ऑस्ट्रेलियाई सिग्नल्स डायरेक्टरेट की महानिदेशक एबिगेल ब्रैडशॉ (तस्वीर क्रेडिट@BobBurn97207272)

ऑस्ट्रेलिया ने एआई खतरों को लेकर जताई चिंता,साइबर एजेंसी प्रमुख ने शुरुआती चेतावनी प्रणाली की जरूरत बताई

कैनबरा,15 सितंबर (युआईटीवी)- ऑस्ट्रेलिया की साइबर खुफिया एजेंसी के प्रमुख ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई से पैदा होने वाले संभावित खतरों को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। उन्होंने कहा है कि देश को एआई से जुड़े जोखिमों और हमलों की पहचान समय रहते करने के लिए एक प्रभावी शुरुआती चेतावनी प्रणाली विकसित करने की जरूरत है। उनका मानना है कि जिस तरह साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में संभावित खतरों का पहले से पता लगाने के लिए व्यवस्थाएँ मौजूद हैं, उसी तरह एआई के संदर्भ में भी ऐसी व्यवस्था तैयार करना जरूरी हो गया है। यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब दुनिया के कई देशों में एआई के तेजी से विकास और उसके संभावित दुरुपयोग को लेकर बहस तेज हो रही है।

ऑस्ट्रेलियाई सिग्नल्स डायरेक्टरेट की महानिदेशक एबिगेल ब्रैडशॉ ने सोमवार को कैनबरा में आयोजित एक शिखर सम्मेलन के दौरान एआई से जुड़े खतरों पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि एआई आधारित हमले सरकारों और कंपनियों की ओर से इस्तेमाल की जा रही पुरानी तकनीकी प्रणालियों की कमजोरियों का फायदा उठा सकते हैं। उनके अनुसार,तकनीकी क्षेत्र में एआई का इस्तेमाल जितनी तेजी से बढ़ रहा है, उसी अनुपात में इससे जुड़े सुरक्षा जोखिमों को समझना और उनका मुकाबला करने की तैयारी करना भी जरूरी है।

ब्रैडशॉ ने कहा कि फिलहाल साइबर क्षेत्र में शुरुआती चेतावनी देने वाली व्यवस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन एआई के क्षेत्र में ऐसी औपचारिक व्यवस्था अभी विकसित नहीं हुई है। उन्होंने इसे एक महत्वपूर्ण कमी बताते हुए कहा कि संभावित जोखिमों का शुरुआती चरण में पता लगाने के लिए एक ऐसी प्रणाली की जरूरत है,जो खतरे के गंभीर रूप लेने से पहले सुरक्षा एजेंसियों और संबंधित संस्थानों को सतर्क कर सके। उनका कहना था कि एआई के तेजी से बदलते स्वरूप को देखते हुए इस दिशा में देरी करना जोखिम को बढ़ा सकता है।

उन्होंने संगठनों से एआई को केवल खतरे के रूप में देखने के बजाय उसे सुरक्षा के एक प्रभावी साधन के रूप में अपनाने की भी अपील की। उनके मुताबिक,एआई का उपयोग साइबर सुरक्षा को मजबूत करने,संदिग्ध गतिविधियों की पहचान करने और संभावित हमलों का तेजी से विश्लेषण करने में किया जा सकता है। इसके साथ ही उन्होंने खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों तथा एआई विकसित करने वाली कंपनियों के बीच सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया। उनका मानना है कि दोनों पक्ष मिलकर काम करेंगे तो नए जोखिमों की पहचान अधिक तेजी से की जा सकेगी और उनसे निपटने के उपाय भी समय रहते तैयार किए जा सकेंगे।

ब्रैडशॉ की यह टिप्पणी उस समय सामने आई है,जब दुनियाभर में एआई की तेज रफ्तार को लेकर चिंता बढ़ रही है। एआई विकसित करने वाली कंपनियाँ लगातार अधिक सक्षम मॉडल तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। इसके साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या एआई की क्षमताओं में हो रही वृद्धि के साथ सुरक्षा उपाय भी उसी गति से विकसित हो रहे हैं। कई विशेषज्ञों और तकनीकी क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि एआई की क्षमता मानव नियंत्रण और निगरानी की क्षमता से आगे निकलती है,तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

इसी बहस के बीच एंथ्रोपिक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डारियो अमोदेई ने हाल ही में एआई उद्योग से विकास की गति को लेकर सावधानी बरतने की अपील की थी। उन्होंने सुझाव दिया था कि एआई मॉडल की सुरक्षा व्यवस्था और तय किए गए सुरक्षा मानकों के पालन की जांच स्वतंत्र तीसरे पक्ष के मूल्यांकनकर्ताओं से कराई जानी चाहिए। उनका तर्क था कि केवल एआई विकसित करने वाली कंपनियों पर सुरक्षा की जिम्मेदारी छोड़ना पर्याप्त नहीं होगा। इससे एआई के विकास और उसके सुरक्षित इस्तेमाल के बीच बेहतर संतुलन बनाने में मदद मिल सकती है।

