श्रीहरिकोटा,4 सितंबर (युआईटीवी)- भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने जीएसएलवी-एफ17 मिशन के तहत ईओएस-05 उपग्रह को निर्धारित कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित कर एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। मिशन की सफलता के बाद इसरो प्रमुख डॉ. वी. नारायणन ने इसे देश के लिए गर्व का क्षण बताया। उन्होंने कहा कि पहली बार जीएसएलवी मार्क-2 प्रक्षेपण यान के जरिए इस श्रेणी का सबसे भारी उपग्रह प्रक्षेपित किया गया है। इस उपलब्धि को भारत की बढ़ती अंतरिक्ष क्षमताओं और प्रक्षेपण तकनीक में लगातार हो रहे सुधार का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।
इसरो प्रमुख ने बताया कि जब जीएसएलवी मार्क-2 यान को विकसित किया गया था, तब इसकी उपग्रह प्रक्षेपण क्षमता करीब 1,536 किलोग्राम थी। समय के साथ इसमें लगातार तकनीकी सुधार किए गए और अब इसकी क्षमता में लगभग 40 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है। जीएसएलवी-एफ17 मिशन के दौरान इसी बेहतर क्षमता का इस्तेमाल करते हुए भारी उपग्रह को अंतरिक्ष में भेजा गया। उन्होंने कहा कि यह इस प्रक्षेपण यान से भेजा गया अब तक का सबसे भारी सैटेलाइट है और इस उपलब्धि से वैज्ञानिकों तथा इंजीनियरों का आत्मविश्वास और मजबूत हुआ है।
जीएसएलवी-एफ17 भारत के जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल यानी जीएसएलवी का 19वां मिशन है। इस मिशन में प्रक्षेपण यान के पेलोड फेयरिंग का चार मीटर व्यास वाला ओजाइव कम्पोजिट संस्करण इस्तेमाल किया गया। प्रक्षेपण के बाद यान ने ईओएस-05 उपग्रह को सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में सफलतापूर्वक स्थापित किया। इस मिशन की सफलता भारत के स्वदेशी प्रक्षेपण यान कार्यक्रम के लिए अहम मानी जा रही है, क्योंकि इससे जीएसएलवी मार्क-2 की क्षमता और विश्वसनीयता को लेकर एक और मजबूत प्रमाण मिला है।
मिशन की सफलता के साथ ही इसरो प्रमुख ने देश के अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी और स्पेस इकोसिस्टम को लेकर हो रही आलोचनाओं पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था और अंतरिक्ष इकोसिस्टम का विस्तार समय की जरूरत है। उनके मुताबिक, केवल इसरो के दम पर देश की बढ़ती अंतरिक्ष जरूरतों को पूरा करना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में भारत के पास करीब 56 सैटेलाइट हैं, जबकि आने वाले समय में देश को सैकड़ों सैटेलाइट की आवश्यकता होगी।
डॉ. वी. नारायणन ने कहा कि इसी जरूरत को देखते हुए सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र में सुधारों की घोषणा की है और इसरो इन सुधारों से जुड़ी गतिविधियों में सहयोग कर रहा है। उनका कहना है कि देश में एक मजबूत और व्यापक अंतरिक्ष इकोसिस्टम तैयार करना जरूरी है, जिसमें निजी कंपनियाँ और अन्य संस्थान भी अपनी भूमिका निभा सकें। इससे अंतरिक्ष आधारित सेवाओं का विस्तार करने के साथ-साथ देश की तकनीकी और औद्योगिक क्षमताओं को भी मजबूती मिलेगी।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी बढ़ने का उद्देश्य इसरो की भूमिका को कम करना नहीं है,बल्कि देश की समग्र अंतरिक्ष क्षमता को बढ़ाना है। बढ़ती संचार, मौसम, नेविगेशन, पृथ्वी अवलोकन और सुरक्षा संबंधी जरूरतों को देखते हुए अधिक संख्या में सैटेलाइट और उन्नत अंतरिक्ष प्रणालियों की आवश्यकता है। ऐसे में सरकारी संस्थानों के साथ निजी क्षेत्र की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इसरो प्रमुख ने तमिलनाडु के कुलशेखरपटनम में विकसित किए जा रहे नए अंतरिक्ष प्रक्षेपण केंद्र को लेकर भी महत्वपूर्ण जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वहाँ काम अच्छी गति से चल रहा है और परियोजना निर्धारित लक्ष्य के अनुसार आगे बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि लोगों को केवल परियोजना के बारे में जानकारी देने के बजाय वे स्वयं वहाँ आकर इसकी प्रगति देख सकते हैं। उन्होंने भरोसा जताया कि कुलशेखरपटनम परियोजना का काम मार्च तक पूरा होने की उम्मीद है।
कुलशेखरपटनम में प्रस्तावित प्रक्षेपण केंद्र भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के विस्तार के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसके तैयार होने से देश के प्रक्षेपण अभियानों के लिए एक अतिरिक्त सुविधा उपलब्ध होगी और विशेष रूप से छोटे उपग्रहों के प्रक्षेपण को गति मिलने की उम्मीद है। इससे भारत के बढ़ते अंतरिक्ष उद्योग और निजी कंपनियों की जरूरतों को भी समर्थन मिल सकता है।
वहीं, डॉ. वी. नारायणन ने भारत के महत्वाकांक्षी गगनयान कार्यक्रम को लेकर भी सकारात्मक जानकारी दी। उन्होंने कहा कि गगनयान का काम अच्छी तरह से आगे बढ़ रहा है और इस साल पहला बिना क्रू वाला मिशन भेजने का लक्ष्य रखा गया है। मानव अंतरिक्ष उड़ान से पहले बिना चालक दल वाले मिशन के जरिए प्रक्षेपण यान,अंतरिक्ष यान, जीवन रक्षक प्रणालियों और वापसी की तकनीक सहित विभिन्न प्रणालियों का परीक्षण किया जाएगा।
जीएसएलवी-एफ17 की सफलता और गगनयान की तैयारियों के बीच इसरो के सामने भारत की अंतरिक्ष क्षमताओं को अगले स्तर पर ले जाने की बड़ी जिम्मेदारी है। एक तरफ भारी उपग्रहों को स्वदेशी प्रक्षेपण यानों से अंतरिक्ष में स्थापित करने की क्षमता लगातार मजबूत हो रही है,वहीं दूसरी ओर निजी क्षेत्र की भागीदारी और नए प्रक्षेपण केंद्रों के विकास से पूरे अंतरिक्ष इकोसिस्टम के विस्तार की तैयारी है। ऐसे में जीएसएलवी-एफ17 मिशन की सफलता को भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की बढ़ती ताकत और भविष्य की महत्वाकांक्षी योजनाओं की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
