मेटा (तस्वीर क्रेडिट@IndianInfoGuid)

भारत में सीएसएएम के प्रसार पर मेटा ने बढ़ाई निगरानी,दोबारा अपलोड रोकने के लिए तकनीकी प्रणालियों को कर रही मजबूत

नई दिल्ली,19 अगस्त (युआईटीवी)- अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनी मेटा ने भारत में अपने सोशल मीडिया मंचों पर बाल यौन शोषण सामग्री यानी सीएसएएम के प्रसार और उसके दोबारा अपलोड होने की घटनाओं को रोकने के प्रयास तेज कर दिए हैं। यह कदम केंद्र सरकार और कंपनी के बीच डिजिटल मंचों पर अवैध सामग्री के प्रबंधन और तकनीकी कंपनियों की कानूनी जिम्मेदारियों को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच उठाया गया है। सरकार की ओर से विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि किसी अवैध सामग्री को केवल हटाना पर्याप्त नहीं है,बल्कि उसके दोबारा प्रसार को रोकने के लिए भी प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए।

एक रिपोर्ट के अनुसार,इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और मेटा के बीच हुई चर्चाओं में अवैध सामग्री की पहचान, उसे हटाने और हटाई जा चुकी सामग्री के दोबारा मंच पर दिखाई देने से रोकने जैसे मुद्दे प्रमुख रहे हैं। सरकार का रुख है कि डिजिटल मंचों को अपनी जिम्मेदारी केवल शिकायत मिलने के बाद सामग्री हटाने तक सीमित नहीं रखनी चाहिए। उन्हें ऐसी तकनीकी और प्रशासनिक व्यवस्थाएं विकसित करनी चाहिए,जिनसे गंभीर अवैध सामग्री के बार-बार प्रसारित होने की संभावना कम की जा सके।

मेटा की ओर से इस दिशा में कई कदम उठाए जा रहे हैं। कंपनी अपने मंचों पर ऐसी सामग्री की पहचान करने के लिए तकनीकी प्रणालियों को मजबूत कर रही है। इसके साथ ही पहले चिन्हित होकर हटाई जा चुकी सामग्री के नए रूप में या किसी दूसरे माध्यम से दोबारा अपलोड किए जाने की घटनाओं पर भी निगरानी बढ़ाई जा रही है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी सामग्री को एक बार हटाए जाने के बाद उपयोगकर्ता उसे मामूली बदलाव या अलग तरीके से दोबारा साझा करके मंच पर उपलब्ध न करा सकें।

बाल यौन शोषण सामग्री भारतीय कानून के तहत गंभीर अपराध की श्रेणी में आती है। इसी वजह से सरकार और डिजिटल मंचों के लिए इस तरह की सामग्री की रोकथाम एक संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय है। ऐसे मामलों में तकनीकी कंपनियों के सामने चुनौती केवल सामग्री की पहचान करना नहीं,बल्कि पीड़ितों की सुरक्षा,कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ आवश्यक सहयोग और अवैध सामग्री के पुनः प्रसार को रोकना भी है।

मेटा के लिए भारत में यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उसके विभिन्न सोशल मीडिया मंचों का इस्तेमाल करोड़ों लोग करते हैं। बड़े उपयोगकर्ता आधार वाले मंचों पर किसी भी आपत्तिजनक या अवैध सामग्री के तेजी से फैलने की आशंका रहती है। ऐसी परिस्थितियों में स्वचालित पहचान प्रणालियों,मानवीय निगरानी और शिकायत निवारण तंत्र के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता होती है।

केंद्र सरकार ने मेटा सहित डिजिटल मंचों को भारतीय कानूनों के पालन को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। सरकारी सूत्रों के अनुसार,यदि कोई मंच लागू भारतीय कानूनों और नियमों का पालन नहीं करता है,तो उसे उपलब्ध ‘सेफ हार्बर’ सुरक्षा पर सवाल उठ सकता है। सामान्य तौर पर सेफ हार्बर व्यवस्था डिजिटल मंचों को उपयोगकर्ताओं द्वारा साझा की गई सामग्री के लिए कुछ परिस्थितियों में सीमित कानूनी संरक्षण प्रदान करती है। हालाँकि, यह संरक्षण कानूनों और निर्धारित शर्तों के अनुपालन से जुड़ा होता है।

सरकार की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि उसका उद्देश्य सोशल मीडिया मंचों पर व्यापक सेंसरशिप लागू करना नहीं है। सरकार का मुख्य जोर इस बात पर है कि डिजिटल मंच भारत में काम करते समय देश के कानूनों और नियामकीय आवश्यकताओं का पालन करें। विशेष रूप से ऐसी सामग्री के मामलों में,जो कानून के तहत गंभीर अपराध मानी जाती है, सरकार प्लेटफॉर्म की जवाबदेही सुनिश्चित करना चाहती है।

सरकारी सूत्रों के अनुसार,डिजिटल मंचों को सामाजिक हित और संभावित नुकसान के बीच संतुलन कायम करना होगा। सोशल मीडिया का इस्तेमाल बढ़ने के साथ उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा से जुड़े कई नए सवाल सामने आए हैं। इनमें ऑनलाइन शोषणकारी सामग्री,बच्चों की सुरक्षा,डिजिटल मंचों की लत और कमजोर वर्गों को ऑनलाइन होने वाले संभावित नुकसान जैसे मुद्दे शामिल हैं। सरकार का मानना है कि इन विषयों पर तकनीकी कंपनियों को केवल वैश्विक स्तर पर बनाई गई नीतियों के आधार पर काम करने के बजाय स्थानीय परिस्थितियों को भी समझना चाहिए।

