एचडीएफसी बैंक

सुभाष चंद्रा को एनसीएलटी से बड़ी राहत,22 हजार करोड़ के दावों के बदले 6.5 करोड़ भुगतान पर एचडीएफसी बैंक करेगा अपील

नई दिल्ली,28 अगस्त (युआईटीवी)- एस्सेल ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया में राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण यानी एनसीएलटी के फैसले ने वित्तीय क्षेत्र में नई बहस छेड़ दी है। एनसीएलटी ने चंद्रा की पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी देते हुए करीब 22,006.57 करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों के मुकाबले महज 6.25 करोड़ रुपये के भुगतान को स्वीकार किया है। प्रक्रिया की लागत के लिए अलग से 25 लाख रुपये निर्धारित किए गए हैं। इस फैसले के खिलाफ एचडीएफसी बैंक अब राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण यानी एनसीएलएटी का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रहा है।

एचडीएफसी बैंक ने गुरुवार को कहा कि वह एनसीएलटी के आदेश के खिलाफ एनसीएलएटी में अपील दायर करने के विकल्प पर विचार कर रहा है। बैंक की ओर से यह प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है,जब एनसीएलटी के फैसले के बाद लेनदारों के लिए प्रस्तावित वसूली को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। करीब 22 हजार करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों के मुकाबले कुछ करोड़ रुपये की राशि मिलने का अर्थ है कि लेनदारों को लगभग 99.97 प्रतिशत का हेयरकट स्वीकार करना पड़ेगा।

एचडीएफसी बैंक के एक प्रवक्ता के अनुसार,इस मामले में बैंक का स्वीकृत दावा कुल दावों का केवल 3.2 प्रतिशत था। बैंक ने यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित ऋण सुविधा मूल रूप से एचडीएफसी लिमिटेड की ओर से प्रदान की गई थी और एचडीएफसी लिमिटेड तथा एचडीएफसी बैंक के विलय के बाद यह खाता बैंक की पुस्तकों में आया। बैंक के मुताबिक,संबंधित ऋण के लिए आवश्यक प्रावधान पहले ही किए जा चुके हैं। इसके बावजूद बैंक एनसीएलटी के आदेश से संतुष्ट नहीं है और कानूनी विकल्पों पर विचार कर रहा है।

यह मामला सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। एनसीएलटी के समक्ष रखी गई पुनर्भुगतान योजना में चंद्रा की ओर से लेनदारों के स्वीकृत दावों के निपटारे के लिए 6.25 करोड़ रुपये देने का प्रस्ताव था। इसके अतिरिक्त 25 लाख रुपये प्रक्रिया से संबंधित खर्चों के लिए रखे गए थे। इस योजना को कई बड़े लेनदारों ने चुनौती दी थी। उनका कहना था कि इतनी कम राशि की वसूली वाली योजना को मंजूरी देना लेनदारों के हितों के अनुरूप नहीं है।

इस मामले में एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस भी उन प्रमुख लेनदारों में शामिल था,जिन्होंने योजना पर आपत्ति जताई थी। एनसीएलटी के आदेश में दर्ज कंपनी की दलीलों के मुताबिक,उसका स्वीकृत दावा 1,322.39 करोड़ रुपये था। इसके बदले पुनर्भुगतान योजना में महज 38.09 लाख रुपये देने का प्रस्ताव किया गया था। यानी कंपनी को अपने कुल स्वीकृत दावे का लगभग 0.028 प्रतिशत ही प्राप्त होता। एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस ने इसी आधार पर योजना की व्यवहार्यता और कानूनी स्वीकार्यता पर सवाल उठाया था।

असहमति जताने वाले लेनदारों का मुख्य तर्क था कि 22,006 करोड़ रुपये से अधिक के स्वीकृत दावों के सामने केवल 6.25 करोड़ रुपये का भुगतान बेहद कम है। उनका कहना था कि ऐसी योजना से लेनदारों को लगभग पूरी राशि गंवानी पड़ेगी और इसे स्वीकार करना उनके हितों के विपरीत होगा। लेनदारों ने यह भी तर्क दिया कि प्रस्तावित योजना व्यावहारिक नहीं है और दिवाला तथा शोधन अक्षमता संहिता के उद्देश्य के अनुरूप नहीं बैठती।

हालाँकि,एनसीएलटी में इस मामले की सुनवाई के दौरान पीठ के सदस्यों के बीच शुरुआत में एक राय नहीं बन सकी। दो सदस्यीय पीठ का फैसला विभाजित रहा। दोनों सदस्यों ने मामले पर अलग-अलग राय व्यक्त की। इसके बाद न्यायाधिकरण के अध्यक्ष ने मामले के अंतिम निस्तारण के लिए न्यायिक सदस्य नीलेश शर्मा को तीसरे सदस्य के रूप में नियुक्त किया। तीसरे सदस्य के रूप में नीलेश शर्मा ने दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद अपना फैसला सुनाया।

