यूक्रेन-रूस युद्धविराम की उम्मीद बढ़ी (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

यूक्रेन-रूस युद्धविराम की उम्मीद बढ़ी,ब्रिटेन-फ्रांस-जर्मनी ने रूस-यूक्रेन बातचीत का किया समर्थन

नई दिल्ली,8 जून (युआईटीवी)- ब्रिटेन,फ्रांस और जर्मनी के नेताओं द्वारा रूस और यूक्रेन के बीच प्रत्यक्ष वार्ता का समर्थन किए जाने के बाद युद्धग्रस्त यूरोप में शांति की नई उम्मीदें जगी हैं। लंदन में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में इन देशों ने स्पष्ट किया कि यूक्रेन और रूस के बीच सीधे संवाद ही लंबे समय से जारी संघर्ष को समाप्त करने का सबसे प्रभावी रास्ता हो सकता है। इस बैठक में यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की भी शामिल हुए और सभी पक्षों ने युद्धविराम तथा स्थायी शांति की दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता पर जोर दिया।

रूस और यूक्रेन के बीच पिछले कई वर्षों से जारी संघर्ष ने न केवल दोनों देशों को भारी नुकसान पहुँचाया है,बल्कि पूरे यूरोप की सुरक्षा और वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित किया है। ऐसे समय में यूरोप के तीन प्रमुख देशों के नेताओं का एक मंच पर आकर शांति वार्ता की वकालत करना अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बैठक के बाद जारी बयान में कहा गया कि यूक्रेन और रूस के बीच सीधे संवाद को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और इस प्रक्रिया में अमेरिका तथा यूरोपीय देशों की सक्रिय भूमिका बनी रहनी चाहिए।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर,फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों,जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने बातचीत के बाद कहा कि युद्ध का समाधान केवल सैन्य कार्रवाई से संभव नहीं है। उन्होंने तत्काल और पूर्ण युद्धविराम की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि संघर्ष को रोकने के लिए दोनों पक्षों को वार्ता की मेज पर आना होगा। नेताओं का मानना है कि युद्धविराम लागू होने से मानवीय संकट को कम करने में मदद मिलेगी और शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का अवसर मिलेगा।

संयुक्त बयान में यह भी कहा गया कि संभावित शांति वार्ता की शुरुआत मौजूदा युद्ध रेखा को आधार मानकर की जानी चाहिए। इसके पीछे तर्क यह है कि वर्तमान स्थिति को ध्यान में रखकर ही यथार्थवादी समाधान खोजा जा सकता है। यूरोपीय नेताओं ने स्पष्ट किया कि किसी भी शांति पहल में यूक्रेन की संप्रभुता और सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यूरोप को इस प्रक्रिया में केंद्रीय भूमिका निभानी होगी क्योंकि इस संघर्ष का सीधा प्रभाव यूरोपीय महाद्वीप की सुरक्षा पर पड़ रहा है।

बैठक के दौरान युद्ध के बाद की सुरक्षा व्यवस्था पर भी विस्तृत चर्चा हुई। नेताओं ने कहा कि भविष्य में होने वाले किसी भी समझौते में यूरोप की सामूहिक सुरक्षा से जुड़े हितों को ध्यान में रखना आवश्यक होगा। इसके अलावा यूरोपीय संघ और नाटो से संबंधित किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय के लिए सदस्य देशों की सहमति को अनिवार्य बताया गया। इस बयान से संकेत मिलता है कि यूरोप अपने सुरक्षा ढाँचे और रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए शांति प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी चाहता है।

इस बीच रूस की ओर से भी संवाद के संकेत मिले हैं। कुछ दिन पहले क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा था कि यदि यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बातचीत करना चाहते हैं,तो उनके लिए मॉस्को आने के रास्ते खुले हैं। यह बयान ऐसे समय में आया,जब जेलेंस्की ने सार्वजनिक रूप से पुतिन को आमने-सामने बैठक का प्रस्ताव दिया था।

अपने खुले पत्र में जेलेंस्की ने कहा था कि युद्ध को समाप्त करने का सबसे प्रभावी तरीका दोनों नेताओं के बीच प्रत्यक्ष संवाद है। उन्होंने लिखा कि यूक्रेन इस संघर्ष को सीधे वार्ता के माध्यम से समाप्त करने का प्रस्ताव रखता है और इसके लिए वह व्यक्तिगत मुलाकात के लिए तैयार हैं। जेलेंस्की ने यह भी सुझाव दिया कि इस प्रक्रिया में यूरोप और अमेरिका को भी शामिल किया जाना चाहिए,ताकि किसी भी समझौते को व्यापक अंतर्राष्ट्रीय समर्थन मिल सके।

यूक्रेनी राष्ट्रपति ने अपने बयान में यह भी कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में केवल अमेरिका के सक्रिय हस्तक्षेप का इंतजार करना उचित नहीं होगा। उनके अनुसार अमेरिका का ध्यान फिलहाल ईरान से जुड़े संघर्ष और पश्चिम एशिया की स्थिति पर अधिक केंद्रित है। इसलिए यूरोपीय देशों को शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। जेलेंस्की ने वार्ता के लिए एक निश्चित तारीख तय करने की अपील करते हुए कहा कि यूक्रेन पूर्ण युद्धविराम लागू करने के लिए तैयार है,बशर्ते रूस भी इसी प्रकार की प्रतिबद्धता दिखाए।

जेलेंस्की ने यह भी खुलासा किया कि कई देशों ने संभावित शांति वार्ता की मेजबानी करने में रुचि दिखाई है। स्विट्जरलैंड,तुर्की और कुछ अरब देशों ने दोनों पक्षों के बीच बातचीत कराने की इच्छा जताई है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का मानना है कि किसी तटस्थ देश में होने वाली बैठक दोनों पक्षों के लिए अधिक स्वीकार्य हो सकती है और इससे विश्वास बहाली में मदद मिल सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रत्यक्ष वार्ता की पहल ऐसे समय में सामने आई है,जब युद्ध ने दोनों देशों पर भारी आर्थिक,सैन्य और मानवीय दबाव डाला है। लाखों लोग विस्थापित हुए हैं,हजारों लोगों की जान जा चुकी है और बुनियादी ढाँचे को व्यापक नुकसान पहुँचा है। ऐसे में किसी भी शांति पहल का स्वागत किया जा रहा है,हालाँकि कई विश्लेषक यह भी मानते हैं कि दोनों पक्षों के बीच मौजूद गहरे मतभेदों को दूर करना आसान नहीं होगा।

यूरोपीय नेताओं की इस संयुक्त पहल को युद्ध समाप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रयास माना जा रहा है। हालाँकि,यह अभी स्पष्ट नहीं है कि रूस और यूक्रेन प्रत्यक्ष वार्ता के लिए कब और किन शर्तों पर तैयार होंगे,लेकिन हालिया बयानों ने यह संकेत जरूर दिया है कि बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय अब इस बात पर नजर रखे हुए है कि आने वाले दिनों में क्या दोनों देशों के नेता आमने-सामने बैठकर शांति की दिशा में कोई ठोस कदम उठा पाएँगे।

फिलहाल लंदन बैठक का सबसे बड़ा संदेश यही है कि यूरोप युद्ध के बजाय संवाद को समाधान का रास्ता मानता है। यदि यह पहल आगे बढ़ती है और दोनों पक्ष वार्ता के लिए तैयार होते हैं,तो यह न केवल रूस-यूक्रेन संघर्ष बल्कि पूरे यूरोप की स्थिरता और वैश्विक शांति के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।