वाशिंगटन,23 जुलाई (युआईटीवी)- पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य तनाव एक बार फिर गंभीर मोड़ पर पहुँच गया है। अमेरिकी सेना ने बुधवार शाम करीब साढ़े पाँच बजे ईरान के सैन्य ठिकानों पर नए हवाई हमले शुरू किए,जिसके बाद पूरे क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता को लेकर चिंताएँ और बढ़ गई हैं। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने इन हमलों की पुष्टि करते हुए कहा कि अभियान का उद्देश्य ईरान की उस सैन्य क्षमता को कमजोर करना है, जिसके जरिए वह अंतर्राष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर चलने वाले वाणिज्यिक जहाजों और आम नाविकों के लिए खतरा पैदा कर सकता है। दूसरी ओर,ईरान ने अमेरिका को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि उसके महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे पर हमला किया गया,तो वह पूरे पश्चिम एशिया में तेल और गैस से जुड़े ढाँचों को निशाना बनाएगा और क्षेत्र से तेल निर्यात को बाधित कर देगा।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर जारी अपने बयान में कहा कि सैन्य अभियान का मकसद क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करना और अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों को संभावित खतरों से सुरक्षित रखना है। बयान में कहा गया कि यह मिशन ईरान की उन क्षमताओं को लगातार कमजोर करेगा,जिनके माध्यम से वह समुद्री मार्गों पर दबाव बनाने या वाणिज्यिक जहाजों को धमकाने का प्रयास करता है। अमेरिका का कहना है कि वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा उसकी प्राथमिकताओं में शामिल है।
इन हमलों से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कड़ी चेतावनी दी थी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि यदि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी जहाज पर हमला करता है,चाहे वह मिसाइल, रॉकेट, ड्रोन या किसी अन्य हथियार के माध्यम से हो,तो अमेरिका जवाबी कार्रवाई में ईरान के महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे को निशाना बनाएगा। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच ट्रुथ सोशल पर लिखा कि ऐसी किसी भी घटना की स्थिति में अमेरिका ईरान के पुलों और बिजली संयंत्रों पर बमबारी करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि यदि आवश्यकता पड़ी तो राजधानी तेहरान के भीतर या उसके आसपास स्थित बिजली संयंत्र भी इस कार्रवाई के दायरे में आ सकते हैं।
राष्ट्रपति ट्रंप के इस बयान ने पहले से ही तनावपूर्ण हालात को और अधिक संवेदनशील बना दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की सार्वजनिक चेतावनी दोनों देशों के बीच प्रत्यक्ष सैन्य टकराव की आशंकाओं को और बढ़ाती है। अमेरिका लगातार यह आरोप लगाता रहा है कि ईरान क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा के लिए खतरा बना हुआ है,जबकि ईरान इन आरोपों को खारिज करता रहा है।
अमेरिकी चेतावनी के कुछ ही समय बाद ईरान की ओर से भी तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार,ईरान के मुख्य सैन्य कमान खतम अल-अनबिया सेंट्रल हेडक्वार्टर ने बयान जारी करते हुए कहा कि यदि अमेरिका ईरान के बुनियादी ढाँचे पर हमला करता है,तो उसका जवाब केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं रहेगा। ईरान ने चेतावनी दी कि वह पश्चिम एशिया से होने वाले सभी तेल निर्यात को रोकने की दिशा में कदम उठा सकता है और पूरे क्षेत्र में तेल,गैस,बिजली तथा अन्य आर्थिक ढाँचों को निशाना बनाएगा।
ईरान का कहना है कि अमेरिका की लगातार सैन्य कार्रवाई और सार्वजनिक धमकियां केवल युद्ध के दायरे को और व्यापक बनाएँगी। ईरानी अधिकारियों के अनुसार,यदि संघर्ष बढ़ता है,तो उसका प्रभाव केवल ईरान और अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा,ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
