति का प्रदर्शन किया है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की जिनेवा में आयोजित बैठक के दौरान भारत ने अल्पसंख्यक मामलों से संबंधित एक रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज कर दिया। भारत के संयुक्त राष्ट्र मिशन के काउंसलर गौरव कुमार ठाकुर ने इस रिपोर्ट को “तथ्यों के विपरीत” और भारत के प्रति “स्पष्ट रूप से शत्रुतापूर्ण” करार दिया।

यह रिपोर्ट फर्नांडो लेवराट द्वारा तैयार की गई थी,जो अल्पसंख्यक मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष रैपोर्टियर के रूप में कार्य करते हैं। विशेष रैपोर्टियर स्वतंत्र विशेषज्ञ होते हैं,जो अपने-अपने विषयों पर व्यक्तिगत क्षमता में रिपोर्ट तैयार करते हैं। हालाँकि,उनकी रिपोर्ट को अक्सर व्यापक अंतर्राष्ट्रीय ध्यान मिलता है,लेकिन यह जरूरी नहीं कि वे संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक या सामूहिक राय को दर्शाती हों।

गौरव कुमार ठाकुर ने परिषद के सामने अपने वक्तव्य में कहा कि लेवराट की रिपोर्ट में किए गए दावे न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत हैं,बल्कि वे भारत के सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ की समझ के बिना प्रस्तुत किए गए हैं। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट की भाषा और दृष्टिकोण यह संकेत देते हैं कि इसमें भारत के प्रति पूर्वाग्रह और शत्रुतापूर्ण मानसिकता झलकती है।

रिपोर्ट में विशेष रूप से वक्फ़ संशोधन अधिनियम को लेकर चिंता जताई गई थी। लेवराट ने दावा किया था कि यह कानून मुस्लिम समुदायों की अपने धार्मिक स्थलों के स्वामित्व और संचालन की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए ठाकुर ने स्पष्ट किया कि इस अधिनियम का उद्देश्य पूरी तरह प्रगतिशील है और यह पारदर्शिता,लैंगिक समानता तथा बेहतर प्रशासन को बढ़ावा देने के लिए लाया गया है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि यह कानून न केवल मुस्लिम समुदाय के हितों की रक्षा करता है,बल्कि बोहरा और अगाखानी जैसे अल्पसंख्यक मुस्लिम संप्रदायों को भी सशक्त बनाता है। ठाकुर के अनुसार,यह अधिनियम इन समुदायों को अपने धार्मिक स्थलों की स्थापना और प्रबंधन के अधिकार को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करता है,जो भारत के बहुलतावादी ढाँचे को और मजबूत करता है।

भारत के प्रतिनिधि ने यह भी आरोप लगाया कि इस रिपोर्ट के निष्कर्ष कुछ चुनिंदा संगठनों के साथ सीमित परामर्श पर आधारित हैं,जिनका उद्देश्य भारत के बहुसांस्कृतिक स्वरूप को गलत तरीके से प्रस्तुत करना है। उन्होंने विशेष रूप से न्यूयॉर्क स्थित एक संगठन का उल्लेख करते हुए कहा कि इस तरह के स्रोतों पर आधारित निष्कर्ष निष्पक्ष नहीं माने जा सकते।

ठाकुर ने अपने बयान में भारत की लोकतांत्रिक परंपरा और संवैधानिक ढाँचे को रेखांकित करते हुए कहा कि देश अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा और उन्हें सशक्त बनाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि भारत का संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करता है और विभिन्न धर्मों,भाषाओं और संस्कृतियों के लोगों को अपनी पहचान बनाए रखने की पूरी स्वतंत्रता देता है।

उन्होंने यह भी बताया कि भारत में अल्पसंख्यक समुदायों को शैक्षिक संस्थान स्थापित करने और उनका संचालन करने का अधिकार प्राप्त है। इसके साथ ही वे अपनी पसंद की भाषा में शिक्षा देने के लिए स्वतंत्र हैं,जो देश की विविधता और समावेशी नीति का प्रतीक है।

वक्फ़ संशोधन अधिनियम के प्रावधानों पर प्रकाश डालते हुए ठाकुर ने कहा कि इसमें महिलाओं के अधिकारों को विशेष महत्व दिया गया है। इस कानून के तहत केंद्रीय वक्फ़ परिषद और राज्य वक्फ़ बोर्डों में कम से कम दो मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की गई है। इसके अलावा,महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकारों को भी मजबूत किया गया है,जो लैंगिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

उन्होंने यह भी कहा कि इस संशोधन में विभिन्न मुस्लिम संप्रदायों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का प्रावधान है,जिससे वक्फ़ संस्थाओं का संचालन अधिक समावेशी और संतुलित हो सके। यह कदम प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ाने में मदद करेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल एक रिपोर्ट तक सीमित नहीं है,बल्कि यह अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर देशों के बीच दृष्टिकोण के अंतर को भी दर्शाता है। भारत लगातार यह रुख अपनाता रहा है कि उसकी आंतरिक नीतियों और कानूनों का मूल्यांकन उसके अपने सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ में किया जाना चाहिए,न कि बाहरी दृष्टिकोण से।

यह मामला ऐसे समय में सामने आया है,जब वैश्विक स्तर पर मानवाधिकार और अल्पसंख्यक अधिकारों को लेकर चर्चा तेज हो रही है। ऐसे में भारत का यह सख्त रुख यह संकेत देता है कि वह अपनी संप्रभुता और नीतिगत स्वतंत्रता को लेकर कोई समझौता नहीं करना चाहता।

संयुक्त राष्ट्र में भारत की यह प्रतिक्रिया न केवल उस रिपोर्ट का खंडन है,बल्कि यह उसके व्यापक कूटनीतिक दृष्टिकोण को भी दर्शाती है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने बहुलतावादी समाज और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और किसी भी बाहरी आलोचना का तथ्यों और तर्कों के आधार पर जवाब देने के लिए तैयार है।