ममता बनर्जी (तस्वीर क्रेडिट@VidyanandAITC)

टीएमसी के नाम और चुनाव चिह्न पर रोक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुँचीं ममता बनर्जी

नई दिल्ली,19 सितंबर (युआईटीवी)- तृणमूल कांग्रेस के नाम और उसके पारंपरिक ‘जोड़ा फूल और घास’ चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर चुनाव आयोग की ओर से लगाई गई रोक के खिलाफ पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। ममता बनर्जी ने शुक्रवार को शीर्ष अदालत में याचिका दायर कर चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश को चुनौती दी और इसे रद्द करने की माँग की। यह मामला ऐसे समय में सामने आया है,जब पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर को उपचुनाव होने हैं।

ममता बनर्जी की याचिका में ऋतब्रत बनर्जी और चुनाव आयोग को पक्षकार बनाया गया है। चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहे दो प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच विवाद को देखते हुए अंतरिम व्यवस्था लागू की थी। इसके तहत दोनों गुटों को ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और पार्टी के पारंपरिक ‘जोड़ा फूल और घास’ चुनाव चिह्न के इस्तेमाल से रोक दिया गया। आयोग की यह व्यवस्था तब तक प्रभावी रहेगी,जब तक पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद पर अंतिम निर्णय नहीं हो जाता।

चुनाव आयोग ने शुक्रवार को दोनों गुटों के लिए अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित कर दिए। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम दिया गया है और उसे ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया है। वहीं दूसरे गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न दिया गया है। इस फैसले के बाद आगामी उपचुनावों में दोनों गुट मूल तृणमूल कांग्रेस के नाम और पारंपरिक चुनाव चिह्न का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे।

ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग की इस कार्रवाई का पहले ही विरोध किया था। उन्होंने आयोग के आदेश को असंवैधानिक, गैरकानूनी और अलोकतांत्रिक बताया था। उनका कहना था कि नए नाम और चुनाव चिह्न का आवंटन आयोग के आदेश को स्वीकार करने के समान नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि वह इस फैसले के खिलाफ कानूनी रास्ता अपनाएँगी। अब सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर होने के बाद इस विवाद का कानूनी पक्ष भी महत्वपूर्ण हो गया है।

पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर विवाद का सीधा असर चुनावी प्रक्रिया पर पड़ रहा है। नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा क्षेत्रों में होने वाले उपचुनावों से पहले दोनों गुटों के सामने अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न के साथ मैदान में उतरने की स्थिति बन गई है। ऐसे में चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश को लेकर ममता बनर्जी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका का परिणाम दोनों गुटों की चुनावी पहचान के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

इस राजनीतिक विवाद पर कांग्रेस की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट का समर्थन किया है। उन्होंने चुनाव आयोग और भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि राजनीतिक दलों से जुड़े विवादों में इसी तरह की कार्रवाई पहले शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मामलों में भी देखने को मिली थी। राहुल गांधी ने इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों से जुड़ा मुद्दा बताया और चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाए।

कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने भी चुनाव आयोग के अंतरिम फैसले की आलोचना की है। उन्होंने आयोग पर भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में काम करने का आरोप लगाया। इस तरह तृणमूल कांग्रेस से जुड़ा विवाद अब केवल पार्टी के आंतरिक मतभेद तक सीमित नहीं रह गया है,बल्कि विपक्षी दलों के बीच चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर व्यापक राजनीतिक बहस का विषय बन गया है।

फिलहाल चुनाव आयोग की ओर से लागू अंतरिम व्यवस्था के तहत मूल पार्टी नाम और पारंपरिक चुनाव चिह्न दोनों गुटों के इस्तेमाल से बाहर हैं। दूसरी ओर,ममता बनर्जी ने इस फैसले को अदालत में चुनौती देकर स्पष्ट कर दिया है कि वह पार्टी की पुरानी पहचान और चुनाव चिह्न को लेकर कानूनी लड़ाई जारी रखेंगी। सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका पर आगे होने वाली सुनवाई से यह तय होने की दिशा में महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आ सकता है कि उपचुनावों से पहले पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर आयोग की अंतरिम व्यवस्था में कोई बदलाव होता है या नहीं।

आगामी नंदीग्राम और रेजीनगर उपचुनाव इस विवाद के लिहाज से खास महत्व रखते हैं। चुनाव आयोग के वर्तमान आदेश के कारण दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और प्रतीक के साथ चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लेना होगा। ऐसे में अदालत की कार्यवाही और आयोग के अंतिम निर्णय पर राजनीतिक दलों के साथ-साथ चुनावी प्रक्रिया से जुड़े लोगों की भी नजर रहेगी। फिलहाल ममता बनर्जी की याचिका ने तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न से जुड़े विवाद को सीधे सुप्रीम कोर्ट के सामने ला दिया है।