डोनाल्ड ट्रंप (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

अमेरिका-ईरान परमाणु समझौते पर फिर बढ़ी अनिश्चितता,शर्तों में बदलाव की तैयारी से वार्ता नए मोड़ पर

वाशिंगटन,1 जून (युआईटीवी)- अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रही परमाणु समझौता वार्ता एक बार फिर जटिल दौर में पहुँचती दिखाई दे रही है। दोनों देशों के बीच जारी बातचीत को लेकर सामने आ रही नई जानकारियों से संकेत मिल रहे हैं कि समझौते के मसौदे में महत्वपूर्ण बदलाव किए जा सकते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जहाँ समझौते की कुछ प्रमुख शर्तों को और अधिक स्पष्ट तथा कठोर बनाना चाहते हैं,वहीं ईरान भी प्रस्तावित मसौदे में अपने कुछ नए संशोधन जोड़ने की तैयारी कर रहा है। इस स्थिति ने पहले से ही संवेदनशील वार्ता प्रक्रिया को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार,व्हाइट हाउस इस समय ईरान की नई प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहा है। सूत्रों का कहना है कि कई दौर की बातचीत के बावजूद अभी तक अंतिम सहमति नहीं बन सकी है और वार्ता ऐसी स्थिति में पहुँच गई है,जहाँ कुछ मुद्दों पर फिर से शुरुआती स्तर पर चर्चा करनी पड़ सकती है। कूटनीतिक हलकों में इसे बातचीत के लिए एक महत्वपूर्ण लेकिन कठिन चरण माना जा रहा है।

रिपोर्टों के मुताबिक,राष्ट्रपति ट्रंप इस समझौते को जल्द-से-जल्द अंतिम रूप देना चाहते हैं। उनका मानना है कि यदि दोनों पक्ष किसी व्यापक सहमति तक पहुँच जाते हैं,तो क्षेत्रीय तनाव को कम किया जा सकता है और लंबे समय से जारी संघर्ष की स्थिति को समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति होगी। हालाँकि,इस लक्ष्य को हासिल करना आसान नहीं माना जा रहा,क्योंकि ईरान की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में किसी भी बड़े अंतर्राष्ट्रीय समझौते को अंतिम मंजूरी सर्वोच्च नेता के स्तर पर मिलती है। ऐसे में किसी भी नए संशोधन या बदलाव के लिए लंबी आंतरिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यही कारण है कि वार्ता की गति अपेक्षाकृत धीमी बनी हुई है। एक ओर अमेरिका स्पष्ट और ठोस प्रतिबद्धताओं की माँग कर रहा है,वहीं दूसरी ओर ईरान अपने राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा चिंताओं को ध्यान में रखते हुए सावधानीपूर्वक कदम बढ़ा रहा है। यदि मौजूदा मसौदे में बड़े बदलाव किए जाते हैं,तो बातचीत का दौर और लंबा खिंच सकता है।

रिपोर्टों के अनुसार,ट्रंप प्रशासन विशेष रूप से ईरान के पास मौजूद 60 प्रतिशत तक समृद्ध किए गए यूरेनियम के भंडार को लेकर अधिक स्पष्ट प्रावधान चाहता है। अमेरिका का मानना है कि इस संवर्धित यूरेनियम की निगरानी,नियंत्रण और भविष्य को लेकर समझौते में विस्तृत और स्पष्ट नियम होने चाहिए। अमेरिकी पक्ष इस बात को लेकर भी स्पष्टता चाहता है कि भविष्य में इस सामग्री का प्रबंधन किस प्रकार किया जाएगा और किन परिस्थितियों में अमेरिका या अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों को इसकी निगरानी का अधिकार मिलेगा।

इसके अलावा होर्मुज जलडमरूमध्य का मुद्दा भी वार्ता के केंद्र में बना हुआ है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। दुनिया के बड़े हिस्से तक पहुँचने वाला तेल और गैस इसी मार्ग से होकर गुजरता है। अमेरिका चाहता है कि समझौते में ऐसे स्पष्ट प्रावधान शामिल किए जाएँ,जिनसे इस जलमार्ग को सुरक्षित और निर्बाध रूप से खुला रखा जा सके। वाशिंगटन का मानना है कि क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक व्यापार के लिए यह आवश्यक है।

मौजूदा मसौदे के अनुसार ईरान इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार है कि वह परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा। इसके साथ ही प्रस्तावित समझौते में 60 दिनों की एक समयसीमा भी निर्धारित की गई है,जिसके भीतर दोनों देश ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसके पास मौजूद संवर्धित यूरेनियम के भविष्य को लेकर विस्तृत चर्चा करेंगे। हालाँकि,ट्रंप प्रशासन का मानना है कि केवल सामान्य आश्वासन पर्याप्त नहीं हैं और समझौते में अधिक स्पष्ट तथा बाध्यकारी प्रावधानों को शामिल किया जाना चाहिए।

