सोल,19 सितंबर (युआईटीवी)- उत्तर कोरिया ने अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के हालिया प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है। प्योंगयांग ने स्पष्ट किया है कि वह अपनी परमाणु क्षमता को बनाए रखने के साथ-साथ उसकी विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन की बहन और देश की वरिष्ठ अधिकारी किम यो-जोंग ने आईएईए के प्रस्ताव पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनका देश अपनी संप्रभुता और सुरक्षा से जुड़े फैसले किसी दूसरे देश की सहमति या अनुमति के आधार पर नहीं करेगा।
आईएईए ने गुरुवार को वियना में आयोजित अपने 70वें महासम्मेलन के दौरान उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ा एक प्रस्ताव पारित किया था। प्रस्ताव में परमाणु अप्रसार संधि के तहत उत्तर कोरिया को परमाणु हथियार संपन्न देश के रूप में मान्यता नहीं देने की स्थिति दोहराई गई। इसके साथ ही एजेंसी ने प्योंगयांग से अपनी परमाणु गतिविधियों को तत्काल रोकने और परमाणु अप्रसार से जुड़ी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं का पालन करने का आह्वान किया।
इस प्रस्ताव के बाद उत्तर कोरिया की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। किम यो-जोंग ने उत्तर कोरियाई सरकारी मीडिया के माध्यम से जारी बयान में आईएईए के रुख पर सवाल उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि एजेंसी उत्तर कोरिया की सुरक्षा स्थिति पर पड़ने वाले बाहरी परमाणु खतरों को नजरअंदाज करते हुए केवल प्योंगयांग की परमाणु गतिविधियों को निशाना बना रही है। उनके अनुसार,आईएईए का प्रस्ताव उत्तर कोरिया के खिलाफ एकतरफा रुख को दर्शाता है।
किम यो-जोंग ने अपने बयान में अमेरिका की परमाणु नीति का भी उल्लेख किया। उन्होंने यूरोप में अमेरिकी परमाणु हथियारों की तैनाती और साझा करने की व्यवस्था का हवाला देते हुए कहा कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को केवल उत्तर कोरिया की परमाणु क्षमता पर सवाल उठाने के बजाय अन्य देशों की परमाणु गतिविधियों को भी समान नजरिए से देखना चाहिए। उन्होंने दक्षिण कोरिया और जापान के साथ अमेरिका की विस्तारित परमाणु प्रतिरोध व्यवस्था तथा दक्षिण कोरिया को परमाणु पनडुब्बी से जुड़ी तकनीक उपलब्ध कराने की योजनाओं का भी जिक्र किया।
उत्तर कोरियाई पक्ष इन गतिविधियों को क्षेत्रीय सुरक्षा वातावरण से जोड़कर देखता है। प्योंगयांग का कहना है कि अमेरिका और उसके सहयोगियों की सैन्य एवं परमाणु क्षमताओं के बीच उत्तर कोरिया के लिए अपनी रक्षा क्षमता को बनाए रखना आवश्यक है। किम यो-जोंग ने इसी आधार पर आईएईए के प्रस्ताव को कथित दोहरे मानदंड का उदाहरण बताया।
उन्होंने कहा कि उत्तर कोरिया अपनी संप्रभुता और सुरक्षा के अधिकार को अमेरिका या पश्चिमी देशों की कथित सहमति पर निर्भर नहीं करेगा। उनके मुताबिक राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए यह सुनिश्चित करना सबसे महत्वपूर्ण है कि उत्तर कोरिया की परमाणु क्षमता की विश्वसनीयता पर किसी भी परिस्थिति में सवाल न उठे। उनके इस बयान से यह संकेत मिलता है कि प्योंगयांग फिलहाल अपने परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने की दिशा में आगे बढ़ने के बजाय उसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मान रहा है।
उत्तर कोरिया के विदेश मंत्रालय ने भी आईएईए के प्रस्ताव की आलोचना की है। मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि परमाणु हथियार संपन्न देश के रूप में उत्तर कोरिया की स्थिति के लिए अमेरिका,पश्चिमी देशों या आईएईए की मान्यता आवश्यक नहीं है। मंत्रालय का दावा है कि देश की परमाणु स्थिति उसके वास्तविक परमाणु प्रतिरोध और घरेलू कानून में दर्ज प्रावधानों से निर्धारित होती है।
