डोनाल्ड ट्रंप (तस्वीर क्रेडिट@wsyx6)

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन को दिया झटका,मिडटर्म चुनाव में नए मेल बैलेट नियम लागू करने पर रोक बरकरार

वॉशिंगटन,15 सितंबर (युआईटीवी)- अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को ट्रंप प्रशासन की उस कोशिश को झटका दे दिया,जिसके तहत नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनावों के लिए मेल बैलेट यानी डाक मतपत्रों से मतदान की प्रक्रिया में व्यापक बदलाव किए जाने थे। शीर्ष अदालत ने निचली अदालत द्वारा लगाए गए प्रतिबंध को हटाने की सरकार की आपातकालीन अपील को खारिज कर दिया। इसके साथ ही फिलहाल यह तय हो गया है कि तीन नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनाव में अमेरिकी डाक सेवा के नए नियम लागू नहीं किए जाएँगे। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश ने यह अंतिम फैसला नहीं दिया है कि भविष्य में डाक सेवा को इस तरह के नियम बनाने और लागू करने का अधिकार है या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने बिना हस्ताक्षर वाले आदेश में कहा कि सरकार के लिए यह दिखाना मुश्किल है कि निचली अदालत के शुरुआती आदेश को चुनौती देने वाले मामले में उसके पक्ष में फैसला आने की पर्याप्त संभावना है। अदालत ने यह भी कहा कि आपातकालीन राहत देने के लिए जिन परिस्थितियों और कानूनी पहलुओं पर विचार किया जाता है,वे इस मामले में निचली अदालत द्वारा लगाए गए प्रतिबंध को हटाने के पक्ष में नहीं हैं। इस फैसले का तत्काल प्रभाव आगामी मिडटर्म चुनाव पर पड़ेगा,जिसमें अमेरिकी प्रतिनिधि सभा और सीनेट के नियंत्रण को लेकर महत्वपूर्ण मुकाबला होने वाला है।

अमेरिका में डाक के जरिए मतदान चुनाव प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार,वर्ष 2024 के चुनाव में लगभग एक-तिहाई अमेरिकी मतदाताओं ने डाक मतपत्र के माध्यम से अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया था। ऐसे में चुनाव से कुछ ही समय पहले मेल बैलेट की व्यवस्था में व्यापक बदलाव करने की कोशिश ने राज्यों और चुनाव अधिकारियों के बीच चिंता बढ़ा दी थी। अधिकारियों का कहना था कि चुनावी प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है और इतने कम समय में नई व्यवस्था को लागू करने से मतदाताओं के लिए भ्रम पैदा हो सकता है।

विवाद की शुरुआत अमेरिकी डाक सेवा की ओर से अगस्त में नए नियम लागू किए जाने के बाद हुई। इन नियमों के पीछे मार्च में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा जारी किया गया कार्यकारी आदेश भी महत्वपूर्ण माना गया। नए प्रावधानों के तहत राज्यों को डाक से भेजे जाने वाले मतपत्रों के लिफाफों का डिजाइन बदलना पड़ता। चुनावी डाक की पहचान के लिए विशेष चिन्ह,मशीन से पढ़े जा सकने वाले फीचर और प्रत्येक मतदाता के लिए अलग विशेष बारकोड शामिल करना अनिवार्य किया गया था। इसके अलावा राज्यों को नए डिजाइन को संघीय स्तर पर मंजूरी के लिए भेजना पड़ता।

नए नियमों में राज्यों के लिए एक और महत्वपूर्ण बदलाव यह था कि उन्हें मतदाताओं के नाम,पते और संबंधित बारकोड की जानकारी अमेरिकी डाक सेवा के एक नए पोर्टल पर अपलोड करनी होती। डाक सेवा की ओर से इन प्रावधानों का पालन नहीं करने वाली डाक सामग्री को स्वीकार नहीं किए जाने और उसे संबंधित राज्य के चुनाव अधिकारियों के पास वापस भेजे जाने की व्यवस्था की गई थी। चुनाव अधिकारियों ने इसी प्रावधान को लेकर सबसे अधिक चिंता जताई। उनका कहना था कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के इतने करीब इस तरह के तकनीकी और प्रशासनिक बदलावों को लागू करना व्यावहारिक रूप से बेहद मुश्किल होगा।

