ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ा,होर्मुज स्ट्रेट पर आईआरजीसी की कड़ी निगरानी,पश्चिमी देशों को दी चेतावनी

नई दिल्ली,27 मई (युआईटीवी)- अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रहा तनाव अब एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुँचता दिखाई दे रहा है। हाल ही में अमेरिकी सेना द्वारा दक्षिणी ईरान के कुछ सैन्य ठिकानों और होर्मुज स्ट्रेट के पास मौजूद हथियारबंद नौकाओं पर किए गए हमलों के बाद दोनों देशों के बीच बयानबाजी और सैन्य गतिविधियाँ तेज हो गई हैं। ईरान की शक्तिशाली सैन्य इकाई इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी आईआरजीसी ने अमेरिका को खुली चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर ईरान पर दोबारा हमला हुआ तो उसका बेहद कड़ा और व्यापक जवाब दिया जाएगा। इस पूरे घटनाक्रम ने मध्य पूर्व में अस्थिरता की आशंका को और बढ़ा दिया है।

ईरान के सैन्य अधिकारियों ने कहा है कि उनकी सेना किसी भी संभावित हमले का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है। आईआरजीसी के उप कमांडर मोहम्मद अकबरजादेह ने बयान जारी करते हुए कहा कि अमेरिका और इजरायल अगर ईरान के खिलाफ किसी तरह की सैन्य कार्रवाई करते हैं,तो उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। उन्होंने दावा किया कि ईरान की रक्षा क्षमता पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो चुकी है और देश की सेना हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार है।

ईरानी अधिकारियों के मुताबिक,अमेरिकी हमलों के बाद होर्मुज स्ट्रेट के आसपास सुरक्षा व्यवस्था को और कड़ा कर दिया गया है। आईआरजीसी ने कहा कि उसकी नौसेना इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर लगातार निगरानी बनाए हुए है और किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर तुरंत कार्रवाई की जाएगी। ईरान का दावा है कि पिछले चौबीस घंटों के दौरान कई अंतर्राष्ट्रीय जहाज उसकी निगरानी में सुरक्षित रूप से होर्मुज स्ट्रेट से गुजरे हैं। इससे यह संदेश देने की कोशिश की गई कि ईरान इस क्षेत्र पर अपना प्रभाव बनाए हुए है।

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है। वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। ऐसे में यहाँ किसी भी तरह का सैन्य तनाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस इलाके में संघर्ष और बढ़ता है,तो अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और गैस की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है। इसका असर खास तौर पर उन देशों पर पड़ेगा जो ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं।

ईरान ने इसी मुद्दे को लेकर पश्चिमी देशों पर निशाना साधा है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि बढ़ती तेल और गैस की कीमतों के कारण अमेरिका और यूरोप पहले से दबाव में हैं। उनका दावा है कि ईंधन संकट की स्थिति पश्चिमी देशों की आर्थिक चुनौतियों को और बढ़ा सकती है। ईरान का मानना है कि मौजूदा हालात में पश्चिमी देशों के लिए मध्य पूर्व में किसी बड़े युद्ध का जोखिम उठाना आसान नहीं होगा।

दूसरी ओर अमेरिका ने अभी तक इन आरोपों और चेतावनियों पर आधिकारिक रूप से विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं दी है,लेकिन अमेरिकी रक्षा विभाग के सूत्रों का कहना है कि क्षेत्र में अमेरिकी सेना पूरी तरह सतर्क है। अमेरिकी नौसेना की गतिविधियाँ भी फारस की खाड़ी और आसपास के इलाकों में बढ़ी हुई दिखाई दे रही हैं। माना जा रहा है कि अमेरिका अपने सहयोगी देशों और सैन्य ठिकानों की सुरक्षा को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरत रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव का यह नया दौर सिर्फ सैन्य संघर्ष तक सीमित नहीं है,बल्कि इसका असर वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। रूस-यूक्रेन युद्ध और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संकटों के बीच मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव दुनिया के लिए नई चुनौती बन सकता है। खासकर ऊर्जा बाजार में अस्थिरता के कारण कई देशों में महँगाई बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

इजरायल का नाम भी इस पूरे विवाद में लगातार सामने आ रहा है। ईरान लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि अमेरिका और इजरायल मिलकर उसके खिलाफ रणनीतिक दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ईरानी अधिकारियों ने कहा कि अगर किसी भी तरह की संयुक्त सैन्य कार्रवाई की गई,तो उसका जवाब सिर्फ क्षेत्रीय स्तर पर नहीं,बल्कि व्यापक स्तर पर दिया जाएगा। इस बयान को लेकर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में चिंता बढ़ गई है।

मध्य पूर्व के कई देशों ने फिलहाल संयम बरतने की अपील की है। अंतर्राष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि अगर दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ता है तो इसका सीधा असर वैश्विक समुद्री व्यापार पर पड़ सकता है। होर्मुज स्ट्रेट में किसी भी तरह की बाधा से तेल आपूर्ति प्रभावित होगी,जिससे दुनिया भर में पेट्रोल और डीजल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं।

ईरान लगातार यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि वह दबाव में आने वाला नहीं है। आईआरजीसी की ओर से जारी बयानों में बार-बार यह कहा गया कि देश की सुरक्षा और संप्रभुता से किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा। वहीं अमेरिका और उसके सहयोगी देश इस क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए हुए हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में हालात किस दिशा में जाएँगे,इस पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।

फिलहाल सबसे बड़ी चिंता यही है कि अगर दोनों देशों के बीच किसी भी तरह की सीधी सैन्य भिड़ंत होती है,तो उसका असर सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक अर्थव्यवस्था,ऊर्जा आपूर्ति और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा पर इसके गंभीर परिणाम देखने को मिल सकते हैं। इसलिए दुनिया के कई देश अब इस संकट को कूटनीतिक तरीके से सुलझाने की जरूरत पर जोर दे रहे हैं।