तेहरान,26 मार्च (युआईटीवी)- मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के संबंधों को लेकर एक नई स्थिति सामने आई है। ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने स्पष्ट किया है कि दोनों देशों के बीच किसी प्रकार की प्रत्यक्ष बातचीत नहीं हो रही है,बल्कि हाल के दिनों में केवल मध्यस्थ देशों के माध्यम से संदेशों का आदान-प्रदान हुआ है। उन्होंने यह भी साफ किया कि इसे किसी भी रूप में वार्ता या संवाद नहीं कहा जा सकता।
सरकारी टीवी चैनल आईआरआईबी को दिए गए एक इंटरव्यू में अराघची ने कहा कि अमेरिकी पक्ष पिछले कुछ दिनों से विभिन्न मित्र देशों के माध्यम से संदेश भेज रहा है। इन संदेशों के जवाब में ईरान ने अपनी स्थिति स्पष्ट की है और आवश्यक होने पर चेतावनी भी जारी की है। उन्होंने कहा कि जब इस तरह से संदेशों का आदान-प्रदान होता है,तो यह कूटनीतिक बातचीत की श्रेणी में नहीं आता,बल्कि यह केवल एक सीमित संचार प्रक्रिया होती है।
अराघची का यह बयान ऐसे समय आया है,जब क्षेत्र में हालिया घटनाओं के कारण तनाव चरम पर पहुँच गया है। फरवरी के अंत में इज़रायल और अमेरिका द्वारा ईरान के कई शहरों, विशेष रूप से राजधानी तेहरान पर किए गए संयुक्त हमलों के बाद से हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं। इन हमलों में कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी और नागरिकों के मारे जाने की खबरें सामने आई थीं,जिससे स्थिति और अधिक गंभीर हो गई।
ईरानी विदेश मंत्री ने कहा कि इन हमलों के बाद से तेहरान ने वाशिंगटन के साथ किसी भी प्रकार की प्रत्यक्ष बातचीत नहीं की है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ईरान की नीति स्पष्ट है और वह अपने सिद्धांतों से पीछे हटने वाला नहीं है। उनके अनुसार,ईरान ने अपने संदेशों में अमेरिका को देश के बुनियादी ढाँचे पर हमले से बचने की कड़ी चेतावनी दी थी। उन्होंने दावा किया कि इस चेतावनी के बाद अमेरिका ने 48 घंटों के भीतर ईरानी बिजली संयंत्रों पर हमले की अपनी योजना वापस ले ली।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान ने भी विवाद को और बढ़ा दिया है। ट्रंप ने हाल ही में दावा किया था कि ईरान अमेरिका के साथ बातचीत कर रहा है और युद्ध को समाप्त करने के लिए समझौते की दिशा में बढ़ रहा है। हालाँकि,अराघची के ताजा बयान ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया है और यह स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल किसी भी प्रकार की औपचारिक वार्ता नहीं हो रही है।
ईरान की रणनीति पर प्रकाश डालते हुए अराघची ने कहा कि उनका देश युद्ध नहीं चाहता,लेकिन वह अपनी सुरक्षा और संप्रभुता से समझौता भी नहीं करेगा। उन्होंने कहा, “हमने इस युद्ध की शुरुआत नहीं की है और हम इसे इस तरह समाप्त करना चाहते हैं कि भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति न हो।” यह बयान दर्शाता है कि ईरान एक स्थायी समाधान चाहता है,न कि अस्थायी युद्धविराम।
अराघची ने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान पारंपरिक अर्थों में युद्धविराम का पक्षधर नहीं है। उनके अनुसार,युद्धविराम केवल एक अस्थायी समाधान होता है,जिससे भविष्य में फिर से संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। उन्होंने इसे एक “दुष्चक्र” करार दिया,जिसमें पहले बातचीत होती है,फिर संघर्ष और फिर अस्थायी शांति स्थापित होती है। ईरान इस चक्र से बाहर निकलना चाहता है और एक ऐसा समाधान चाहता है,जो दीर्घकालिक शांति सुनिश्चित कर सके।
ईरान की मौजूदा नीति पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि देश “प्रतिरोध” की नीति पर कायम है और अपनी रक्षा के लिए हर आवश्यक कदम उठाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वर्तमान परिस्थितियों में किसी भी प्रकार की सीधी बातचीत की कोई योजना नहीं है। यह संकेत है कि आने वाले समय में तनाव कम होने की संभावना फिलहाल कम ही दिखाई दे रही है।
इस पूरे संकट में एक महत्वपूर्ण बिंदु होर्मुज जलडमरूमध्य भी है,जो वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है। अराघची ने कहा कि यह जलमार्ग ईरान और ओमान के प्रादेशिक जल का हिस्सा है और ईरान इसकी सुरक्षा और नियंत्रण को लेकर गंभीर है। उन्होंने बताया कि ईरान इस क्षेत्र में सुरक्षित आवागमन के लिए नई व्यवस्थाओं का अध्ययन कर रहा है।
हालिया घटनाओं के दौरान ईरान ने इस जलडमरूमध्य पर कड़ा नियंत्रण स्थापित कर दिया था और इजरायल तथा अमेरिका से जुड़े जहाजों के लिए मार्ग को सीमित कर दिया था। इसका असर वैश्विक तेल बाजार और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ा है,जिससे कई देशों की चिंता बढ़ गई है।
हमलों के जवाब में ईरान ने भी आक्रामक रुख अपनाया है। उसने मध्य पूर्व में अमेरिकी और इजरायली ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। इन जवाबी कार्रवाइयों ने क्षेत्र में संघर्ष को और तेज कर दिया है और स्थिति को एक व्यापक युद्ध की ओर धकेलने की आशंका बढ़ा दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय दोनों पक्षों के बीच प्रत्यक्ष बातचीत का अभाव स्थिति को और जटिल बना रहा है। हालाँकि,मध्यस्थ देशों के माध्यम से संदेशों का आदान-प्रदान यह संकेत देता है कि कूटनीतिक रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। फिर भी,जब तक औपचारिक वार्ता शुरू नहीं होती,तब तक किसी ठोस समाधान की संभावना कम ही मानी जा रही है।
ईरान और अमेरिका के बीच जारी यह तनाव केवल दो देशों तक सीमित नहीं है,बल्कि इसका प्रभाव पूरे मध्य पूर्व और वैश्विक राजनीति पर पड़ रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह संदेशों का आदान-प्रदान किसी ठोस वार्ता में बदल पाता है या फिर स्थिति और अधिक गंभीर होती जाती है। फिलहाल,ईरान का रुख स्पष्ट है—बातचीत नहीं,बल्कि अपने हितों और सुरक्षा की रक्षा के लिए दृढ़ प्रतिरोध।
