वाशिंगटन,15 अप्रैल (युआईटीवी)- मध्य पूर्व में लंबे समय से जारी तनाव के बीच एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल देखने को मिली है। अमेरिका की मध्यस्थता में इजरायल और लेबनान के बीच एक दुर्लभ और उच्च स्तरीय सीधी बैठक आयोजित की गई,जिसे क्षेत्रीय राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। पिछले लगभग 30 वर्षों में यह पहला अवसर है,जब दोनों देशों ने इस स्तर पर आमने-सामने बातचीत की है।
इस महत्वपूर्ण बैठक की मेजबानी अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने की। उन्होंने इसे “ऐतिहासिक अवसर” करार देते हुए कहा कि यह पहल केवल तत्काल युद्धविराम तक सीमित नहीं है,बल्कि इसका उद्देश्य क्षेत्र में लंबे समय से जारी अस्थिरता को स्थायी रूप से समाप्त करना है। रुबियो के अनुसार,इस संवाद के जरिए उन कारकों को खत्म करने की कोशिश की जा रही है,जो पिछले दो-तीन दशकों से संघर्ष को बढ़ावा देते रहे हैं।
बैठक में अमेरिका के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ-साथ इजरायल और लेबनान के राजदूत भी शामिल हुए। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने इस वार्ता को उपयोगी और सकारात्मक बताया है। सभी पक्षों ने इस बात पर सहमति जताई कि आने वाले समय में तय स्थान और समय पर सीधी बातचीत का सिलसिला जारी रखा जाएगा। यह सहमति इस बात का संकेत है कि दोनों देश अपने मतभेदों को सुलझाने के लिए एक स्थायी कूटनीतिक रास्ता तलाशने के इच्छुक हैं।
अमेरिका ने इस दौरान लेबनान की उस नीति का समर्थन किया,जिसके तहत देश में केवल सरकार के पास ही सैन्य शक्ति होनी चाहिए। इस कदम का उद्देश्य हिजबुल्लाह जैसे गैर-सरकारी सशस्त्र संगठनों के प्रभाव को खत्म करना है,जिनकी भूमिका क्षेत्रीय तनाव में महत्वपूर्ण रही है। अमेरिका का मानना है कि लेबनान के नागरिक लंबे समय से हिजबुल्लाह और ईरान की आक्रामक नीतियों का खामियाजा भुगत रहे हैं।
वहीं,अमेरिका ने इजरायल के आत्मरक्षा के अधिकार को भी दोहराया। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि इजरायल को हिजबुल्लाह के हमलों से अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने का पूरा अधिकार है। हालाँकि,अमेरिका ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी स्थायी समाधान के लिए दोनों देशों के बीच सीधी सहमति जरूरी होगी और यह प्रक्रिया किसी तीसरे माध्यम से नहीं चल सकती।
इजरायल ने इस बैठक में अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि वह लेबनान में मौजूद सभी गैर-सरकारी आतंकी संगठनों को निःशस्त्र करने का समर्थन करता है। साथ ही उसने यह भी कहा कि क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने के लिए वह सीधी बातचीत के लिए प्रतिबद्ध है। इजरायल के इस रुख को क्षेत्र में स्थिरता लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।
दूसरी ओर,लेबनान ने नवंबर 2024 में हुए युद्धविराम समझौते को पूरी तरह लागू करने की मांग उठाई। उसने अपनी क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता पर जोर देते हुए कहा कि देश में जारी मानवीय संकट को खत्म करने के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए। लेबनान का यह भी कहना है कि सीमा पर लगातार हो रही झड़पों को रोकना बेहद जरूरी है,ताकि आम नागरिकों को राहत मिल सके।
वाशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार,यह बैठक वाशिंगटन में एक कार्य समूह के रूप में आयोजित की गई थी,जिसका मुख्य उद्देश्य युद्धविराम को मजबूत करना और सीमा पर बढ़ती हिंसा को रोकना था। यह बैठक दो घंटे से अधिक समय तक चली,जिसमें दोनों पक्षों ने अपने-अपने दृष्टिकोण रखे और संभावित समाधान पर चर्चा की।
इसी बीच द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि यह वार्ता ऐसे समय में हुई है जब दक्षिणी लेबनान में संघर्ष जारी है। इससे यह स्पष्ट होता है कि स्थिति अभी भी बेहद नाजुक बनी हुई है और किसी भी समय तनाव बढ़ सकता है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि इजरायल और लेबनान के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं,जिससे बातचीत की प्रक्रिया और भी जटिल हो जाती है।
मार्को रुबियो ने इस पूरी प्रक्रिया को लंबी और जटिल बताते हुए कहा कि यह एक दिन में पूरा होने वाला काम नहीं है। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह वार्ता एक ऐसे ढाँचे को तैयार करने में मदद करेगी,जो भविष्य में स्थायी और टिकाऊ शांति का आधार बन सके। उनके अनुसार,यदि यह प्रयास सफल होता है तो इससे इजरायल के नागरिक बिना भय के जीवन जी सकेंगे और लेबनान के लोगों को भी बेहतर भविष्य की उम्मीद मिलेगी।
इतिहास पर नजर डालें तो इजरायल और लेबनान के बीच संबंध हमेशा तनावपूर्ण रहे हैं। सीमा विवाद,राजनीतिक मतभेद और हिजबुल्लाह जैसे संगठनों की भूमिका ने इस तनाव को और बढ़ाया है। दोनों देशों के बीच सीधी बातचीत के प्रयास बहुत कम हुए हैं और जो हुए भी,वे अक्सर लंबे समय तक टिक नहीं पाए।
ऐसे में यह नई पहल उम्मीद की एक किरण के रूप में देखी जा रही है। हालाँकि,विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रक्रिया को सफल बनाने के लिए सभी पक्षों को धैर्य और प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ना होगा। साथ ही,क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों को भी इस दिशा में सहयोग करना होगा।
अमेरिका की मध्यस्थता में हुई यह बैठक मध्य पूर्व में शांति स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हालाँकि,यह अभी केवल शुरुआत है और आगे की राह काफी चुनौतीपूर्ण है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह पहल वास्तव में क्षेत्र में स्थायी शांति ला पाती है या फिर यह भी पिछले प्रयासों की तरह अधूरी रह जाती है। फिलहाल,इस ऐतिहासिक वार्ता ने वैश्विक स्तर पर उम्मीदों को जरूर बढ़ा दिया है।
