नई दिल्ली,15 अप्रैल (युआईटीवी)- पंजाब की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद अशोक मित्तल और उनके परिवार से जुड़े ठिकानों पर की गई छापेमारी ने सियासी हलकों में हलचल मचा दी है। इस कार्रवाई के बाद आम आदमी पार्टी (आप) ने केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी पर तीखा हमला बोला है और इसे चुनावी साजिश करार दिया है।
आप नेताओं का कहना है कि जैसे-जैसे पंजाब में आगामी चुनाव नजदीक आ रहे हैं,वैसे-वैसे केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल विपक्षी नेताओं को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है। पार्टी का आरोप है कि यह कार्रवाई राजनीतिक प्रेरित है और इसका मकसद विपक्ष को कमजोर करना है। इस मुद्दे पर पार्टी के कई बड़े नेताओं ने खुलकर अपनी प्रतिक्रिया दी है।
दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक तीखा बयान जारी किया। उन्होंने लिखा कि जब भी किसी राज्य में चुनाव आते हैं,तो प्रधानमंत्री की “चुनावी फौज” सबसे पहले ईडी और सीबीआई के रूप में पहुँचती है। उन्होंने आरोप लगाया कि पहले छापेमारी का माहौल बनाया जाता है,फिर सामाजिक तनाव पैदा करने की कोशिश होती है और अंत में शीर्ष नेतृत्व के दौरे होते हैं। सिसोदिया ने अपने बयान में यह भी कहा कि पंजाब की जनता ऐसी राजनीति को स्वीकार नहीं करेगी और यहाँ की जमीन पर ऐसे प्रयास सफल नहीं होंगे।
वहीं,आप के वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने भी इस कार्रवाई को चुनावी रणनीति का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि भाजपा जहाँ भी चुनाव देखती है,वहाँ पहले अपनी एजेंसियों को भेजती है। संजय सिंह के अनुसार,अशोक मित्तल के घर पर ईडी की छापेमारी इसी रणनीति की शुरुआत है। उन्होंने यह भी दावा किया कि इस तरह की कार्रवाई से भाजपा को कोई राजनीतिक फायदा नहीं मिलेगा और पंजाब में पार्टी को हार का सामना करना पड़ेगा।
आप के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनुराग ढांडा ने भी केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि भाजपा अब अपने दम पर चुनाव लड़ने में सक्षम नहीं रही है और उसे एजेंसियों का सहारा लेना पड़ रहा है। ढांडा ने कहा कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है और इससे यह स्पष्ट होता है कि सरकार विपक्ष को दबाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि पंजाब की जनता आम आदमी पार्टी के साथ है और ऐसे कदमों से पार्टी को कोई नुकसान नहीं होगा।
हालाँकि,इस पूरे मामले में अभी तक ईडी या केंद्र सरकार की ओर से कोई आधिकारिक विस्तृत बयान सामने नहीं आया है। एजेंसी की कार्रवाई किन आरोपों और किन मामलों से जुड़ी है,इस पर भी स्पष्ट जानकारी का इंतजार किया जा रहा है,लेकिन राजनीतिक बयानबाजी ने इस मुद्दे को काफी गर्मा दिया है और यह अब केवल कानूनी कार्रवाई का मामला नहीं रह गया,बल्कि सियासी विवाद का केंद्र बन गया है।
विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी राज्यों में इस तरह की कार्रवाइयों को लेकर अक्सर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप देखने को मिलते हैं। विपक्षी दल जहाँ इसे सत्ता पक्ष की रणनीति बताते हैं,वहीं सत्तारूढ़ दल इसे कानून के तहत की गई कार्रवाई करार देता है। ऐसे में सच्चाई का निर्धारण जाँच एजेंसियों की पारदर्शिता और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही संभव होता है।
पंजाब की राजनीति पहले से ही संवेदनशील मानी जाती है,जहाँ क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा रहती है। ऐसे में इस तरह की घटनाएँ चुनावी माहौल को और भी ज्यादा प्रभावित कर सकती हैं। आम आदमी पार्टी,जो फिलहाल राज्य में मजबूत स्थिति में मानी जाती है,इस मुद्दे को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश कर रही है और इसे केंद्र बनाम राज्य के रूप में पेश कर रही है।
दूसरी ओर,भाजपा की ओर से इस मामले पर अभी तक खुलकर प्रतिक्रिया नहीं आई है,लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है। खासकर तब,जब पंजाब में चुनावी गतिविधियाँ तेज होंगी और सभी दल अपने-अपने तरीके से मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश करेंगे।
अशोक मित्तल से जुड़े ठिकानों पर ईडी की छापेमारी ने पंजाब की सियासत को गरमा दिया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में इस मामले में क्या नए तथ्य सामने आते हैं और इसका चुनावी राजनीति पर क्या असर पड़ता है। फिलहाल,आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है और राजनीतिक माहौल लगातार गर्म होता जा रहा है।
