सोशल मीडिया पर अदालती दस्तावेज साझा करने पर विजय माल्या को बॉम्बे हाईकोर्ट की चेतावनी (तस्वीर क्रेडिट@airnewsalerts)

सोशल मीडिया पर अदालती दस्तावेज साझा करने पर विजय माल्या को बॉम्बे हाईकोर्ट की चेतावनी

मुंबई,23 सितंबर (युआईटीवी)- बॉम्बे हाईकोर्ट ने ब्रिटेन में रह रहे कारोबारी विजय माल्या को लंबित कानूनी मामले से जुड़े दस्तावेज सोशल मीडिया पर साझा करने को लेकर सावधान किया है। अदालत की यह टिप्पणी उस समय सामने आई, जब प्रवर्तन निदेशालय ने आपत्ति जताई कि माल्या ने जाँच एजेंसी की ओर से दाखिल हलफनामे को अदालत द्वारा उस पर विचार किए जाने से पहले ही सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर सार्वजनिक कर दिया। न्यायमूर्ति मिलिंद जाधव की एकल पीठ ने कहा कि लंबित न्यायिक मामले को सोशल मीडिया के जरिए आगे बढ़ाना अदालत की प्रक्रिया की प्रभावशीलता को प्रभावित कर सकता है।

मामले की सुनवाई के दौरान प्रवर्तन निदेशालय की ओर से बताया गया कि जाँच एजेंसी ने अपना हलफनामा माल्या की कानूनी टीम को उपलब्ध कराया था। इसके बाद माल्या ने कथित तौर पर उस दस्तावेज को सोशल मीडिया पर साझा कर दिया। एजेंसी ने अदालत के समक्ष इस बात पर आपत्ति दर्ज कराई कि संबंधित दस्तावेज पर अदालत को विचार करने का अवसर मिलने से पहले ही उसे सार्वजनिक कर दिया गया। इसके बाद अदालत ने माल्या की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अमित देसाई से कहा कि वह अपने मुवक्किल को भविष्य में इस तरह की कार्रवाई से बचने की सलाह दें।

अदालत ने यह भी संकेत दिया कि किसी लंबित मामले से संबंधित दलील और दस्तावेज अदालत के समक्ष कानूनी प्रक्रिया के तहत रखे जाने चाहिए। न्यायमूर्ति मिलिंद जाधव ने सुनवाई के दौरान माल्या की कानूनी टीम से कहा कि वह अपने मुवक्किल को समझाए कि यह उचित तरीका नहीं है। अदालत के अनुसार,इस तरह की गतिविधि न्यायिक प्रक्रिया की प्रभावशीलता को प्रभावित कर सकती है। माल्या के वकील अमित देसाई ने अदालत को आश्वस्त किया कि वह अदालत की इस बात को अपने मुवक्किल तक पहुँचायेंगे।

यह घटनाक्रम माल्या की उन कानूनी याचिकाओं से जुड़ा है,जिनमें वह भारत में चल रही आपराधिक कार्यवाही और अपने खिलाफ की गई कार्रवाई को चुनौती दे रहे हैं। उनके मामले में बैंक ऋण, संपत्तियों की वसूली, धनशोधन और भगोड़ा आर्थिक अपराधी से जुड़े कानूनी पहलू लंबे समय से अदालतों में विचाराधीन हैं। माल्या का तर्क रहा है कि बैंकों के समूह ने उनकी संपत्तियों से पर्याप्त रकम की वसूली कर ली है और इसलिए उनके खिलाफ चल रही कुछ कार्यवाहियों पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। दूसरी ओर,प्रवर्तन निदेशालय का कहना है कि संपत्तियों की वसूली और कथित धनशोधन से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही अलग-अलग कानूनी विषय हैं और केवल बकाया राशि की वसूली हो जाने से आपराधिक मामला अपने आप समाप्त नहीं हो जाता।