कई राज्यों में चुनावी गतिविधियाँ पहले ही आगे बढ़ चुकी थीं। नॉर्थ कैरोलिना और विस्कॉन्सिन में मतपत्र भेजने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। इसके अलावा एक दर्जन से अधिक अन्य राज्यों में भी सप्ताह के अंत तक मतपत्र भेजने की तैयारी की जा रही थी। नॉर्थ कैरोलिना में लगभग तीन लाख अनुपस्थित मतदाताओं को बैलेट पहले ही भेजे जा चुके थे। ऐसे में यदि नए नियम तत्काल प्रभाव से लागू होते,तो पहले से तैयार और भेजे जा चुके मतपत्रों को लेकर भी स्थिति जटिल हो सकती थी।

नॉर्थ कैरोलिना के अटॉर्नी जनरल जेफ जैक्सन ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि मतदान शुरू हो चुका है और चुनाव के बीच में नियमों में बदलाव नहीं किया जा सकता। उनका तर्क था कि चुनावी व्यवस्था में स्थिरता बेहद जरूरी है और मतदाताओं को यह स्पष्ट जानकारी होनी चाहिए कि उनका वोट किस प्रक्रिया के तहत स्वीकार किया जाएगा। राज्यों के चुनाव अधिकारियों का कहना था कि नई व्यवस्था लागू करने के लिए उन्हें पर्याप्त समय नहीं दिया गया था और अचानक बदलाव से मतपत्रों के वितरण और उनकी वापसी की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती थी।

इस मामले में दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों से जुड़े चुनाव अधिकारियों ने भी सुप्रीम कोर्ट से वर्ष 2026 के चुनाव के लिए नए नियमों को रोकने का अनुरोध किया था। यह तथ्य महत्वपूर्ण है क्योंकि मेल बैलेट को लेकर अमेरिका में राजनीतिक दलों के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं। ट्रंप प्रशासन और उसके समर्थकों का कहना है कि चुनाव प्रक्रिया में अतिरिक्त सुरक्षा उपायों से मतदान की विश्वसनीयता बढ़ाई जा सकती है। वहीं, डेमोक्रेटिक नेतृत्व वाले राज्यों और मतदान अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों का आरोप है कि डाक सेवा चुनावी प्रक्रिया के ऐसे हिस्से में हस्तक्षेप करने की कोशिश कर रही है, जिसकी जिम्मेदारी मुख्य रूप से राज्यों के पास है।

ट्रंप प्रशासन की ओर से अदालत में यह तर्क दिया गया कि नए नियम अमेरिकी संविधान के अनुरूप हैं। सरकार का कहना था कि इनका उद्देश्य चुनावी डाक की पहचान और वितरण प्रक्रिया को बेहतर बनाना तथा चुनावों की सुरक्षा और विश्वसनीयता को मजबूत करना है। प्रशासन के अनुसार,बारकोड और अन्य तकनीकी सुविधाओं से मतपत्रों की पहचान और डाक व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित बनाया जा सकता है। सरकार ने निचली अदालत के आदेश को हटाने की माँग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

इसके विपरीत, डेमोक्रेटिक पार्टी के नेतृत्व वाले राज्यों और मतदान अधिकारों से जुड़े संगठनों ने इस व्यवस्था को लेकर संवैधानिक सवाल उठाए। उनका कहना था कि अमेरिकी संविधान में चुनावों के संचालन और उनके नियमन की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्यों को दी गई है। इसलिए संघीय एजेंसी द्वारा चुनावी मतपत्रों के डिजाइन,पहचान और मतदाता संबंधी जानकारी के प्रबंधन के लिए व्यापक नियम बनाना उसके अधिकार क्षेत्र को लेकर गंभीर सवाल पैदा करता है। उनका यह भी कहना था कि नए नियमों को चुनाव से कुछ ही समय पहले लागू करने से मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर सभी न्यायाधीशों की राय एक जैसी नहीं रही। जस्टिस सैमुअल एलिटो और क्लेरेंस थॉमस ने बहुमत के फैसले से असहमति जताई। एलिटो ने अपने विचार में कहा कि अमेरिकी डाक सेवा के पास डाक वितरण को नियंत्रित करने की व्यापक शक्ति है। उनके अनुसार,नए नियमों को चुनौती देने वाले पक्ष यह स्पष्ट रूप से साबित नहीं कर पाए कि डाक सेवा ने अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा को पार किया है। इस दृष्टिकोण के मुताबिक,डाक व्यवस्था से जुड़े नियम बनाने के मामले में संघीय एजेंसी को पर्याप्त अधिकार प्राप्त हैं।

