अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (तस्वीर क्रेडिट@Chris_1791)

ट्रंप ने रूस-ईरान प्रतिबंध कानून पर किए हस्ताक्षर,रूसी तेल-गैस के बड़े खरीदारों पर 100% तक टैरिफ का प्रावधान

वॉशिंगटन,19 सितंबर (युआईटीवी)- अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और ईरान के खिलाफ आर्थिक दबाव बढ़ाने वाले नए कानून पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस कानून के तहत रूस पर प्रतिबंधों का दायरा बढ़ाने के साथ-साथ रूसी कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के बड़े खरीदारों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों से बचने में उसकी मदद करने वाले देशों और संस्थाओं के खिलाफ भी कार्रवाई का रास्ता साफ किया गया है। वहीं,ईरान के खिलाफ पहले से लागू अमेरिकी प्रतिबंधों को पाँच साल के लिए बढ़ाया गया है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने शुक्रवार को ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ पर हस्ताक्षर किए। इस कानून के जरिए अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस के खिलाफ कानूनी प्रतिबंध, टैरिफ और अन्य प्रतिबंधात्मक उपाय लगाने तथा मौजूदा उपायों को आगे बढ़ाने का अधिकार दिया गया है। कानून में रूस से जुड़े विभिन्न आर्थिक और वित्तीय नेटवर्क को निशाना बनाने की व्यवस्था भी की गई है।

इस कानून का सबसे अहम हिस्सा रूस की ऊर्जा खरीद से जुड़ा है। इसके तहत अमेरिकी राष्ट्रपति रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस आयात करने वाले पाँच सबसे बड़े देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगा सकते हैं। इसके अलावा ऐसे पांच प्रमुख देशों को भी टैरिफ के दायरे में लाया जा सकता है,जो रूस को उसके तेल पर लगाए गए प्रतिबंधों से बचने में मदद कर रहे हैं। हालाँकि, कानून पर हस्ताक्षर किए जाने के समय किसी देश का नाम नहीं बताया गया और न ही यह स्पष्ट किया गया कि किसी विशेष देश पर कितने प्रतिशत टैरिफ लगाया जाएगा।

इसका मतलब यह है कि 100 प्रतिशत टैरिफ तत्काल सभी बड़े खरीदार देशों पर लागू नहीं हुआ है। कानून ने अमेरिकी राष्ट्रपति को अधिकतम 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार दिया है। किसी देश के खिलाफ इस अधिकार का इस्तेमाल कब और किस दर से किया जाएगा,यह आगे अमेरिकी प्रशासन के फैसले पर निर्भर करेगा।

कानून में प्राकृतिक गैस खरीदने वाले कुछ देशों के लिए छूट का प्रावधान भी किया गया है। यदि कोई देश रूस के कुल प्राकृतिक गैस निर्यात के 15 प्रतिशत से कम हिस्से का आयात करता है और साथ ही रूसी गैस पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठा रहा है,तो उसे कुछ परिस्थितियों में टैरिफ से छूट मिल सकती है। इस प्रावधान के जरिए उन देशों के लिए राहत का विकल्प रखा गया है,जो रूस से ऊर्जा आयात कम करने की दिशा में काम कर रहे हैं।

नए कानून का दायरा केवल रूसी तेल और गैस के खरीदारों तक सीमित नहीं है। इसमें रूस के अधिकारियों,बड़े कारोबारियों और उनके परिवार के सदस्यों के खिलाफ प्रतिबंध बढ़ाने का प्रावधान है। इसके साथ ही रूसी बैंकों और वित्तीय संस्थानों को भी निशाना बनाया गया है। रूस के तथाकथित ‘शैडो फ्लीट’ पर भी कार्रवाई की जा सकती है। शैडो फ्लीट में ऐसे जहाजों का नेटवर्क शामिल माना जाता है,जिनका इस्तेमाल रूस के तेल कारोबार को मौजूदा प्रतिबंधों से बचाकर जारी रखने के लिए किया जाता है।

कानून में रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध में रूस का समर्थन करने वाले लोगों और संस्थाओं पर भी कार्रवाई का प्रावधान है। इसके तहत प्राथमिक और द्वितीयक दोनों तरह के प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इसका दायरा रूस की सीमाओं से बाहर तक बढ़ सकता है और उन विदेशी लोगों या संस्थाओं को भी प्रभावित कर सकता है,जो रूस की युद्ध गतिविधियों या प्रतिबंधों से बचने की कोशिशों में मदद करते हैं।

इस कानून के पीछे अमेरिकी प्रशासन और इसके समर्थक सांसदों का तर्क है कि रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाकर यूक्रेन में जारी युद्ध को समाप्त करने के प्रयासों को आगे बढ़ाया जा सकता है। उनका कहना है कि रूस की ऊर्जा आय उसके लिए महत्वपूर्ण आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराती है और तेल तथा गैस कारोबार को निशाना बनाकर उसकी वित्तीय क्षमता पर दबाव डाला जा सकता है।

कानून के समर्थन में प्रमुख भूमिका निभाने वाली रिपब्लिकन सांसद केटी ब्रिट ने कहा कि राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ रूस और उन देशों को स्पष्ट संदेश दिया गया है,जो रूस की युद्ध मशीन को वित्तीय सहायता उपलब्ध करा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यूक्रेन के खिलाफ रूस की कार्रवाई का विरोध करने में अमेरिका एकजुट है। उन्होंने कानून को आगे बढ़ाने में अमेरिकी संसद के दोनों सदनों और प्रशासन में सहयोग करने वाले नेताओं का भी आभार जताया।

