वॉशिंगटन,19 सितंबर (युआईटीवी)- अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एच-1बी वीजा कार्यक्रम को लेकर एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। अमेरिकी प्रशासन ने कुछ एच-1बी वीजा आवेदनों के लिए 1 लाख डॉलर की फीस को फिर से लागू करने का फैसला किया है। इसके साथ ही उन नियोक्ताओं की भी कड़ी जाँच करने का निर्देश दिया गया है, जिन्होंने हाल के समय में अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी की है या भविष्य में ऐसी कटौती की योजना बना रहे हैं। प्रशासन का कहना है कि इन कदमों का उद्देश्य अमेरिकी कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना और एच-1बी वीजा कार्यक्रम के संभावित दुरुपयोग पर रोक लगाना है।
व्हाइट हाउस की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक,1 लाख डॉलर की फीस की व्यवस्था को आगे बढ़ाया गया है। यह शुल्क कुछ एच-1बी आवेदनों पर लागू होगा। यह वही शुल्क है जिसे पहली बार सितंबर 2025 में लागू किया गया था। नई व्यवस्था के तहत इस शुल्क की अवधि को आगे बढ़ाया गया है। हालाँकि,सभी एच-1बी आवेदनों पर समान रूप से यह शुल्क लागू नहीं होगा और कुछ विशेष परिस्थितियों में छूट का प्रावधान भी हो सकता है।
इसके साथ ही ट्रंप प्रशासन ने एच-1बी वीजा से जुड़े मामलों में नियोक्ताओं की रोजगार नीतियों की जाँच बढ़ाने का फैसला किया है। नए कार्यकारी आदेश के तहत संबंधित सरकारी एजेंसियों को यह पता लगाने का निर्देश दिया गया है कि एच-1बी कर्मचारियों को प्रायोजित करने वाले किसी नियोक्ता ने पिछले एक साल के दौरान अमेरिकी कर्मचारियों की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से छंटनी की है या नहीं। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि संबंधित कंपनी भविष्य में ऐसी छंटनी करने की योजना तो नहीं बना रही है,जिससे समान पदों पर काम करने वाले अमेरिकी कर्मचारी प्रभावित हो सकते हैं।
नई व्यवस्था केवल वीजा आवेदन तक सीमित नहीं रहेगी। लेबर कंडीशन एप्लीकेशन, एच-1बी याचिका,वीजा जारी करने और अमेरिका में प्रवेश से जुड़े मामलों की समीक्षा के दौरान भी नियोक्ता के रोजगार रिकॉर्ड को ध्यान में रखा जाएगा। इससे एच-1बी कर्मचारियों को नियुक्त करने वाली कंपनियों के लिए आवेदन प्रक्रिया में अतिरिक्त जाँच और अनुपालन की जरूरत बढ़ सकती है।
हालाँकि,कार्यकारी आदेश में यह नहीं कहा गया है कि किसी कंपनी द्वारा छंटनी किए जाने की जानकारी सामने आने पर उसका एच-1बी आवेदन अपने आप खारिज कर दिया जाएगा। यानी केवल छंटनी की घोषणा को आवेदन अस्वीकार करने का स्वत: आधार नहीं बनाया गया है। इसके बजाय अधिकारियों को मामले की परिस्थितियों,नियोक्ता के रिकॉर्ड और अमेरिकी कर्मचारियों पर संभावित प्रभाव को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेने का निर्देश दिया गया है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आदेश में कहा कि अमेरिकी कार्यबल की सुरक्षा और उन्हें प्राथमिकता देने के लिए लगातार प्रयास किए जाने चाहिए। प्रशासन का तर्क है कि एच-1बी कार्यक्रम का इस्तेमाल मूल रूप से विशेष कौशल वाले विदेशी कर्मचारियों को अमेरिका में काम करने का अवसर देने के लिए किया गया था,लेकिन कुछ मामलों में इसका इस्तेमाल अमेरिकी कर्मचारियों की जगह विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने के लिए किया गया।
कार्यकारी आदेश में अमेरिकी कर्मचारियों की बड़ी संख्या में हुई छंटनी का भी उल्लेख किया गया है। प्रशासन ने आरोप लगाया है कि तकनीकी क्षेत्र में कुछ नियोक्ताओं ने एच-1बी वीजा के जरिए बड़ी संख्या में विदेशी कर्मचारियों की माँग की,जबकि इसी अवधि में बड़ी संख्या में अमेरिकी कर्मचारियों की नौकरियाँ गईं। प्रशासन ने यह भी आरोप लगाया है कि कुछ नियोक्ताओं और आउटसोर्सिंग कंपनियों ने एच-1बी कार्यक्रम के तहत नौकरी की जिम्मेदारियों,काम की परिस्थितियों या आवेदकों की योग्यता के बारे में गलत जानकारी दी।
इन आरोपों को लेकर संबंधित नियोक्ताओं या आउटसोर्सिंग कंपनियों की कोई प्रतिक्रिया प्रशासन की ओर से जारी जानकारी में शामिल नहीं की गई है। इसलिए इन आरोपों पर कंपनियों का पक्ष सामने आना भी महत्वपूर्ण होगा।
