चैपल हिल (नॉर्थ कैरोलिना),3 सितंबर (युआईटीवी)- अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के बीच अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि अगर कोई देश ईरान को अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने में मदद करता है या उसके लिए ऐसे रास्ते तैयार करता है, जिनसे वह राजस्व जुटा सके,तो उस देश को भी अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। रुबियो ने यह बयान ऐसे समय में दिया है,जब ईरान के साथ भारत समेत कई देशों के राजनयिक और व्यापारिक संबंध बने हुए हैं। उन्होंने भारत और ईरान के बीच किसी नए व्यापार समझौते की खबरों को भी खारिज किया और कहा कि उन्हें ऐसा नहीं लगता कि दोनों देश इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
एक साक्षात्कार के दौरान रुबियो से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ईरानी राष्ट्रपति और अन्य अधिकारियों के साथ हुई मुलाकातों तथा भारत और ईरान के बीच किसी संभावित नए व्यापार समझौते को लेकर सवाल किया गया। इसके जवाब में अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि भारत और ईरान के बीच कोई व्यापार समझौता हो रहा है। हालाँकि,उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि दुनिया के कई देश ईरान के साथ संपर्क बनाए रखते हैं और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के तहत उसके साथ बातचीत करते हैं।
रुबियो ने कहा कि हर देश अपनी विदेश नीति खुद तय करता है और दुनिया के कई देश ईरानी सरकार के साथ बातचीत करते हैं। उन्होंने यह भी माना कि अमेरिका ने भी कुछ चर्चाओं के दौरान ईरानी सरकार के प्रतिनिधियों के साथ संपर्क किया है। उनके मुताबिक, किसी देश का ईरान के साथ राजनयिक संपर्क होना अपने आप में अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन नहीं है। अमेरिका की चिंता उन गतिविधियों को लेकर है,जिनके जरिए ईरान को प्रतिबंधों से बचने या अतिरिक्त राजस्व जुटाने में मदद मिल सकती है।
अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी नीति बिल्कुल स्पष्ट कर दी है। उनके अनुसार,किसी भी देश को ईरान के लिए ऐसे तंत्र विकसित करने में मदद नहीं करनी चाहिए,जिनसे वह अमेरिकी प्रतिबंधों से बच सके या अतिरिक्त धन जुटा सके। रुबियो ने आरोप लगाया कि ईरान इस धन का इस्तेमाल आतंकवाद को समर्थन देने और परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिशों के लिए कर सकता है।
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि कोई देश जानबूझकर ईरान को प्रतिबंधों से बचने में सहायता करने का निर्णय लेता है, तो अमेरिका को उस देश के खिलाफ भी प्रतिबंध लगाने पड़ सकते हैं। इस चेतावनी से साफ है कि ट्रंप प्रशासन ईरान पर आर्थिक दबाव बनाए रखने के लिए केवल सीधे तौर पर ईरान को निशाना नहीं बनाना चाहता,बल्कि उन देशों और संस्थाओं पर भी कार्रवाई का विकल्प खुला रखना चाहता है,जो उसके अनुसार ईरान की आर्थिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।
रुबियो ने कहा कि ट्रंप प्रशासन की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में यह सुनिश्चित करना शामिल है कि ईरान कभी परमाणु हथियार हासिल न कर सके। उन्होंने कहा कि ईरान को परमाणु हथियार रखने की अनुमति नहीं दी जाएगी,कम-से-कम तब तक तो बिल्कुल नहीं,जब तक राष्ट्रपति ट्रंप पद पर हैं। अमेरिका लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंता जताता रहा है और उसके खिलाफ आर्थिक तथा राजनीतिक दबाव की नीति अपनाता रहा है।
अमेरिकी विदेश मंत्री के मुताबिक,ईरान पर दबाव बनाने का मुख्य तरीका आर्थिक है। उन्होंने कहा कि जब तक ईरान परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश करता रहेगा या ऐसी इच्छा रखता रहेगा,तब तक उसे इसकी कीमत चुकानी होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस कीमत का प्रमुख हिस्सा आर्थिक दबाव के रूप में होगा। हालाँकि,उन्होंने यह भी कहा कि आवश्यकता पड़ने पर अमेरिका सैन्य कार्रवाई का विकल्प भी खुला रखता है।
रुबियो ने कहा कि अमेरिका को अपनी सुरक्षा की रक्षा करने के साथ-साथ ईरान को दूसरे देशों के लिए खतरा बनने से रोकने का भी अधिकार है। उनके बयान से संकेत मिलता है कि अमेरिकी नीति में आर्थिक प्रतिबंधों को प्राथमिक साधन माना जा रहा है,लेकिन सैन्य विकल्प को पूरी तरह समाप्त नहीं किया गया है। इस नीति का उद्देश्य ईरान पर लगातार दबाव बनाए रखना और उसके परमाणु कार्यक्रम को सीमित करना है।
