वाशिंगटन,21 जुलाई (युआईटीवी)- मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के बीच अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुँचता दिखाई दे रहा है। जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन इनहेरेंट रिजॉल्व’ के तहत तैनात दो सक्रिय अमेरिकी सैनिकों की मौत के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कड़ी चेतावनी दी है। ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि ईरान की ओर से किसी भी अमेरिकी सैनिक को नुकसान पहुँचाया गया तो उसे उसकी कई गुना बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। अमेरिकी राष्ट्रपति का यह बयान ऐसे समय आया है,जब दोनों देशों के बीच लगातार सैन्य हमले, जवाबी कार्रवाई और तीखी बयानबाजी का दौर जारी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बयान से पहले से ही तनावपूर्ण मध्य पूर्व की स्थिति और अधिक जटिल हो सकती है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक सख्त संदेश जारी करते हुए कहा कि यदि ईरान किसी भी अमेरिकी सैनिक की जान लेता है तो उसका जवाब बेहद कठोर होगा। उन्होंने लिखा कि ईरान को ऐसी किसी भी कार्रवाई की कीमत कई गुना अधिक चुकानी पड़ेगी। ट्रंप ने यह भी बताया कि उन्होंने इस संबंध में स्पष्ट निर्देश युद्ध मंत्री पीट हेगसेथ,ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष डैनियल केन और अमेरिकी सेना के सभी वरिष्ठ अधिकारियों को दे दिए हैं। उनके अनुसार अमेरिकी सेना किसी भी संभावित हमले का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है और सैनिकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति की यह चेतावनी ऐसे समय आई है,जब जॉर्डन में अमेरिकी सैनिकों की मौत ने पूरे अमेरिकी प्रशासन को झकझोर दिया है। ‘ऑपरेशन इनहेरेंट रिजॉल्व’ के तहत अमेरिकी सेना लंबे समय से मध्य पूर्व में आतंकवादी संगठनों के खिलाफ अभियान चला रही है। हालाँकि,हाल के महीनों में क्षेत्र में अमेरिका और ईरान समर्थित समूहों के बीच बढ़ते टकराव ने इस अभियान को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। दो सैनिकों की मौत के बाद अमेरिका ने संकेत दिया है कि वह अब किसी भी हमले का पहले से अधिक आक्रामक तरीके से जवाब दे सकता है।
ट्रंप के बयान के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि वाशिंगटन ईरान के खिलाफ अपनी रणनीति को और अधिक सख्त बनाने के पक्ष में है। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि यदि समय रहते कड़ा संदेश नहीं दिया गया,तो क्षेत्र में तैनात अमेरिकी सैनिकों और सैन्य ठिकानों पर हमलों का खतरा बढ़ सकता है। इसी कारण राष्ट्रपति ने सार्वजनिक रूप से यह चेतावनी जारी कर ईरान को संभावित परिणामों से आगाह किया है।
दूसरी ओर ईरान की ओर से भी अमेरिका के खिलाफ बयानबाजी में कोई कमी नहीं आई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने हाल ही में सरकारी समाचार एजेंसी आईआरएनए को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि अमेरिका के साथ संघर्ष तब तक समाप्त नहीं होगा जब तक ईरान को युद्ध के मैदान में मजबूत बढ़त हासिल नहीं हो जाती। उन्होंने स्पष्ट किया कि बातचीत केवल तब होनी चाहिए जब ईरान स्वयं को मजबूत स्थिति में महसूस करे। उनके अनुसार जल्दबाजी में वार्ता करना देश के हित में नहीं होगा।
अब्बास अराघची ने अपने बयान में कहा कि किसी भी युद्ध का अंत सामान्यतः दो तरीकों से होता है। पहला तब जब किसी एक पक्ष को स्पष्ट सैन्य विजय मिल जाए और दूसरा तब जब दोनों पक्ष बातचीत के माध्यम से समझौते पर पहुँचे। हालाँकि,उन्होंने जोर देकर कहा कि बातचीत उसी समय सार्थक होती है,जब किसी देश की स्थिति मजबूत हो। यदि संघर्ष के दौरान कमजोर स्थिति में वार्ता की जाए,तो उससे अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते। उनके इस बयान को अमेरिका के प्रति ईरान के सख्त रुख का संकेत माना जा रहा है।
ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने भी अमेरिका पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर जारी अपने संदेश में कहा कि अमेरिका एक ओर लगातार मध्य पूर्व में नए सैन्य उपकरण और अतिरिक्त सैन्य संसाधन भेज रहा है, जबकि दूसरी ओर युद्ध रोकने की बात कर रहा है। उनके अनुसार यह दोनों बातें एक-दूसरे के विपरीत हैं और इससे अमेरिका की वास्तविक मंशा पर सवाल उठते हैं।
गालिबाफ ने अपने संदेश में कहा कि अमेरिकी नेतृत्व शायद यह समझता है कि ईरान उसकी रणनीति को समझने में सक्षम नहीं है,लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। उन्होंने कहा कि ईरान अब अमेरिका की चालों को भली-भांति पहचानता है और उसी के अनुरूप अपनी तैयारियां कर चुका है। उनके अनुसार किसी भी देश की विश्वसनीयता केवल उसके बयानों से नहीं बल्कि उसके कार्यों से साबित होती है। इसलिए अमेरिका यदि वास्तव में शांति चाहता है,तो उसे अपने व्यवहार में भी उसका प्रमाण देना होगा।
ईरान की ओर से आए इन बयानों से स्पष्ट है कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक दूरी लगातार बढ़ रही है। जहाँ अमेरिका ईरान पर क्षेत्र में अस्थिरता फैलाने और अमेरिकी हितों को नुकसान पहुँचाने का आरोप लगा रहा है,वहीं ईरान का कहना है कि अमेरिका स्वयं क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों को बढ़ाकर तनाव पैदा कर रहा है। इस कारण दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी और गहरी होती जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान संकट केवल हालिया घटनाओं का परिणाम नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें कई वर्षों पुराने विवादों में हैं। परमाणु समझौते के टूटने के बाद से अमेरिका और ईरान के संबंध लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। प्रतिबंधों,जवाबी प्रतिबंधों, सैन्य हमलों और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से टकराव चलता आ रहा है। हालिया घटनाओं ने इस तनाव को और अधिक गंभीर बना दिया है।
मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के दौरान दोनों देशों के बीच लगातार सैन्य कार्रवाई भी देखने को मिल रही है। अमेरिका का आरोप है कि ईरान समर्थित समूह क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बना रहे हैं। वहीं ईरान का कहना है कि वह अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठा रहा है। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर तनाव बढ़ाने का आरोप लगाते रहे हैं।
रिपोर्टों के अनुसार पिछले कई दिनों से जारी संघर्ष में ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश की है। इसके जवाब में अमेरिका भी ईरान से जुड़े कई ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई कर रहा है। इस दौरान दोनों देशों के बीच प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष टकराव लगातार बढ़ा है। क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ गई है।
अंतर्राष्ट्रीय समुदाय भी इस बढ़ते तनाव पर लगातार नजर बनाए हुए है। कई देशों ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और कूटनीतिक समाधान तलाशने की अपील की है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई इसी तरह जारी रही तो इसका प्रभाव केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ताजा चेतावनी ने यह संकेत दे दिया है कि अमेरिका अपनी सैन्य नीति में किसी प्रकार की नरमी दिखाने के मूड में नहीं है। वहीं ईरान के शीर्ष नेताओं के बयान भी बताते हैं कि तेहरान फिलहाल दबाव में आने के बजाय अपने रुख पर कायम रहना चाहता है। ऐसे में दोनों देशों के बीच तनाव कम होने की संभावना फिलहाल कम दिखाई देती है।
मध्य पूर्व पहले ही अनेक संघर्षों,राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे समय में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती तल्खी पूरे क्षेत्र के लिए नई चिंता पैदा कर रही है। यदि दोनों पक्षों के बीच कूटनीतिक संवाद शुरू नहीं होता और सैन्य गतिविधियाँ इसी तरह जारी रहती हैं,तो आने वाले दिनों में हालात और अधिक गंभीर हो सकते हैं। फिलहाल पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या दोनों देश टकराव के रास्ते से हटकर बातचीत की दिशा में आगे बढ़ेंगे या फिर यह संघर्ष और व्यापक रूप लेगा।
