वाशिंगटन,16 मई (युआईटीवी)- डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच हुई हालिया लंबी बातचीत ने वैश्विक राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के शीर्ष नेताओं के बीच यह वार्ता ऐसे समय में हुई है,जब अमेरिका और चीन के रिश्ते कई मुद्दों पर तनावपूर्ण बने हुए हैं। बातचीत में ताइवान, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस,ईरान,व्यापार,साइबर ऑपरेशन्स और परमाणु हथियारों में कमी जैसे संवेदनशील और रणनीतिक विषय शामिल रहे। ट्रंप ने इस बैठक को “ऐतिहासिक” बताते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच मतभेदों के बावजूद कई अहम मुद्दों पर बेहतर समझ विकसित हुई है।
अलास्का के एंकरेज जाते समय एयरफोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत करते हुए ट्रंप ने कहा कि उन्होंने और शी जिनपिंग ने कई अंतरराष्ट्रीय विषयों पर खुलकर विचार साझा किए। ट्रंप ने चीनी राष्ट्रपति की तारीफ करते हुए कहा कि वह एक बेहद प्रभावशाली और समझदार नेता हैं। उन्होंने कहा, “राष्ट्रपति शी शानदार व्यक्ति हैं। हमने बहुत अच्छा समय बिताया और मुझे लगता है कि ये बातचीत इतिहास में महत्वपूर्ण मानी जाएगी।”
इस वार्ता में सबसे ज्यादा चर्चा ताइवान को लेकर हुई। ताइवान लंबे समय से अमेरिका और चीन के बीच तनाव का सबसे बड़ा कारण रहा है। चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है,जबकि ताइवान खुद को एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक व्यवस्था के रूप में देखता है। अमेरिका आधिकारिक तौर पर “वन चाइना पॉलिसी” को मानता है,लेकिन वह ताइवान को सैन्य और तकनीकी सहायता भी देता रहा है। यही कारण है कि ताइवान का मुद्दा दोनों देशों के बीच बेहद संवेदनशील माना जाता है।
ट्रंप ने बताया कि शी जिनपिंग ने स्पष्ट रूप से कहा कि चीन ताइवान की स्वतंत्रता की किसी भी कोशिश को स्वीकार नहीं करेगा। चीनी राष्ट्रपति का मानना है कि अगर ताइवान में स्वतंत्रता आंदोलन को बढ़ावा मिला,तो इससे बड़े सैन्य संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है। ट्रंप के अनुसार,शी जिनपिंग ने अमेरिका द्वारा ताइवान को हथियार बेचने को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि चीन इस कदम को अपनी सुरक्षा और संप्रभुता के लिए खतरे के रूप में देखता है।
ट्रंप ने यह भी खुलासा किया कि शी जिनपिंग ने उनसे सीधे पूछा कि यदि भविष्य में चीन और ताइवान के बीच सैन्य संघर्ष होता है तो क्या अमेरिका ताइवान की रक्षा करेगा। इस सवाल के जवाब में ट्रंप ने कोई स्पष्ट प्रतिबद्धता नहीं दी। उन्होंने कहा,“मैं इस तरह के मामलों पर सार्वजनिक रूप से चर्चा नहीं करता।” हालाँकि,उन्होंने संकेत दिए कि अमेरिका जल्द ही ताइवान को आगे हथियार बेचने के मुद्दे पर फैसला ले सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह बयान रणनीतिक अस्पष्टता की अमेरिकी नीति का हिस्सा हो सकता है। अमेरिका लंबे समय से ताइवान को लेकर ऐसी नीति अपनाता रहा है,जिसमें वह ताइवान का समर्थन भी करता है और चीन को खुली चुनौती देने से भी बचता है। लेकिन हाल के वर्षों में चीन की सैन्य ताकत और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी बढ़ती गतिविधियों के कारण यह मुद्दा और अधिक संवेदनशील हो गया है।
दोनों नेताओं के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई को लेकर भी विस्तृत चर्चा हुई। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका और चीन इस तकनीक के सुरक्षित और जिम्मेदार इस्तेमाल के लिए मिलकर काम कर सकते हैं। उन्होंने माना कि एआई भविष्य की सबसे प्रभावशाली तकनीकों में से एक है और इसका असर स्वास्थ्य,चिकित्सा,सैन्य,साइबर सुरक्षा और उद्योग सहित लगभग हर क्षेत्र पर पड़ेगा।
