नई दिल्ली,7 अप्रैल (युआईटीवी)- पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में न्यायिक अधिकारियों को कथित तौर पर बंधक बनाए जाने की घटना पर सख्त रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने इस मामले की जाँच राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) को सौंपने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने यह कदम घटना की गंभीरता और राज्य पुलिस पर लगे आरोपों को देखते हुए उठाया है।
दरअसल,एक अप्रैल को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के कालियाचौक क्षेत्र में उस समय हड़कंप मच गया था,जब एसआईआर (स्पेशल इंस्पेक्शन रिपोर्ट) के लिए तैनात सात न्यायिक अधिकारियों को एक बीडीओ ऑफिस में कई घंटों तक कथित तौर पर बंधक बनाकर रखा गया। इस घटना ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे।
इस मामले पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक रिट याचिका दर्ज की और सोमवार को इसकी सुनवाई की। सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष एक सीलबंद लिफाफे में प्रारंभिक स्टेटस रिपोर्ट पेश की गई,जिस पर कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि मामले में लगाए गए आरोप बेहद गंभीर हैं और इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच,जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली शामिल थे,ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल किया। अदालत ने आदेश दिया कि इस घटना से जुड़ी पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा दर्ज सभी 12 एफआईआर की जांच अब एनआईए करेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि राज्य पुलिस के कुछ सदस्यों के खिलाफ गंभीर आरोप लगे हैं,ऐसे में एक स्वतंत्र और निष्पक्ष एजेंसी द्वारा जाँच कराया जाना आवश्यक है। अदालत ने यह भी कहा कि न्यायपालिका को डराने-धमकाने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और इस तरह की घटनाएँ लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा हैं।
कोर्ट ने एनआईए को यह भी अधिकार दिया कि यदि जांच के दौरान किसी बड़ी साजिश,अन्य अपराधों या और लोगों की संलिप्तता का खुलासा होता है,तो एजेंसी नई एफआईआर दर्ज कर सकती है। इस फैसले से साफ है कि अदालत इस मामले की तह तक जाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि एनआईए समय-समय पर अपनी जाँच की प्रगति रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश करेगी। इसके बाद एजेंसी कोलकाता स्थित विशेष एनआईए कोर्ट में अपनी अंतिम रिपोर्ट दाखिल करेगी। इससे यह सुनिश्चित होगा कि जाँच की निगरानी शीर्ष अदालत के स्तर पर होती रहे।
अदालत ने पश्चिम बंगाल पुलिस को भी कड़े निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि अब तक इस मामले में जुटाए गए सभी सबूत,केस डायरी और अन्य संबंधित सामग्री एनआईए को तत्काल सौंप दी जाए। साथ ही,राज्य पुलिस को जाँच में हर संभव सहयोग और लॉजिस्टिक सहायता देने का भी आदेश दिया गया है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने दो अप्रैल को ही इस घटना पर गंभीर चिंता जताई थी। उस समय अदालत ने इसे न्यायपालिका को डराने-धमकाने की “खुली कोशिश” करार दिया था और कहा था कि यह न्यायिक प्रणाली की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है। अदालत ने स्पष्ट किया था कि अगर ऐसी घटनाओं को समय रहते नहीं रोका गया,तो इससे कानून व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख पर गहरा असर पड़ सकता है।
मालदा की यह घटना केवल एक स्थानीय कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं है,बल्कि यह न्यायपालिका की गरिमा और सुरक्षा से जुड़ा मामला बन गया है। न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाए जाने की खबर ने पूरे देश में चिंता पैदा कर दी थी और विभिन्न वर्गों से इसकी कड़ी निंदा की गई थी।
अब जब जाँच एनआईए को सौंप दी गई है,तो उम्मीद की जा रही है कि इस मामले में निष्पक्ष और तेज कार्रवाई होगी। साथ ही,यह भी देखा जाएगा कि क्या इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश थी या यह केवल स्थानीय स्तर पर हुई अराजकता का परिणाम था।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल इस मामले में न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है,बल्कि यह भी संदेश देता है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सम्मान के साथ किसी भी तरह का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।