रुबियो ने ईरान पर अपने आर्थिक संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि ईरान अपने संसाधनों का इस्तेमाल आम नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने के बजाय सशस्त्र समूहों को समर्थन देने में करता है। उनके अनुसार, ईरान को धन की आवश्यकता मुख्य रूप से आतंकवाद को समर्थन देने और भविष्य में परमाणु हथियार हासिल करने के प्रयासों के लिए होती है। अमेरिका का कहना है कि ऐसी गतिविधियों को रोकना उसकी सुरक्षा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा समुद्री सुरक्षा भी है। रुबियो ने आरोप लगाया कि ईरान व्यापारिक जहाजों पर हमले जारी रखे हुए है। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने जलडमरूमध्य में बिछाई गई बारूदी सुरंगों को हटाया है और अमेरिकी सेना तथा वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए तत्काल खतरा पैदा करने वाली गतिविधियों को निशाना बनाना जारी रखा जाएगा।
उन्होंने विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अमेरिका का रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि यह जलमार्ग खुला रहेगा और उस पर ईरान का नियंत्रण नहीं होगा। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा और समुद्री व्यापार के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है। यहाँ किसी भी तरह का सैन्य तनाव अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है। इसलिए अमेरिका इस क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी और समुद्री सुरक्षा को महत्वपूर्ण मानता है।
भारत और ईरान के संबंधों की बात करें तो दोनों देशों के बीच लंबे समय से राजनयिक और व्यापारिक संबंध रहे हैं। भारत ने ईरान के साथ विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग किया है और दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय संपर्क को लेकर भी महत्वपूर्ण साझेदारी रही है। इनमें ईरान का चाबहार बंदरगाह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
भारत चाबहार बंदरगाह के विकास में सहयोग कर रहा है। यह बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक महत्व रखता है,क्योंकि इसके माध्यम से भारत पाकिस्तान के रास्ते का इस्तेमाल किए बिना अफगानिस्तान और मध्य एशिया के देशों तक व्यापारिक पहुँच बनाने की कोशिश करता है। क्षेत्रीय संपर्क और व्यापार के विस्तार के लिए चाबहार को लंबे समय से महत्वपूर्ण परियोजना के रूप में देखा जाता रहा है।
यही वजह है कि ईरान को लेकर अमेरिकी प्रतिबंधों की नीति भारत जैसे देशों के लिए भी एक जटिल कूटनीतिक स्थिति पैदा कर सकती है। भारत एक ओर अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को मजबूत कर रहा है,वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ उसके ऐतिहासिक और रणनीतिक हित जुड़े हुए हैं। ऐसे में दोनों पक्षों के साथ संतुलन बनाए रखना भारतीय विदेश नीति के लिए महत्वपूर्ण है।
हालाँकि,रुबियो ने भारत और ईरान के बीच किसी नए व्यापार समझौते की संभावना को लेकर सामने आई अटकलों को सीधे तौर पर खारिज कर दिया। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अमेरिका को केवल इस बात से आपत्ति नहीं है कि कोई देश ईरान से संपर्क क्यों बनाए हुए है,बल्कि चिंता इस बात को लेकर है कि कहीं वह ईरान को अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने में मदद तो नहीं कर रहा।
अमेरिकी विदेश मंत्री के बयान से स्पष्ट है कि ट्रंप प्रशासन ईरान पर आर्थिक दबाव को अपनी रणनीति का केंद्रीय हिस्सा बनाए रखना चाहता है। अमेरिका का लक्ष्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने के साथ-साथ उसके आर्थिक संसाधनों को उन गतिविधियों में इस्तेमाल होने से रोकना है,जिन्हें वाशिंगटन क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानता है।
वहीं भारत और ईरान के बीच संबंधों को लेकर अमेरिकी रुख आने वाले समय में महत्वपूर्ण हो सकता है। भारत के लिए चाबहार बंदरगाह और मध्य एशिया तक संपर्क जैसे रणनीतिक हित अहम हैं। ऐसे में नई दिल्ली को अपने क्षेत्रीय और आर्थिक हितों के साथ-साथ अमेरिका की प्रतिबंध नीति को भी ध्यान में रखना होगा। फिलहाल रुबियो ने किसी नए भारत-ईरान व्यापार समझौते की खबरों को खारिज करते हुए यह जरूर स्पष्ट कर दिया है कि ईरान को प्रतिबंधों से बचाने की कोशिश करने वाले किसी भी देश के खिलाफ अमेरिका कार्रवाई का विकल्प खुला रखेगा।
