नई दिल्ली,5 अक्टूबर (युआईटीवी)- सुप्रीम कोर्ट सोमवार को उन याचिकाओं पर सुनवाई करेगा, जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अकेले चुनाव आयोग की शक्तियों का इस्तेमाल करने के अधिकार को चुनौती दी गई है। याचिकाओं में यह सवाल उठाया गया है कि क्या संविधान और कानून के तहत पूरे बहुसदस्यीय चुनाव आयोग के लिए निर्धारित शक्तियों का प्रयोग मुख्य चुनाव आयुक्त अपने स्तर पर कर सकते हैं या इसके लिए आयोग के सामूहिक निर्णय की आवश्यकता है।
सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक कॉज लिस्ट के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ इस मामले की सुनवाई करेगी। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं। यह मामला 29 सितंबर को वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने मुख्य न्यायाधीश के समक्ष उठाया था। उस समय मुख्य न्यायाधीश ने मामले को अगले सप्ताह सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया था। इसके बाद सोमवार की सुनवाई के लिए इसे सूची में शामिल किया गया है।
याचिका में चुनाव आयोग के कामकाज में सामूहिक निर्णय लेने की व्यवस्था को लागू करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने यह भी सवाल उठाया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने जिन शक्तियों का इस्तेमाल कथित तौर पर पूरे चुनाव आयोग के नाम पर किया, उनके इस्तेमाल का वैधानिक और संवैधानिक आधार क्या है। इसके लिए याचिका में अधिकार को लेकर क्वो वारंटो जैसे रिट की माँग भी की गई है।
याचिका का मुख्य आधार संविधान का अनुच्छेद 324 है। इसमें कहा गया है कि चुनावों की निगरानी, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति चुनाव आयोग को दी गई है, न कि किसी एक मुख्य चुनाव आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से। याचिकाकर्ता के अनुसार, चुनाव आयोग एक बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था है और इसलिए उसकी शक्तियों का इस्तेमाल भी निर्धारित संवैधानिक और वैधानिक ढाँचे के अनुरूप सामूहिक रूप से होना चाहिए।
याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से संबंधित 2023 के कानून की धारा 18 का भी उल्लेख किया गया है। इस प्रावधान के तहत आयोग के कामकाज में सामूहिक निर्णय लेने की व्यवस्था का हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि जिन मामलों में चुनाव आयोग के सदस्यों के बीच मतभेद हो,वहाँ बहुमत के आधार पर फैसला किया जाना चाहिए। ऐसे में किसी एक पदाधिकारी द्वारा आयोग के नाम पर एकतरफा निर्णय लेने का सवाल न्यायिक जाँच के दायरे में आता है।
याचिका में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से कथित तौर पर दर्ज की गई आपत्तियों को भी आधार बनाया गया है। याचिकाकर्ता के अनुसार,अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच दोनों चुनाव आयुक्तों ने कम से कम 14 मामलों में आपत्तियाँ दर्ज की थीं। इन आपत्तियों में उन फैसलों और कदमों का जिक्र किया गया है, जिन्हें कथित तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त के नाम पर लिया गया,जबकि संबंधित चुनाव आयुक्तों से उनकी मंजूरी नहीं ली गई थी।
याचिका में इन कथित आपत्तियों से जुड़े संदेशों और फाइल नोटिंग का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता का दावा है कि इन दस्तावेजों से आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर मतभेद सामने आते हैं। हालाँकि,इन दावों की अंतिम वैधता और उनसे जुड़े तथ्यों का निर्धारण अदालत की सुनवाई के दौरान होगा।
याचिका में जिन मुद्दों का उल्लेख किया गया है, उनमें चुनाव आयोग की ओर से कथित तौर पर बिना सामूहिक मंजूरी जारी किए गए संचार और आदेश भी शामिल हैं। इसके अलावा बैठकों से पहले या बाद में एजेंडा से जुड़े सवाल,बिना आवश्यक मंजूरी के विदेश यात्राओं का आरोप, फॉर्म-6 में किए गए बदलाव और मतदाता सूची के डेटाबेस तक पहुँच जैसे विषय भी उठाए गए हैं।
पश्चिम बंगाल में एक अधिकरण के समक्ष अपील दायर करने से जुड़ा मामला भी याचिका में शामिल है। याचिकाकर्ता का कहना है कि आयोग के स्तर पर लिए जाने वाले ऐसे महत्वपूर्ण फैसलों में निर्धारित प्रक्रिया और सामूहिक निर्णय व्यवस्था का पालन किया जाना जरूरी है। इसी संदर्भ में चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली और निर्णय लेने के अधिकारों को लेकर संवैधानिक सवाल उठाया गया है।
याचिका में मतदाता सूची के डेटाबेस के कथित रूप से धीरे-धीरे केंद्रीकरण को लेकर भी चिंता जताई गई है। इसके साथ ही चुनाव आयोग के सूचना प्रौद्योगिकी प्रतिष्ठान में काम के बँटवारे में कथित बदलाव का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता के अनुसार, चुनावी प्रक्रिया से संबंधित डिजिटल बुनियादी ढाँचे और मतदाता डेटा जैसे संवेदनशील विषयों में निर्णय लेते समय आयोग के सभी सदस्यों की भूमिका और निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन महत्वपूर्ण है।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से यह घोषणा करने की माँग की है कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को प्राप्त शक्तियों का इस्तेमाल किसी एक पदाधिकारी द्वारा व्यक्तिगत रूप से नहीं किया जा सकता और न ही ऐसे किसी निर्णय को पूरे चुनाव आयोग की कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है,जब तक कि वह संवैधानिक और वैधानिक ढाँचे के अनुरूप न हो।
याचिका में विवादित फैसलों से संबंधित जरूरी रिकॉर्ड को अदालत के समक्ष पेश करने और उन्हें सुरक्षित रखने के निर्देश की माँग भी की गई है। इसके अलावा चुनाव आयोग में सामूहिक निर्णय लेने की व्यवस्था का पालन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक निर्देश जारी करने का अनुरोध किया गया है।
इस मामले की सुनवाई ऐसे समय में हो रही है,जब चुनाव आयोग के संस्थागत कामकाज, उसके सदस्यों की भूमिका और निर्णय लेने की प्रक्रिया से जुड़े सवाल न्यायिक जाँच के सामने हैं। याचिका में उठाए गए मुद्दे केवल किसी एक निर्णय तक सीमित नहीं हैं,बल्कि चुनाव आयोग की संवैधानिक संरचना और उसके भीतर शक्तियों के इस्तेमाल की प्रक्रिया से जुड़े हैं।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में अब यह महत्वपूर्ण होगा कि याचिकाकर्ता की ओर से अनुच्छेद 324 और संबंधित कानून की धारा 18 की जिस व्याख्या पर जोर दिया गया है,उस पर अदालत का क्या रुख रहता है। साथ ही अदालत यह भी देख सकती है कि चुनाव आयोग के बहुसदस्यीय स्वरूप में निर्णय लेने की संवैधानिक और वैधानिक व्यवस्था किस तरह लागू होती है।
मामले में उठाए गए आरोपों और आपत्तियों पर अंतिम स्थिति अदालत के समक्ष होने वाली सुनवाई और उपलब्ध रिकॉर्ड की जाँच के बाद ही स्पष्ट होगी। सोमवार की सुनवाई से यह तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत मिल सकते हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त की व्यक्तिगत शक्तियों और पूरे चुनाव आयोग की सामूहिक शक्तियों के बीच संवैधानिक सीमा किस प्रकार निर्धारित की जानी चाहिए।
