अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (तस्वीर क्रेडिट@AIRNewsHindi)

ईरान के साथ शांति समझौते के अंतिम चरण में अमेरिका,ट्रंप बोले- ‘जरूरत पड़ी तो उठाएँगे कड़े कदम’

वॉशिंगटन,21 मई (युआईटीवी)- अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव के बीच अब एक बार फिर शांति समझौते की संभावनाएँ तेज होती नजर आ रही हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि उनकी सरकार ईरान के साथ शांति वार्ता के अंतिम चरण में पहुँच चुकी है और वह ‘सही जवाब’ के लिए कुछ दिन और इंतजार करने को तैयार हैं। हालाँकि,उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि अगर बातचीत सफल नहीं हुई,तो अमेरिका को कुछ “कड़े कदम” उठाने पड़ सकते हैं।

पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि या तो दोनों देशों के बीच समझौता हो जाएगा या फिर अमेरिका को ऐसे फैसले लेने होंगे जो काफी सख्त हो सकते हैं। हालाँकि,उन्होंने उम्मीद जताई कि स्थिति उस मोड़ तक नहीं पहुँचेंगे। ट्रंप के इस बयान को पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है,क्योंकि पिछले कुछ महीनों में अमेरिका,ईरान और इजराइल के बीच हालात काफी संवेदनशील बने हुए हैं।

ट्रंप ने यह भी साफ किया कि वह किसी जल्दबाजी में नहीं हैं और केवल एक सीमित या अस्थायी समझौते से संतुष्ट नहीं होंगे। उन्होंने कहा कि इस बार अमेरिका एक ऐसा समझौता चाहता है,जो व्यापक और स्थायी हो। राष्ट्रपति ने कहा कि वह किसी “आधी-अधूरी डील” के पक्ष में नहीं हैं,जो सिर्फ होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने तक सीमित हो। उन्होंने कहा कि इस बार अमेरिका पूरी स्थिति का स्थायी समाधान चाहता है।

अपने बयान में ट्रंप ने यह भी कहा कि वह चुनावी दबाव में कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहते। उन्होंने कहा कि अक्सर लोग सोचते हैं कि चुनाव करीब आने पर फैसले तेजी से लिए जाते हैं,लेकिन वह इस मामले में किसी प्रकार की जल्दबाजी में नहीं हैं। ट्रंप ने जोर देकर कहा कि अमेरिका केवल ऐसा समझौता करेगा जो उसके हितों और क्षेत्रीय स्थिरता के लिहाज से पूरी तरह संतोषजनक हो।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस दौरान तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन के साथ हुई अपनी हालिया बातचीत का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि बुधवार को दोनों नेताओं के बीच फोन पर बेहद अच्छी चर्चा हुई। माना जा रहा है कि तुर्की इस समय अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है। अंतर्राष्ट्रीय विश्लेषकों के अनुसार तुर्की दोनों पक्षों के साथ अपने संबंधों का इस्तेमाल तनाव कम करने और बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए कर रहा है।

हालाँकि,शांति वार्ता की कोशिशों के बीच ईरान की ओर से लगातार सख्त बयान भी सामने आ रहे हैं। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशन गार्ड्स कॉर्प्स यानी आईआरजीसी ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका और इजराइल की तरफ से फिर कोई हमला किया गया,तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। आईआरजीसी ने कहा कि युद्ध का दायरा पूरे क्षेत्र से बाहर भी फैल सकता है,जिससे वैश्विक स्तर पर गंभीर संकट पैदा हो सकता है।

ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर अमेरिका को कड़ी चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि अगर ईरान के खिलाफ दोबारा युद्ध छेड़ा गया,तो उसके परिणाम अमेरिका के लिए बेहद बड़े और अप्रत्याशित होंगे। अराघची ने अमेरिकी कांग्रेस की एक हालिया रिपोर्ट का जिक्र करते हुए दावा किया कि संघर्ष के दौरान कई विमान नष्ट हुए थे। हालाँकि,उन्होंने इस संबंध में अधिक जानकारी साझा नहीं की।

दरअसल,अमेरिका और ईरान के बीच तनाव इस साल फरवरी में अचानक काफी बढ़ गया था। 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल ने संयुक्त रूप से तेहरान समेत ईरान के कई शहरों पर बड़े सैन्य हमले किए थे। इन हमलों में ईरान के तत्कालीन सर्वोच्च नेता अली खामेनेई,कई वरिष्ठ सैन्य कमांडर और आम नागरिकों की मौत हुई थी। इस घटना ने पूरे पश्चिम एशिया को युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया था।

इसके जवाब में ईरान ने भी इजराइल और मध्य पूर्व में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए थे। ईरान की जवाबी कार्रवाई के बाद पूरे क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया था। कई देशों ने आशंका जताई थी कि अगर स्थिति नियंत्रण से बाहर हुई तो इसका असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ सकता है,खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए होने वाले तेल परिवहन पर।

लगातार बढ़ते तनाव और अंतर्राष्ट्रीय दबाव के बाद आखिरकार आठ अप्रैल को दोनों पक्षों के बीच संघर्षविराम लागू हुआ। इसके बाद 11 और 12 अप्रैल को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में शांति वार्ता का एक दौर आयोजित किया गया। इस वार्ता में दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया,लेकिन किसी ठोस समझौते पर सहमति नहीं बन सकी। हालाँकि,बातचीत जारी रखने पर दोनों पक्ष सहमत हुए थे।

अब ट्रंप के हालिया बयान ने संकेत दिया है कि अमेरिका एक अंतिम और व्यापक समझौते की दिशा में प्रयास कर रहा है,लेकिन साथ ही यह भी साफ हो गया है कि अगर बातचीत विफल होती है,तो क्षेत्र में फिर से तनाव बढ़ सकता है। अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच यह टकराव केवल दो देशों तक सीमित नहीं है,बल्कि इसका असर पूरे पश्चिम एशिया और वैश्विक राजनीति पर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार इस समय सबसे बड़ी चुनौती दोनों पक्षों के बीच विश्वास बहाल करना है। एक ओर अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों को लेकर चिंतित है,वहीं ईरान अमेरिका और इजराइल की सैन्य कार्रवाइयों को अपनी संप्रभुता के लिए खतरा मानता है। ऐसे में शांति समझौता आसान नहीं माना जा रहा,लेकिन अगर यह वार्ता सफल होती है,तो इससे पश्चिम एशिया में स्थिरता लौटने की उम्मीद बढ़ सकती है।

फिलहाल दुनिया की नजरें अमेरिका और ईरान के बीच चल रही इन वार्ताओं पर टिकी हुई हैं। आने वाले कुछ दिन यह तय कर सकते हैं कि दोनों देशों के बीच तनाव कम होगा या फिर क्षेत्र एक बार फिर बड़े संघर्ष की ओर बढ़ेगा।