अमोदेई की चिंताओं को तकनीकी क्षेत्र के कुछ अन्य बड़े नामों का भी समर्थन मिला। ओपनएआई के प्रमुख सैम ऑल्टमैन और एक्सएआई के प्रमुख एलन मस्क ने भी एआई सुरक्षा को लेकर सावधानी बरतने की जरूरत पर सहमति जताई। इससे यह संकेत मिलता है कि एआई उद्योग के भीतर भी अब केवल तकनीकी क्षमता बढ़ाने के बजाय सुरक्षा, निगरानी और जवाबदेही को लेकर चर्चा महत्वपूर्ण होती जा रही है।

ऑस्ट्रेलिया में भी इस मुद्दे पर सरकार का रुख सामने आया है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी और डिजिटल अर्थव्यवस्था के सहायक मंत्री एंड्रयू चार्लटन ने सोमवार को कहा कि एआई के लिए सुरक्षा मानक तय करने की पूरी जिम्मेदारी केवल तकनीकी कंपनियों या अमेरिका जैसी बड़ी शक्तियों पर नहीं छोड़ी जा सकती। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार को इस प्रक्रिया में अपनी भूमिका निभानी होगी और यह तय करने का अधिकार केवल कंपनियों या कुछ प्रभावशाली देशों तक सीमित नहीं होना चाहिए कि एआई को किस तरह सुरक्षित बनाया जाए।

चार्लटन ने कहा कि उन्हें इस बात को लेकर अत्यधिक चिंतित नहीं होना चाहिए कि अलग-अलग कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी या अधिकारी क्या राय रखते हैं। उनका कहना था कि एआई सुरक्षा को केवल कंपनियों के भरोसे छोड़ना उचित नहीं होगा। इसी तरह यह जिम्मेदारी केवल बड़ी वैश्विक शक्तियों को सौंपना भी सही नहीं है। उनके अनुसार,एआई से जुड़े नियम और सुरक्षा उपाय व्यापक सार्वजनिक हित को ध्यान में रखकर तय किए जाने चाहिए।

ऑस्ट्रेलियाई सरकार के इस रुख से यह स्पष्ट होता है कि देश एआई को लेकर संतुलित नीति तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है। एक ओर सरकार एआई से मिलने वाले आर्थिक और तकनीकी अवसरों का लाभ उठाना चाहती है,वहीं दूसरी ओर वह इससे जुड़े साइबर और राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिमों को नजरअंदाज करने के पक्ष में नहीं है। एआई का इस्तेमाल सरकारी सेवाओं, कारोबार, साइबर सुरक्षा और कई अन्य क्षेत्रों में बढ़ रहा है। ऐसे में इसके दुरुपयोग से जुड़े खतरे भी व्यापक हो सकते हैं।

विशेषज्ञों की चिंता केवल एआई द्वारा सीधे किए जाने वाले हमलों तक सीमित नहीं है। मौजूदा डिजिटल ढाँचे की कमजोरियों का फायदा उठाकर एआई आधारित तकनीक अधिक प्रभावी और तेजी से साइबर हमले करने में मदद कर सकती है। पुरानी प्रणालियों में मौजूद कमियों की पहचान,बड़े पैमाने पर सूचनाओं का विश्लेषण और संभावित कमजोरियों का इस्तेमाल करने की क्षमता एआई को साइबर सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती बना सकती है।

इसी वजह से ऑस्ट्रेलिया की साइबर खुफिया एजेंसी अब एआई से जुड़े खतरों के लिए शुरुआती चेतावनी प्रणाली विकसित करने की जरूरत पर जोर दे रही है। यदि ऐसी व्यवस्था तैयार होती है,तो सुरक्षा एजेंसियों को संभावित खतरों का पता पहले ही चल सकेगा और सरकार तथा निजी क्षेत्र समय रहते बचाव की तैयारी कर सकेंगे। साथ ही एआई कंपनियों के साथ बेहतर समन्वय से नई तकनीकों में सुरक्षा उपायों को शुरुआत से ही शामिल करने की संभावना बढ़ेगी।

कुल मिलाकर,ऑस्ट्रेलिया में एआई सुरक्षा को लेकर सामने आई बहस यह संकेत देती है कि आने वाले समय में केवल एआई के विकास की गति महत्वपूर्ण नहीं होगी,बल्कि उसकी निगरानी, जवाबदेही और सुरक्षा भी उतनी ही अहम होगी। शुरुआती चेतावनी प्रणाली, स्वतंत्र मूल्यांकन और सरकार तथा तकनीकी कंपनियों के बीच सहयोग इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। ऑस्ट्रेलिया का संदेश साफ है कि एआई के भविष्य का फैसला केवल तकनीकी कंपनियों या बड़ी वैश्विक शक्तियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।