तेहरान,27 मार्च (युआईटीवी)- मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के बीच एक नया और चिंताजनक मोड़ सामने आया है। ईरान, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात के होटल मालिकों को एक सख्त चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि यदि वे अमेरिकी सैन्य कर्मियों को अपने यहाँ ठहराते हैं,तो उनकी संपत्तियों को वैध सैन्य लक्ष्य माना जा सकता है। इस अल्टीमेटम ने पूरे क्षेत्र में सुरक्षा और कूटनीतिक चिंताओं को और बढ़ा दिया है।
अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी के हवाले से आई रिपोर्ट के अनुसार,हाल के दिनों में ईरान द्वारा किए गए हमलों और उसके सहयोगी उग्रवादी समूहों के साथ संयुक्त अभियानों के बाद अमेरिकी सैन्य कर्मियों ने क्षेत्रीय होटलों में शरण लेनी शुरू कर दी है। बताया जा रहा है कि इन अभियानों में पूरे मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य ढाँचे को निशाना बनाया गया,जिसके चलते सैनिकों को वैकल्पिक ठिकानों की तलाश करनी पड़ी।
इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए ईरान ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जो भी स्थान विदेशी सैन्य कर्मियों को पनाह देंगे,उन्हें भी सैन्य कार्रवाई के दायरे में माना जाएगा। यह चेतावनी तत्काल प्रभाव से लागू मानी जा रही है, जिससे क्षेत्र के होटल उद्योग और नागरिक ठिकानों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
रिपोर्टों के अनुसार,अमेरिकी सैन्य कर्मियों की मौजूदगी अब केवल पारंपरिक सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं रही है। बताया गया है कि उन्होंने नागरिक स्थलों,जैसे होटलों और कार्यालय परिसरों में भी अपनी गतिविधियाँ बढ़ा दी हैं। उदाहरण के तौर पर,बेरूत के पुराने एयरपोर्ट के पास एक लॉजिस्टिक्स बेस, और दमिश्क में ‘रिपब्लिक पैलेस’, ‘फोर सीजन्स’ तथा ‘शेरेटन’ जैसे प्रमुख होटलों में सलाहकार गतिविधियों के संचालन का दावा किया गया है।
इसके अलावा,इस सप्ताह अमेरिकी मरीन सैनिकों की आवाजाही को लेकर भी रिपोर्ट सामने आई है। बताया गया है कि उन्हें इस्तांबुल और सोफिया के रास्ते जिबूती अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे तक पहुँचाया गया है। यह गतिविधियाँ इस बात की ओर संकेत करती हैं कि क्षेत्र में सैन्य पुनर्संयोजन और रणनीतिक बदलाव जारी हैं।
इस पूरे मामले पर ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने खाड़ी देशों के होटलों को सीधे तौर पर चेतावनी देते हुए कहा कि वे अमेरिकी सैन्य कर्मियों को अपने यहां जगह न दें। अराघची ने आरोप लगाया कि अमेरिकी सैनिक अपने सैन्य ठिकानों से भागकर नागरिक स्थलों में छिप रहे हैं और स्थानीय नागरिकों को ‘मानव ढाल’ के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।
सोशल मीडिया पर अपने बयान में अराघची ने कहा कि इस संघर्ष की शुरुआत से ही अमेरिकी सैनिक खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के सैन्य ठिकानों से हटकर होटलों और कार्यालयों में शरण ले रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी गतिविधियाँ न केवल अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों के खिलाफ हैं,बल्कि इससे आम नागरिकों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ रही है।
उन्होंने अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए एक तुलना भी की। उनके अनुसार,अमेरिका में कई होटल ऐसे अधिकारियों को ठहराने से मना कर देते हैं,जिनसे अन्य ग्राहकों की सुरक्षा को खतरा हो सकता है। इसी तर्ज पर उन्होंने खाड़ी देशों के होटल मालिकों से भी ऐसी ही नीति अपनाने का आग्रह किया है।
इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में इजरायल और अमेरिका के साथ ईरान का जारी संघर्ष है, जो 28 फरवरी से लगातार बढ़ता जा रहा है। इस संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है और इसके असर दूर-दूर तक महसूस किए जा रहे हैं।
रिपोर्टों के अनुसार,इस संघर्ष में दोनों पक्षों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। ईरान के कई वरिष्ठ सैन्य कमांडर और हजारों नागरिक मारे गए हैं,जबकि दूसरी ओर अमेरिका और उसके सहयोगियों को भी जवाबी कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की यह चेतावनी केवल एक सैन्य बयान नहीं है,बल्कि यह एक रणनीतिक संदेश भी है। इसके जरिए वह यह स्पष्ट करना चाहता है कि वह अपने विरोधियों को किसी भी स्तर पर चुनौती देने के लिए तैयार है,चाहे इसके लिए नागरिक ठिकानों को लेकर भी सख्त रुख क्यों न अपनाना पड़े।
हालाँकि,इस तरह के बयानों और कदमों ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में चिंता बढ़ा दी है। कई देशों और संगठनों ने इस बात पर जोर दिया है कि नागरिक स्थलों को किसी भी स्थिति में संघर्ष का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए। यदि ऐसा होता है,तो इससे मानवीय संकट और गहरा सकता है।
मध्य पूर्व की मौजूदा स्थिति बेहद संवेदनशील और जटिल बनी हुई है। ईरान की यह चेतावनी इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में तनाव और बढ़ सकता है। ऐसे में वैश्विक समुदाय के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह इस संघर्ष को शांत करने और क्षेत्र में स्थिरता बहाल करने के लिए प्रभावी कदम उठाए।