ब्रिट ने इस कानून को आगे बढ़ाने में सीनेटर लिंडसे ओ. ग्राहम की भूमिका की भी सराहना की। उनके अनुसार, कानून को तैयार करने और उसे पारित कराने की प्रक्रिया में ग्राहम का योगदान महत्वपूर्ण रहा। ट्रंप के साथ कानून पर हस्ताक्षर किए जाने के दौरान केटी ब्रिट और टेक्सास के रिपब्लिकन प्रतिनिधि माइकल मैककॉल भी मौजूद थे।

कानून के समर्थन में रिपब्लिकन प्रतिनिधि माइक सिम्पसन ने भी रूस पर अतिरिक्त आर्थिक प्रतिबंध लगाने को युद्ध समाप्त करने की कोशिशों का एक माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि यूक्रेन में युद्ध लंबे समय से जारी है और रूस को युद्ध जीतने का दावा करने की स्थिति नहीं दी जानी चाहिए। उनके अनुसार,रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के उपायों का उद्देश्य संघर्ष के समाधान की दिशा में दबाव बनाना है।

हालाँकि,इतने व्यापक टैरिफ अधिकार दिए जाने को लेकर कुछ सवाल भी उठाए गए हैं। रूस से कारोबार करने वाले तीसरे देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने से अमेरिका के उन देशों के साथ व्यापारिक संबंध प्रभावित हो सकते हैं। विशेष रूप से उन देशों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस पर निर्भर हैं और साथ ही अमेरिका के साथ भी बड़े व्यापारिक संबंध रखते हैं।

भारत के लिए भी इस कानून का महत्व काफी अधिक है। भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है और पिछले कुछ वर्षों में रूसी तेल भारतीय ऊर्जा आयात का एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। ऐसे में यदि अमेरिकी प्रशासन रूस से तेल खरीदने वाले बड़े देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लागू करता है,तो इसका असर भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर पड़ सकता है।

हालाँकि,अभी यह स्पष्ट नहीं है कि भारत को इस कानून के तहत टैरिफ के दायरे में रखा जाएगा या नहीं। कानून में किसी भी देश का नाम तय करके नहीं बताया गया है। साथ ही 100 प्रतिशत टैरिफ को भी अनिवार्य दर नहीं बनाया गया है। इसलिए आगे अमेरिकी प्रशासन की ओर से लिए जाने वाले फैसले महत्वपूर्ण होंगे।

भारत के लिए इसका दूसरा पहलू ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा है। यदि रूसी तेल खरीदने वाले बड़े देशों पर दबाव बढ़ता है,तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में खरीद के पैटर्न में बदलाव आ सकता है। इससे तेल की माँग,आपूर्ति और कीमतों पर असर पड़ने की संभावना बन सकती है। भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में बदलाव का सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

रूस के लिए भी नया कानून अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा कारोबार और वित्तीय व्यवस्था के लिहाज से चुनौती बढ़ा सकता है। यदि बड़े खरीदारों पर अमेरिकी टैरिफ लागू होते हैं,तो रूस को अपने ऊर्जा निर्यात के लिए वैकल्पिक बाजारों और नए व्यापारिक रास्तों पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है। साथ ही रूसी बैंकों और वित्तीय संस्थानों पर बढ़ते प्रतिबंध अंतर्राष्ट्रीय लेनदेन को प्रभावित कर सकते हैं।

ईरान के खिलाफ प्रतिबंधों को पाँच साल के लिए बढ़ाना भी इस कानून का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अमेरिका लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम, ऊर्जा क्षेत्र और अन्य गतिविधियों को लेकर प्रतिबंध लागू करता रहा है। नए कानून के बाद इन प्रतिबंधों को आगे भी जारी रखने के लिए कानूनी आधार मजबूत किया गया है। इस तरह एक ही कानून के जरिए रूस और ईरान दोनों के खिलाफ अमेरिकी आर्थिक दबाव को आगे बढ़ाया गया है।

कानून के लागू होने के बाद अब निगाह इस बात पर होगी कि ट्रंप प्रशासन इसका इस्तेमाल किस तरह करता है। रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों की सूची,संभावित टैरिफ की दर और प्रतिबंधों के दायरे को लेकर आने वाले फैसले इस कानून के वास्तविक प्रभाव को तय करेंगे।

कुल मिलाकर,ट्रंप द्वारा हस्ताक्षर किए गए नए कानून ने रूस के खिलाफ अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों को व्यापक बनाने का रास्ता खोल दिया है। रूसी तेल और गैस के बड़े खरीदारों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार,रूस के अधिकारियों और कारोबारियों पर प्रतिबंध,बैंकों और वित्तीय संस्थानों पर कार्रवाई तथा शैडो फ्लीट को निशाना बनाने जैसे प्रावधान इसमें शामिल हैं। इसके साथ ही ईरान पर मौजूदा अमेरिकी प्रतिबंधों को पाँच साल के लिए बढ़ाया गया है। अब आने वाले अमेरिकी फैसले यह तय करेंगे कि इन प्रावधानों का इस्तेमाल किन देशों और संस्थाओं के खिलाफ और किस स्तर पर किया जाता है।