उत्तर कोरियाई विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि देश बाहरी चुनौतियों और संभावित खतरों का मुकाबला करने के लिए अपनी सैन्य क्षमता को मजबूत बनाए रखेगा। मंत्रालय के अनुसार,राष्ट्रीय संप्रभुता और हितों की रक्षा के लिए सैन्य साधनों का इस्तेमाल किया जाता रहेगा। प्योंगयांग का तर्क है कि उसकी सुरक्षा नीति किसी बाहरी संस्था की स्वीकृति से नहीं,बल्कि देश की अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं से तय होती है।
किम यो-जोंग की ताजा टिप्पणी ऐसे समय आई है,जब उत्तर कोरिया लगातार अपने परमाणु हथियारों की स्थिति को लेकर कठोर रुख अपनाता रहा है। इससे केवल दो दिन पहले भी उन्होंने उत्तर कोरिया की परमाणु हथियार संपन्न देश की स्थिति को पूर्ण और अपरिवर्तनीय बताया था। इस बयान के जरिए प्योंगयांग ने संकेत दिया था कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम को अस्थायी नीति के रूप में नहीं,बल्कि देश की सुरक्षा व्यवस्था के स्थायी हिस्से के तौर पर देखता है।
आईएईए और उत्तर कोरिया के बीच यह मतभेद लंबे समय से चला आ रहा है। अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी परमाणु गतिविधियों की निगरानी और परमाणु अप्रसार व्यवस्था के पालन पर जोर देती है। दूसरी ओर,उत्तर कोरिया अपनी परमाणु क्षमता को आत्मरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ता है। दोनों पक्षों के बीच इसी बुनियादी दृष्टिकोण के अंतर के कारण कोरियाई प्रायद्वीप के परमाणु मुद्दे पर लंबे समय से तनाव बना हुआ है।
आईएईए के प्रस्ताव में परमाणु अप्रसार संधि के तहत उत्तर कोरिया की स्थिति को लेकर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के रुख को दोहराया गया है। एजेंसी की ओर से उत्तर कोरिया की परमाणु गतिविधियों को रोकने की माँग भी की गई है। इसके विपरीत प्योंगयांग का कहना है कि उसकी परमाणु क्षमता को उसके खिलाफ मौजूद बाहरी सुरक्षा चुनौतियों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
किम यो-जोंग ने अपने बयान में जिस तरह अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की सैन्य गतिविधियों का उल्लेख किया,उससे यह स्पष्ट है कि उत्तर कोरिया अपनी परमाणु नीति को व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण से जोड़कर देखता है। प्योंगयांग का कहना है कि यदि उसके आसपास के देशों के पास उन्नत सैन्य और परमाणु क्षमताएँ मौजूद हैं,तो वह अपनी सुरक्षा के लिए अपनी परमाणु क्षमता को कमजोर नहीं करेगा।
आईएईए के प्रस्ताव और उत्तर कोरिया की प्रतिक्रिया ने एक बार फिर कोरियाई प्रायद्वीप के परमाणु मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है। एक ओर अंतर्राष्ट्रीय परमाणु व्यवस्था उत्तर कोरिया की परमाणु गतिविधियों को रोकने और परमाणु अप्रसार संधि के प्रावधानों पर जोर दे रही है,वहीं दूसरी ओर प्योंगयांग अपनी परमाणु क्षमता को संप्रभुता, आत्मरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय बता रहा है।
फिलहाल दोनों पक्षों के रुख में स्पष्ट अंतर दिखाई दे रहा है। आईएईए उत्तर कोरिया से परमाणु गतिविधियों को रोकने की माँग कर रहा है,जबकि प्योंगयांग ने अपनी परमाणु क्षमता को बनाए रखने और उसकी विश्वसनीयता सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता दोहराई है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और उत्तर कोरिया के बीच संवाद तथा तनाव की स्थिति किस दिशा में जाती है,यह कोरियाई प्रायद्वीप की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण होगा।