तनाव के केंद्र में एक बार फिर होर्मुज जलडमरूमध्य है,जिसे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में गिना जाता है। वैश्विक स्तर पर समुद्री मार्ग से होने वाले कच्चे तेल के बड़े हिस्से का परिवहन इसी जलडमरूमध्य से होता है। यदि इस मार्ग पर किसी प्रकार का सैन्य टकराव या अवरोध उत्पन्न होता है,तो अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर इसका व्यापक असर पड़ सकता है। तेल की कीमतों में तेजी,समुद्री परिवहन लागत में वृद्धि और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव जैसी परिस्थितियाँ पैदा होने की आशंका बनी रहती है।
इसी बीच समाचार एजेंसी सिन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार,मंगलवार देर रात भी अमेरिका ने ईरान के खिलाफ एक और श्रृंखला में हवाई हमले किए थे। इन हमलों के बाद तेहरान के आसमान में ईरान की वायु रक्षा प्रणालियाँ सक्रिय हो गईं और राजधानी सहित कई क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई। ईरानी सेना ने संभावित हवाई खतरों से निपटने के लिए अपने रक्षा तंत्र को पूरी तरह सतर्क कर दिया।
इन घटनाओं के बाद क्षेत्रीय तनाव और बढ़ गया,जब ईरान की ओर से जवाबी कार्रवाई की खबरें सामने आईं। रिपोर्टों के अनुसार,ईरान ने इजरायल की सीमा के निकट जॉर्डन के एक शहर की ओर मिसाइल दागी। इस घटना के बाद पूरे क्षेत्र में सुरक्षा एजेंसियाँ अलर्ट पर आ गईं। बहरीन और सऊदी अरब ने भी एहतियात के तौर पर सुरक्षा चेतावनियाँ जारी कीं और संभावित खतरों को देखते हुए आवश्यक कदम उठाने शुरू कर दिए।
पश्चिम एशिया में बढ़ते इस तनाव का असर केवल सैन्य और कूटनीतिक स्तर तक सीमित नहीं है,बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। ऊर्जा बाजार लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं,क्योंकि इस क्षेत्र में किसी भी बड़े संघर्ष का सीधा असर कच्चे तेल की आपूर्ति और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों पर पड़ सकता है। भारत सहित कई देश,जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए पश्चिम एशिया पर निर्भर हैं, इस पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर रखे हुए हैं।
इस बीच अमेरिका के भीतर भी ईरान के साथ युद्ध को लेकर मतभेद सामने आए हैं। पिछले सप्ताह जारी द वाशिंगटन पोस्ट और इप्सोस के संयुक्त सर्वेक्षण के अनुसार,अधिकांश अमेरिकी नागरिक ईरान के साथ युद्ध के पक्ष में नहीं हैं। सर्वेक्षण में 68 प्रतिशत अमेरिकी वयस्कों ने माना कि ईरान के साथ युद्ध लड़ना उचित नहीं होगा,जबकि केवल 28 प्रतिशत लोगों ने इसे सही ठहराया। यह आँकड़ा दर्शाता है कि अमेरिकी जनता का एक बड़ा वर्ग किसी नए सैन्य संघर्ष से बचने के पक्ष में है।
विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में दोनों देशों के बीच बढ़ती बयानबाजी और सैन्य कार्रवाई पूरे क्षेत्र की स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। यदि कूटनीतिक प्रयासों को प्राथमिकता नहीं दी गई,तो स्थिति और अधिक जटिल हो सकती है। फिलहाल अमेरिका और ईरान दोनों अपने-अपने रुख पर कायम हैं। एक ओर अमेरिका समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के नाम पर सैन्य दबाव बनाए हुए है,वहीं दूसरी ओर ईरान भी स्पष्ट कर चुका है कि वह किसी भी हमले का जवाब देने से पीछे नहीं हटेगा।
पश्चिम एशिया में तेजी से बदलते घटनाक्रमों के बीच पूरी दुनिया की नजर अब इस बात पर टिकी है कि आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक पहल होती है या फिर सैन्य टकराव का दायरा और व्यापक हो जाता है। फिलहाल क्षेत्र में हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय लगातार संयम बरतने तथा संवाद के माध्यम से समाधान निकालने की आवश्यकता पर जोर दे रहा है।