भारत सरकार इस बात पर भी जोर दे रही है कि सामग्री निगरानी और नियंत्रण से जुड़ी नीतियों को भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुरूप लागू किया जाए। वैश्विक तकनीकी कंपनियाँ अलग-अलग देशों में एक ही तरह के मंच संचालित करती हैं, लेकिन प्रत्येक देश के कानून, सामाजिक परिस्थितियाँ और उपयोगकर्ताओं से जुड़ी चिंताएं अलग हो सकती हैं। ऐसे में भारत चाहता है कि कंपनियाँ स्थानीय कानूनों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अपने सुरक्षा तंत्र को लागू करें।

मंत्रालय की ओर से अपने कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल भी सीमित और आवश्यक तरीके से किए जाने की बात कही गई है। सरकार का मुख्य उद्देश्य डिजिटल मंचों को उनकी कानूनी जिम्मेदारियों का पालन करने के लिए बाध्य करना बताया जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार,किसी मंच को कानूनी सुरक्षा प्राप्त होगी या नहीं,इसका अंतिम निर्णय संबंधित परिस्थितियों और कानून के आधार पर किया जाएगा। इस तरह सरकार और डिजिटल कंपनियों के बीच मौजूदा बातचीत को व्यापक सेंसरशिप की बजाय कानूनी अनुपालन और जवाबदेही के संदर्भ में देखा जा रहा है।

मेटा की ओर से दोबारा अपलोड होने वाली सामग्री पर विशेष ध्यान देना तकनीकी दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इंटरनेट पर किसी सामग्री को एक बार साझा किए जाने के बाद उसके कई संस्करण बनाए जा सकते हैं। ऐसे में केवल मूल सामग्री की पहचान करना पर्याप्त नहीं होता। डिजिटल मंचों को अलग-अलग रूपों में सामने आने वाली समान सामग्री की पहचान करने के लिए उन्नत तकनीकी प्रणालियों का इस्तेमाल करना पड़ता है। इसी वजह से मेटा अपनी पहचान और रोकथाम प्रणालियों को मजबूत करने पर काम कर रही है।

इस प्रक्रिया में स्वचालित तकनीक की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है,लेकिन गंभीर मामलों में केवल तकनीकी प्रणालियों पर निर्भर रहना भी पर्याप्त नहीं माना जाता। गलत पहचान,संदर्भ और नए तरीके से सामग्री साझा किए जाने जैसी चुनौतियों के कारण तकनीकी प्रणालियों के साथ विशेषज्ञ निगरानी और उचित शिकायत निवारण व्यवस्था भी आवश्यक होती है। डिजिटल मंचों को यह भी सुनिश्चित करना होता है कि अवैध सामग्री के खिलाफ कार्रवाई करते समय उपयोगकर्ताओं की गोपनीयता और कानूनी प्रक्रियाओं का ध्यान रखा जाए।

भारत में डिजिटल मंचों को लेकर नियामकीय निगरानी ऐसे समय बढ़ रही है,जब दुनिया के कई देशों में सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारियों को लेकर बहस तेज है। बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा,अवैध सामग्री,गलत सूचना,डिजिटल लत और उपयोगकर्ताओं की मानसिक एवं सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दे सरकारों के लिए प्राथमिकता बनते जा रहे हैं। यूरोप,अमेरिका और अन्य क्षेत्रों में भी तकनीकी कंपनियों से अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही की माँग बढ़ी है।

भारत भी इसी वैश्विक बहस के बीच अपनी डिजिटल नीति को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। देश में इंटरनेट और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं की संख्या लगातार बढ़ने के साथ डिजिटल मंचों की जिम्मेदारी भी बढ़ी है। सरकार का मानना है कि बड़ी तकनीकी कंपनियों को अपने मंचों पर होने वाली गतिविधियों के लिए निर्धारित कानूनी दायित्वों का पालन करना चाहिए।

मेटा और केंद्र सरकार के बीच चल रही बातचीत का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि गंभीर अवैध सामग्री की रोकथाम के लिए तकनीकी कंपनियाँ कितनी प्रभावी व्यवस्था तैयार कर सकती हैं। सरकार की अपेक्षा है कि सामग्री हटाने के साथ-साथ उसके दोबारा प्रसार को रोकने के लिए भी पर्याप्त कदम उठाए जाएँ। वहीं,कंपनियों के लिए चुनौती यह है कि सुरक्षा उपायों को लागू करते समय वैध अभिव्यक्ति,उपयोगकर्ता अधिकारों और गोपनीयता के बीच संतुलन कायम रखा जाए।

फिलहाल मेटा ने भारत में सीएसएएम से संबंधित सामग्री की पहचान और रोकथाम के लिए अपने प्रयास तेज किए हैं। कंपनी की ओर से उठाए जा रहे कदम और केंद्र सरकार के साथ उसकी बातचीत आने वाले समय में भारत में डिजिटल मंचों की जवाबदेही के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम लक्ष्य बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और गंभीर अवैध सामग्री के प्रसार को रोकना है। साथ ही,यह मामला भारत में काम कर रही वैश्विक तकनीकी कंपनियों के लिए स्थानीय कानूनों और नियामकीय अपेक्षाओं के पालन के बढ़ते महत्व को भी रेखांकित करता है।