ट्रंप ने कहा कि दोनों देशों ने एआई के कारण उत्पन्न होने वाले संभावित खतरों पर भी विचार किया। इनमें जैविक खतरे,साइबर हमले,स्वचालित हथियार प्रणालियाँ और परमाणु सुरक्षा से जुड़े जोखिम शामिल हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका और चीन इस दिशा में वैश्विक सुरक्षा मानक तैयार करने के लिए सहयोग बढ़ा सकते हैं। यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि हाल के वर्षों में एआई तकनीक को लेकर दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा काफी तेज हुई है।
व्यापार के मुद्दे पर ट्रंप ने दावा किया कि चीन ने अमेरिकी विमान निर्माता कंपनी बोइंग से बड़े पैमाने पर विमान खरीदने पर सहमति जताई है। ट्रंप के मुताबिक,चीन 200 से अधिक विमान खरीद सकता है और भविष्य में यह संख्या 750 तक पहुँच सकती है। उन्होंने कहा कि इससे अमेरिकी उद्योग और रोजगार को बड़ा फायदा होगा। ट्रंप ने यह भी बताया कि इन विमानों में इस्तेमाल होने वाले इंजन अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक के होंगे।
अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक संबंध पिछले कई वर्षों से तनावपूर्ण रहे हैं। टैरिफ, तकनीकी प्रतिबंध और व्यापार घाटे को लेकर दोनों देशों के बीच कई बार टकराव हुआ है। ऐसे में बोइंग सौदे को दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
वार्ता में परमाणु हथियारों में कमी और परमाणु निरस्त्रीकरण का मुद्दा भी शामिल रहा। ट्रंप ने कहा कि उन्होंने चीन और रूस के साथ मिलकर दुनिया को परमाणु हथियारों से मुक्त बनाने की संभावना पर चर्चा की। उन्होंने कहा, “न्यूक्लियर मुक्त दुनिया एक शानदार विचार है और अगर दुनिया के बड़े देश मिलकर प्रयास करें तो यह संभव हो सकता है।”
हालाँकि,अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका,चीन और रूस के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के दौर में परमाणु निरस्त्रीकरण का लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं होगा। तीनों देशों के बीच सैन्य संतुलन और सुरक्षा हितों को लेकर गहरे मतभेद मौजूद हैं। इसके बावजूद इस विषय पर चर्चा को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल माना जा रहा है।
साइबर ऑपरेशन्स और जासूसी भी बातचीत का अहम हिस्सा रहे। ट्रंप ने कहा कि दोनों देशों ने साइबर सुरक्षा और निगरानी गतिविधियों पर खुलकर चर्चा की। जब उनसे पूछा गया कि क्या चीन अमेरिका में जासूसी गतिविधियाँ चला रहा है,तो ट्रंप ने जवाब दिया, “हम भी उन पर नजर रखते हैं।” उनका यह बयान दर्शाता है कि दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी अब भी बनी हुई है।
ईरान के मुद्दे पर भी दोनों नेताओं के बीच सहमति दिखाई दी। ट्रंप ने कहा कि शी जिनपिंग इस बात से सहमत हैं कि ईरान को परमाणु हथियार नहीं मिलने चाहिए। यह बयान ऐसे समय में आया है,जब पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ रहा है और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में चिंता बनी हुई है।
इन तमाम चर्चाओं से यह संकेत मिलता है कि अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा और मतभेद जारी रहने के बावजूद दोनों देश संवाद और सहयोग के रास्ते खुले रखना चाहते हैं। ताइवान,व्यापार,तकनीक और सैन्य प्रभाव जैसे मुद्दों पर टकराव की स्थिति बनी हुई है,लेकिन साथ ही दोनों देश यह भी समझते हैं कि वैश्विक स्थिरता के लिए बातचीत जरूरी है।
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के जानकारों का मानना है कि ट्रंप और शी जिनपिंग की यह बातचीत आने वाले समय में अमेरिका-चीन संबंधों की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। हालाँकि,यह भी साफ है कि दोनों देशों के बीच रणनीतिक अविश्वास पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। खासकर ताइवान का मुद्दा अब भी सबसे बड़ा विवाद बना हुआ है और भविष्य में यही विषय दोनों देशों के संबंधों की सबसे बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है।