प्रवर्तन निदेशालय ने अपने हलफनामे में बताया है कि करीब 14,131.60 करोड़ रुपये मूल्य की चल और अचल संपत्तियाँ,अगस्त 2021 के मूल्यांकन के आधार पर, ऋणदाताओं के समूह को उपलब्ध कराई गई थीं। यह समूह भारतीय स्टेट बैंक के नेतृत्व में है। एजेंसी का कहना है कि संपत्तियों की इस तरह की वसूली या हस्तांतरण को धनशोधन से जुड़े आपराधिक आरोपों के स्वतः समाप्त होने के रूप में नहीं देखा जा सकता। इस बिंदु पर माल्या की ओर से अलग दलील रखी गई है और इसी मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच कानूनी विवाद जारी है।

माल्या के मामले का संबंध बंद हो चुकी किंगफिशर एयरलाइंस को दिए गए बैंक ऋणों से जुड़े विवाद से है। उन पर ऋण की रकम के कथित दुरुपयोग और धनशोधन सहित कई आरोप हैं, जिन्हें उन्होंने चुनौती दी है। वह मार्च 2016 में भारत से बाहर चले गए थे और नवंबर 2016 में उन्हें घोषित अपराधी घोषित किया गया था। बाद में उनके खिलाफ भगोड़ा आर्थिक अपराधी कानून के तहत भी कार्रवाई हुई। भारत में उनकी संपत्तियों को प्रवर्तन निदेशालय ने जब्त किया था और बाद में ऋणदाताओं को बकाया राशि की वसूली के लिए इन संपत्तियों के इस्तेमाल की अनुमति से संबंधित कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ी।

बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष माल्या की ओर से ब्रिटेन में उनकी स्थिति को लेकर भी दलील रखी गई। उनके वरिष्ठ अधिवक्ता अमित देसाई ने सर्वोच्च न्यायालय के कुछ फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में याचिकाकर्ता की अनुपस्थिति के बावजूद रिट याचिका पर सुनवाई की जा सकती है। उन्होंने अदालत को बताया कि माल्या के खिलाफ ब्रिटेन में प्रत्यर्पण से जुड़ी कार्यवाही जारी है और वह वहाँ की अदालतों के आदेशों के कारण ब्रिटेन छोड़ने की स्थिति में नहीं हैं। माल्या ने इससे पहले भी अदालत के समक्ष कहा था कि वह इस समय यह निश्चित रूप से नहीं बता सकते कि भारत कब लौट पाएंगे।

हालाँकि,अदालत ने माल्या की भारत में व्यक्तिगत रूप से पेश होने की स्थिति को लेकर सवाल उठाया। पीठ ने इस बात पर गौर किया कि माल्या ब्रिटेन की अदालतों के आदेशों का हवाला दे रहे हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि उन आदेशों को चुनौती दी गई है या नहीं। अदालत ने संकेत दिया कि केवल ऐसे आदेशों का हवाला देकर भारत में अदालत के समक्ष पेश नहीं होने की स्थिति को स्वतः उचित नहीं ठहराया जा सकता। इस पहलू पर आगे की सुनवाई में भी चर्चा होने की संभावना है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को माल्या के हलफनामे पर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही अमित देसाई को सुनवाई के दौरान माल्या की ओर से दिए गए सभी बयानों को रिकॉर्ड पर रखते हुए एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने को कहा गया है। इससे केंद्र सरकार को उन दलीलों पर औपचारिक जवाब देने का अवसर मिलेगा। अदालत ने भारतीय स्टेट बैंक के नेतृत्व वाले ऋणदाता समूह को भी प्रवर्तन निदेशालय के हलफनामे में सामने आए खुलासों को ध्यान में रखते हुए नया जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।

मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को निर्धारित की गई है। उस दौरान अदालत के समक्ष बैंक समूह का नया हलफनामा,केंद्र सरकार का जवाब और माल्या की ओर से दाखिल किए जाने वाले विस्तृत दस्तावेज महत्वपूर्ण होंगे। फिलहाल अदालत की टिप्पणी का मुख्य केंद्र लंबित न्यायिक प्रक्रिया के दौरान संबंधित दस्तावेजों और दलीलों को सोशल मीडिया पर सार्वजनिक करने का तरीका है। वहीं,माल्या से जुड़े धनशोधन, संपत्ति वसूली और भारत में लंबित कानूनी कार्यवाहियों के व्यापक मुद्दे पर भी अदालत में सुनवाई जारी रहेगी।