जस्टिस ब्रेट कैवनॉ ने बहुमत के फैसले का समर्थन किया,लेकिन उन्होंने अपने अलग विचार में एक महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने संकेत दिया कि संभव है कि अमेरिकी डाक सेवा के पास भविष्य में इस तरह के नियम बनाने का अधिकार हो। उनके अनुसार,कम से कम इतनी संभावना मौजूद है कि अंतिम रूप से बनाए गए नियम डाक सेवा को कानून के तहत मिले अधिकारों की सीमा के भीतर आते हों। हालाँकि,उन्होंने तत्काल चुनाव में इन नियमों को लागू करने को लेकर गंभीर आपत्ति जताई।

कैवनॉ के अनुसार, वर्ष 2026 के चुनाव में नए नियम लागू करना मनमाना और अनुचित होता,क्योंकि राज्यों और स्थानीय चुनाव अधिकारियों के पास उन्हें सही तरीके से लागू करने के लिए पर्याप्त समय नहीं था। इस टिप्पणी से संकेत मिलता है कि सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल नियमों को लागू करने से रोकने का फैसला मुख्य रूप से चुनाव की समयसीमा और प्रशासनिक कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए किया है। अदालत ने इस चरण में यह अंतिम रूप से तय नहीं किया कि अमेरिकी डाक सेवा के पास भविष्य के चुनावों के लिए ऐसी व्यवस्था बनाने का संवैधानिक और कानूनी अधिकार है या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इस वर्ष होने वाले मिडटर्म चुनावों में राज्यों को फिलहाल मौजूदा व्यवस्था के तहत मेल बैलेट की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का अवसर मिल गया है। इससे चुनाव अधिकारियों को राहत मिली है, क्योंकि उन्हें अंतिम समय में लिफाफों का डिजाइन बदलने, नए बारकोड तैयार करने, संघीय मंजूरी लेने और मतदाता संबंधी जानकारी नए पोर्टल पर अपलोड करने जैसी प्रक्रिया से गुजरना नहीं पड़ेगा।

हालाँकि, यह विवाद यहीं समाप्त होता दिखाई नहीं दे रहा। सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल चुनाव के लिए नए नियमों को रोकने की स्थिति स्पष्ट की है,लेकिन भविष्य में डाक सेवा की शक्तियों और राज्यों के चुनावी अधिकारों को लेकर कानूनी बहस जारी रह सकती है। आने वाले समय में अदालत को यह तय करना पड़ सकता है कि चुनावी डाक व्यवस्था में संघीय एजेंसी की भूमिका कितनी व्यापक हो सकती है और राज्यों की संवैधानिक जिम्मेदारियों की सीमा कहाँ तक है।

मिडटर्म चुनावों के संदर्भ में यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इन चुनावों के जरिए प्रतिनिधि सभा और सीनेट में राजनीतिक शक्ति का संतुलन तय होगा। ऐसे में मतदान प्रक्रिया को लेकर किसी भी बड़े बदलाव का असर चुनावी व्यवस्था और मतदाताओं के भरोसे पर पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा आदेश ने कम-से-कम इस चुनाव के लिए स्थिति को स्थिर कर दिया है। अब राज्य और स्थानीय चुनाव अधिकारी मौजूदा व्यवस्था के तहत मतदान प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकेंगे,जबकि डाक मतपत्रों से जुड़े नए संघीय नियमों की वैधानिकता और भविष्य में उनके संभावित इस्तेमाल पर बहस आगे जारी रहने की संभावना है।