नीलेश शर्मा ने दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता की धारा 114 के तहत पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दे दी। उन्होंने उन लेनदारों की आपत्तियों को स्वीकार नहीं किया, जिन्होंने योजना के तहत मिलने वाली रकम को बेहद कम बताते हुए इसे अव्यावहारिक करार दिया था। इस तरह तीसरे सदस्य का फैसला निर्णायक साबित हुआ और सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया में प्रस्तावित योजना को मंजूरी मिल गई।

एनसीएलटी के फैसले के बाद अब इस मामले की अगली कानूनी लड़ाई एनसीएलएटी में होने की संभावना है। एचडीएफसी बैंक ने अभी यह नहीं कहा है कि अपील कब दाखिल की जाएगी,लेकिन बैंक ने स्पष्ट किया है कि वह आदेश के खिलाफ अपील के विकल्प पर विचार कर रहा है। यदि बैंक एनसीएलएटी में अपील दाखिल करता है,तो वहाँ पुनर्भुगतान योजना,लेनदारों की आपत्तियों और एनसीएलटी के फैसले के कानूनी आधार पर दोबारा विचार हो सकता है।

इस पूरे मामले का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि दिवाला समाधान प्रक्रिया का मूल उद्देश्य वित्तीय संकट में फँसे व्यक्ति या कंपनी के मामलों का समाधान करते हुए लेनदारों के हितों को भी संतुलित करना है। ऐसे मामलों में यह सवाल महत्वपूर्ण होता है कि प्रस्तावित योजना से कितनी वसूली संभव है और क्या उपलब्ध परिस्थितियों में इससे बेहतर विकल्प मौजूद है। सुभाष चंद्रा के मामले में लेनदारों और समाधान योजना के समर्थकों के बीच इसी मुद्दे को लेकर मुख्य मतभेद सामने आया है।

एचडीएफसी बैंक की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि संबंधित खाते के लिए आवश्यक प्रावधान पहले ही किए जा चुके हैं। इसका मतलब यह है कि बैंक ने इस ऋण से जुड़े संभावित नुकसान के लिए अपनी वित्तीय पुस्तकों में व्यवस्था कर रखी है। हालाँकि,इसके बावजूद बैंक अपने दावे की वसूली को लेकर उपलब्ध कानूनी रास्तों का इस्तेमाल करना चाहता है। बैंक का स्वीकृत दावा कुल दावों का 3.2 प्रतिशत ही है,लेकिन इतने बड़े कुल दावे वाले मामले में छोटी हिस्सेदारी भी बड़ी रकम हो सकती है।

दूसरी ओर,एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस सहित विरोध करने वाले लेनदारों की चिंता यह है कि यदि इतनी कम वसूली वाली योजना को मंजूरी मिलती है,तो इससे उनके दावों की वास्तविक वसूली लगभग नगण्य रह जाएगी। 1,322.39 करोड़ रुपये के दावे के बदले 38.09 लाख रुपये का प्रस्ताव इस अंतर को स्पष्ट करता है। लेनदारों का मानना है कि समाधान योजना को केवल इस आधार पर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए कि वह किसी प्रक्रिया को समाप्त कर देती है,बल्कि यह भी देखा जाना चाहिए कि उससे लेनदारों को वास्तविक और उचित वसूली का अवसर मिल रहा है या नहीं।

वहीं,एनसीएलटी के तीसरे सदस्य का फैसला यह दर्शाता है कि केवल वसूली की कम राशि अपने आप में योजना को अस्वीकार करने का पर्याप्त आधार नहीं मानी गई। अदालत ने कानून के तहत उपलब्ध प्रावधानों और मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए योजना को मंजूरी दी। अब एनसीएलएटी में होने वाली संभावित अपील इस बात की अगली कानूनी परीक्षा होगी कि क्या एनसीएलटी का निर्णय कायम रहता है या पुनर्भुगतान योजना में बदलाव की कोई संभावना बनती है।

सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया में आया यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि इसमें लेनदारों के बड़े दावों और प्रस्तावित भुगतान के बीच असाधारण अंतर सामने आया है। करीब 22,006.57 करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों के मुकाबले 6.25 करोड़ रुपये की वसूली का प्रस्ताव वित्तीय संस्थानों के लिए बड़ा मुद्दा है। अब एचडीएफसी बैंक के संभावित कदम पर सबकी नजर है। यदि बैंक एनसीएलएटी में अपील करता है,तो इस मामले में दिवाला कानून के तहत पुनर्भुगतान योजनाओं की स्वीकार्यता,लेनदारों के अधिकार और बेहद कम वसूली वाले प्रस्तावों की कानूनी सीमा जैसे महत्वपूर्ण सवालों पर आगे सुनवाई हो सकती है।

फिलहाल एनसीएलटी के आदेश के अनुसार सुभाष चंद्रा की पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी मिल चुकी है,लेकिन एचडीएफसी बैंक के संभावित अपीलीय कदम से मामला अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। आने वाले समय में एनसीएलएटी में होने वाली कार्रवाई यह तय कर सकती है कि यह योजना मौजूदा रूप में आगे बढ़ती है या लेनदारों की आपत्तियों के आधार पर इसमें किसी तरह का बदलाव होता है।