ट्रंप प्रशासन ने यह भी दावा किया है कि सितंबर 2025 में 1 लाख डॉलर की फीस लागू किए जाने के बाद बड़ी आईटी आउटसोर्सिंग कंपनियों की ओर से एच-1बी पंजीकरण में भारी गिरावट आई। प्रशासन के अनुसार,सबसे बड़ी आईटी आउटसोर्सिंग कंपनियों द्वारा जमा किए गए पंजीकरण में करीब 92 प्रतिशत की कमी आई। इसके अलावा,वाणिज्य दूतावास के माध्यम से एच-1बी प्रक्रिया पूरी करने से जुड़े अनुरोधों में भी लगभग 97 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
प्रशासन का कहना है कि शुल्क और अन्य नियमों में बदलाव के बाद एच-1बी कार्यक्रम में उच्च वेतन और अधिक कौशल वाले उम्मीदवारों की हिस्सेदारी बढ़ी है। अमेरिकी मास्टर डिग्री या उससे अधिक योग्यता रखने वाले उम्मीदवारों की हिस्सेदारी में भी बढ़ोतरी का दावा किया गया है। वहीं,ऊँचे वेतन स्तर वाले पदों के लिए चयनित उम्मीदवारों की संख्या बढ़ने की बात भी कही गई है।
एच-1बी कार्यक्रम में केवल फीस और नियोक्ताओं की जाँच ही नहीं बदली गई है। दिसंबर 2025 में अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग ने एच-1बी चयन प्रक्रिया में भी बदलाव किया था। पहले जहाँ पंजीकरण का चयन मुख्य रूप से यादृच्छिक प्रक्रिया के आधार पर किया जाता था,वहीं नई व्यवस्था में वेतन स्तर के आधार पर अलग-अलग वजन देने का प्रावधान किया गया। यानी अधिक वेतन वाले पदों से जुड़े पंजीकरणों को चयन प्रक्रिया में अधिक महत्व दिया जाता है।
इस नई व्यवस्था का इस्तेमाल वित्तीय वर्ष 2027 में पहली बार किया गया। प्रशासन के अनुसार,इसके बाद एच-1बी पंजीकरण की कुल संख्या में करीब 40 प्रतिशत की कमी आई। सरकार का कहना है कि इस बदलाव से कार्यक्रम में कम वेतन वाले पदों के लिए होने वाले आवेदन को कम करने और अधिक कुशल पेशेवरों को प्राथमिकता देने में मदद मिल सकती है।
नए आदेश में श्रम विभाग की भूमिका भी बढ़ाई गई है। विभाग के वेज एंड आवर डिवीजन को पहले जमा किए गए लेबर कंडीशन एप्लीकेशन से जुड़े आँकड़ों की समीक्षा शुरू करने के लिए 30 दिन की समय सीमा दी गई है। इस समीक्षा के जरिए यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि एच-1बी कर्मचारियों को प्रायोजित करने वाले नियोक्ताओं ने नियमों का पालन किया है या नहीं और क्या किसी मामले में आगे कार्रवाई की आवश्यकता है।
इसके अलावा,एच-1बी मामलों की समीक्षा करते समय विदेश विभाग, श्रम विभाग और गृह सुरक्षा विभाग को अन्य सरकारी एजेंसियों से भी जानकारी लेने के लिए कहा गया है। वाणिज्य विभाग, शिक्षा विभाग और लघु व्यवसाय प्रशासन से वेतन, रोजगार, शिक्षा, उद्योग और आर्थिक गतिविधियों से जुड़ी जानकारी हासिल की जा सकती है। इस जानकारी का इस्तेमाल एच-1बी आवेदनों और संबंधित नियोक्ताओं के रिकॉर्ड की व्यापक समीक्षा में किया जाएगा।
इन बदलावों का असर अमेरिका में काम करने वाले विदेशी कुशल पेशेवरों और उन्हें नियुक्त करने वाली कंपनियों पर पड़ सकता है। खासतौर पर तकनीकी क्षेत्र की कंपनियों को एच-1बी कर्मचारियों की नियुक्ति और वीजा प्रायोजन के दौरान अधिक लागत और अतिरिक्त जाँच का सामना करना पड़ सकता है। भारतीय पेशेवरों के लिए भी यह बदलाव महत्वपूर्ण है,क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय तकनीकी विशेषज्ञ एच-1बी वीजा के जरिए अमेरिका में काम करते हैं।
नई व्यवस्था के बाद कंपनियों को एच-1बी आवेदन दाखिल करते समय केवल उम्मीदवार की योग्यता और पद की जरूरतों पर ही ध्यान नहीं देना होगा, बल्कि अपने कर्मचारियों से जुड़े रोजगार रिकॉर्ड और संभावित छंटनी की स्थिति को भी ध्यान में रखना पड़ सकता है। यदि किसी कंपनी ने हाल में अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी की है,तो अधिकारियों द्वारा उसके एच-1बी मामलों की अधिक विस्तार से समीक्षा की जा सकती है।
कुल मिलाकर,ट्रंप प्रशासन ने एच-1बी कार्यक्रम के लिए फीस, चयन प्रक्रिया और नियोक्ताओं की निगरानी—तीनों स्तरों पर सख्ती बढ़ाई है। 1 लाख डॉलर की फीस को आगे बढ़ाने के साथ अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी करने वाले नियोक्ताओं की जांच का दायरा बढ़ाया गया है। वहीं,वेतन आधारित चयन व्यवस्था के जरिए अधिक वेतन वाले पदों को प्रक्रिया में ज्यादा महत्व देने की कोशिश की गई है। इन बदलावों से आने वाले समय में अमेरिकी कंपनियों,विदेशी कुशल कर्मचारियों और खासकर भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए एच-1बी वीजा प्रक्रिया की लागत और आवश्यकताओं में बदलाव देखने को मिल सकता है।