हाल ही में एक साक्षात्कार के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि ईरान किसी भी परिस्थिति में परमाणु हथियार न बना सके। उन्होंने कहा कि ईरानी पक्ष इस सिद्धांत को स्वीकार कर चुका है और यह वार्ता का एक सकारात्मक पहलू है। ट्रंप के अनुसार शुरुआती दौर में ईरान केवल यह कह रहा था कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा,लेकिन अब बातचीत इस दिशा में आगे बढ़ चुकी है कि वह किसी भी रूप में ऐसे हथियारों का निर्माण या अधिग्रहण नहीं करेगा।

हालाँकि,ट्रंप ने यह भी स्वीकार किया कि ईरान के साथ बातचीत करना आसान नहीं है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के समझौतों में समय लगता है और कई बार प्रक्रिया अपेक्षा से अधिक जटिल हो जाती है। इसके बावजूद उन्होंने विश्वास जताया कि यदि दोनों पक्ष धैर्य और गंभीरता के साथ आगे बढ़ते हैं तो सकारात्मक परिणाम निकल सकते हैं।

दूसरी ओर ईरान की तरफ से भी मिश्रित संकेत मिल रहे हैं। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने हाल ही में कहा कि अमेरिका के साथ बातचीत और संदेशों का आदान-प्रदान अभी भी जारी है। उनके अनुसार वार्ता प्रक्रिया सक्रिय है,लेकिन जब तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आता,तब तक किसी निष्कर्ष पर पहुँचना उचित नहीं होगा। उन्होंने कहा कि इस समय मीडिया और राजनीतिक हलकों में जो चर्चाएँ चल रही हैं,उनमें से अधिकांश अटकलों पर आधारित हैं और उन्हें अंतिम स्थिति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

अराघची के बयान को अपेक्षाकृत संतुलित और कूटनीतिक माना गया है। उन्होंने यह संकेत दिया कि तेहरान अभी भी बातचीत का रास्ता खुला रखना चाहता है और किसी संभावित समझौते की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं कर रहा है। हालाँकि,ईरान के भीतर सभी राजनीतिक धड़े इस मुद्दे पर एक जैसी राय नहीं रखते।

इसी संदर्भ में ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघर गालिबाफ का बयान काफी चर्चा में है। उन्होंने अमेरिका के प्रति सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि जब तक ईरानी जनता के अधिकारों और राष्ट्रीय हितों की पूरी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती,तब तक किसी भी समझौते को मंजूरी नहीं दी जाएगी। गालिबाफ ने यह भी कहा कि ईरान में कई नीति-निर्माता अमेरिकी वादों और आश्वासनों पर पूरी तरह भरोसा नहीं करते। उनके अनुसार पिछले अनुभवों को देखते हुए किसी भी समझौते को बहुत सावधानी से परखा जाना आवश्यक है।

इन बयानों से यह स्पष्ट होता है कि ईरान के भीतर भी इस मुद्दे पर अलग-अलग दृष्टिकोण मौजूद हैं। एक पक्ष बातचीत को आगे बढ़ाने और तनाव कम करने के पक्ष में है,जबकि दूसरा पक्ष अधिक सतर्क रुख अपनाने की वकालत कर रहा है। यही कारण है कि वार्ता प्रक्रिया केवल अमेरिका और ईरान के बीच ही नहीं,बल्कि ईरान की आंतरिक राजनीतिक संरचना के भीतर भी कई स्तरों पर प्रभावित हो रही है।

इस बीच ईरान की घरेलू राजनीति को लेकर भी कुछ रिपोर्टें सामने आई हैं,जिन्होंने चर्चा को और तेज कर दिया है। कुछ विदेशी मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने मोज्तबा खामेनेई को अपना इस्तीफा सौंपने संबंधी एक पत्र भेजा है। हालाँकि,ईरानी सरकार ने इन दावों को तुरंत खारिज कर दिया और उन्हें निराधार तथा भ्रामक बताया। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि ऐसी खबरों का वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है और इन्हें राजनीतिक अटकलों के रूप में देखा जाना चाहिए।

कुल मिलाकर अमेरिका और ईरान के बीच जारी परमाणु वार्ता एक निर्णायक मोड़ पर पहुँचती दिखाई दे रही है। दोनों पक्ष समझौते की आवश्यकता को स्वीकार करते हैं,लेकिन कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अभी भी मतभेद बने हुए हैं। यूरेनियम संवर्धन,निगरानी व्यवस्था,क्षेत्रीय सुरक्षा और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे प्रश्नों पर अंतिम सहमति बनना अभी बाकी है। ऐसे में आने वाले दिनों में होने वाली बातचीत यह तय करेगी कि यह प्रक्रिया किसी व्यापक समझौते तक पहुँचती है या फिर एक बार फिर अनिश्चितता और लंबे गतिरोध के दौर में प्रवेश करती है।