सुप्रीम कोर्ट

महिला आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई,विशेष सत्र से पहले राजनीतिक हलचल तेज

नई दिल्ली,13 अप्रैल (युआईटीवी)- देश में महिला आरक्षण के मुद्दे पर एक बार फिर सियासी और कानूनी हलचल तेज हो गई है। संसद के आगामी विशेष सत्र से ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट सोमवार को उस याचिका पर सुनवाई करने जा रहा है,जिसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को तत्काल लागू करने की माँग की गई है। इस मामले को लेकर न केवल न्यायिक,बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी व्यापक बहस शुरू हो गई है।

सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड की गई सूची के अनुसार,न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान की पीठ इस याचिका पर सुनवाई करेगी। यह याचिका कांग्रेस नेता जया ठाकुर द्वारा दायर की गई है। याचिका में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि महिलाओं को आरक्षण देने का प्रावधान अब और टाला नहीं जाना चाहिए और इसे तत्काल प्रभाव से लागू किया जाना चाहिए।

इस याचिका में नारी शक्ति वंदन अधिनियम को जल्द लागू करने की माँग की गई है,जो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों के आरक्षण का प्रावधान करता है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि देश की लगभग आधी आबादी होने के बावजूद महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व अभी भी बहुत कम है,जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।

हालाँकि,नवंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून के एक महत्वपूर्ण प्रावधान पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि इसे रद्द करना आसान नहीं होगा। कानून में यह प्रावधान किया गया है कि महिला आरक्षण को अगली जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के पूरा होने के बाद ही लागू किया जाएगा। अदालत ने संकेत दिया था कि इस तरह की शर्तें विधायी प्रक्रिया का हिस्सा हैं और इन्हें बदलना न्यायिक हस्तक्षेप के दायरे से बाहर हो सकता है।

याचिका में इस तर्क का विरोध करते हुए कहा गया है कि सीटों की संख्या पहले से तय है और आरक्षण लागू करने के लिए जनगणना या परिसीमन का इंतजार करना जरूरी नहीं है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह शर्तें महिलाओं को उनके अधिकार से वंचित करने का कारण बन रही हैं और इसे हटाया जाना चाहिए।

इस पूरे मामले को और भी महत्वपूर्ण बना देता है संसद का आगामी विशेष सत्र,जो 16 अप्रैल से शुरू होने जा रहा है। इस सत्र में महिला आरक्षण (संशोधन) विधेयक पर चर्चा होने की संभावना है। इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के दोनों सदनों में सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को पत्र लिखकर इस विधेयक को सर्वसम्मति से पारित करने की अपील की है।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पत्र में कहा कि भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाना बेहद जरूरी है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि इस कानून को “इसके सही अर्थों में” लागू किया जाए,ताकि महिलाओं को राजनीतिक निर्णय लेने की प्रक्रिया में बराबरी का अवसर मिल सके।

हालाँकि,इस विशेष सत्र को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं। कांग्रेस पार्टी ने इस सत्र के आयोजन के समय पर आपत्ति जताते हुए इसे आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन बताया है। पार्टी का कहना है कि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव प्रचार चल रहा है,ऐसे में इस तरह का विशेष सत्र बुलाना चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।

कांग्रेस ने यह भी माँग की है कि महिला आरक्षण के कार्यान्वयन से पहले परिसीमन के मुद्दे पर सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुलाई जानी चाहिए। पार्टी का तर्क है कि जब तक परिसीमन की प्रक्रिया पूरी नहीं होती,तब तक आरक्षण को लागू करना व्यावहारिक नहीं होगा और इससे कई तकनीकी और राजनीतिक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल कानूनी या राजनीतिक नहीं,बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। भारत में लंबे समय से महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की माँग उठती रही है,लेकिन इसे लागू करने में लगातार देरी होती रही है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई और संसद का विशेष सत्र,दोनों ही इस दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

महिला आरक्षण को लेकर देशभर में अलग-अलग विचारधाराएँ भी देखने को मिल रही हैं। एक ओर जहाँ इसे महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है,वहीं दूसरी ओर कुछ वर्ग इसे लागू करने की प्रक्रिया और समय को लेकर सवाल उठा रहे हैं। खासतौर पर परिसीमन और जनगणना से जुड़े मुद्दे इस बहस के केंद्र में हैं।

फिलहाल,सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई पर टिकी हुई हैं, जहाँ यह तय होगा कि क्या महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को तत्काल लागू करने का रास्ता साफ हो सकता है या फिर इसे मौजूदा कानूनी प्रक्रिया के तहत ही आगे बढ़ाया जाएगा। साथ ही, संसद के विशेष सत्र में होने वाली चर्चा भी इस मुद्दे की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगी।

महिला आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि न्यायपालिका और विधायिका इस महत्वपूर्ण विषय पर किस तरह का निर्णय लेती हैं और क्या देश की आधी आबादी को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में उनका हक जल्द मिल पाता है या नहीं।