जयपुर,30 अक्टूबर (युआईटीवी)- राजस्थान प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी पंकज कुमार ओझा एक बार फिर विभागीय कार्रवाई को लेकर चर्चा में हैं। कार्मिक विभाग ने सोशल मीडिया पर कथित तौर पर जातिगत,सांप्रदायिक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील टिप्पणियाँ साझा करने के मामले में उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर दी है। विभाग ने राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम,1958 के नियम 16 यानी 16 सीसीए के तहत उन्हें आरोप पत्र जारी किया है। इसके साथ ही 15 दिनों के भीतर लिखित जवाब देने का निर्देश दिया गया है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि निर्धारित अवधि में जवाब नहीं मिलने की स्थिति में उपलब्ध तथ्यों के आधार पर एकतरफा कार्रवाई की जा सकती है।
पंकज कुमार ओझा फिलहाल सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग में अतिरिक्त निदेशक के पद पर कार्यरत हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने सोशल मीडिया मंच फेसबुक पर ऐसी सामग्री साझा की,जिससे जातिगत तनाव, सांप्रदायिक वैमनस्य और राजनीतिक विवाद पैदा हो सकते थे। हालाँकि,ओझा ने विभाग की ओर से लगाए गए सभी आरोपों को खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि उनके नाम से फर्जी स्क्रीनशॉट तैयार करके सोशल मीडिया पर प्रसारित किए गए हैं। उन्होंने दावा किया है कि न तो उनके आधिकारिक और न ही निजी सोशल मीडिया खाते से ऐसी कोई आपत्तिजनक पोस्ट की गई थी।
कार्मिक विभाग की ओर से जारी आरोप पत्र में अक्टूबर 2025 के दौरान फेसबुक पर साझा की गई 14 कथित पोस्ट का उल्लेख किया गया है। विभाग का आरोप है कि इन पोस्ट में जातिगत द्वेष को बढ़ावा देने वाली टिप्पणियाँ,सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील सामग्री और राजनीतिक विषयों पर अशोभनीय बयान शामिल थे। विभाग ने इसे सरकारी सेवा में कार्यरत अधिकारी के लिए निर्धारित आचरण के विपरीत माना है।
आरोप पत्र में राजस्थान सिविल सेवा (आचरण) नियम,1971 के नियम 3, 4 और 11 के उल्लंघन का भी उल्लेख किया गया है। सरकारी कर्मचारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने पद की गरिमा बनाए रखें और ऐसा कोई सार्वजनिक व्यवहार न करें,जिससे प्रशासनिक निष्पक्षता या सामाजिक सौहार्द प्रभावित हो। विभाग का मानना है कि यदि अधिकारी के नाम से सामने आई पोस्ट वास्तव में उनके द्वारा साझा की गई हैं,तो यह सेवा आचरण से जुड़ा गंभीर मामला हो सकता है।
इसी आधार पर कार्मिक विभाग ने अब औपचारिक अनुशासनात्मक प्रक्रिया शुरू की है। चार्जशीट जारी होने के बाद ओझा को अपने पक्ष में तथ्य और दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया है। उनका जवाब मिलने के बाद विभाग आरोपों की जाँच और आगे की कार्रवाई पर निर्णय ले सकता है।
इस मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू पहले मांगे गए स्पष्टीकरण को लेकर सामने आया है। विभाग का कहना है कि जनवरी 2026 में पंकज ओझा से कथित सोशल मीडिया पोस्ट के संबंध में जवाब माँगा गया था,लेकिन निर्धारित समय में उनका स्पष्टीकरण प्राप्त नहीं हुआ। इसी आधार पर विभाग ने आगे की अनुशासनात्मक प्रक्रिया शुरू की है।
दूसरी ओर, ओझा का दावा है कि उन्होंने विभाग की ओर से मांगे गए स्पष्टीकरण का जवाब समय पर भेज दिया था। उनके अनुसार, 27 जनवरी 2026 को उन्होंने राजकाज पोर्टल के माध्यम से अपना विस्तृत पक्ष प्रस्तुत किया था। उनका कहना है कि इस जवाब की आधिकारिक रसीद भी उनके पास मौजूद है। ऐसे में यह मामला केवल सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित नहीं रह गया है,बल्कि पहले दिए गए जवाब के विभागीय रिकॉर्ड में दर्ज होने को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
ओझा का कहना है कि उन्होंने अपनी ओर से सभी आवश्यक जानकारियाँ विभाग को उपलब्ध करा दी थीं। अब ताजा चार्जशीट मिलने के बाद उन्हें एक बार फिर निर्धारित समय के भीतर अपना पक्ष रखना होगा। विभागीय स्तर पर उनके जवाब और उपलब्ध दस्तावेजों की समीक्षा के बाद ही आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
पंकज कुमार ओझा ने आरोपों को पूरी तरह गलत बताते हुए कहा है कि उन्हें जानबूझकर विवाद में घसीटने की कोशिश की गई है। उनका दावा है कि कुछ लोगों ने तकनीकी छेड़छाड़ के जरिए उनके नाम से जाली स्क्रीनशॉट तैयार किए और उन्हें सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। उन्होंने कहा कि उनके किसी भी आधिकारिक या निजी खाते से आरोप पत्र में बताई गई आपत्तिजनक पोस्ट साझा नहीं की गई थीं।
ओझा के मुताबिक,उन्होंने इस मामले को लेकर विभागीय कार्रवाई शुरू होने से पहले ही संबंधित अधिकारियों को जानकारी दे दी थी। उन्होंने 29 दिसंबर 2025 को मुख्य सचिव और कार्मिक सचिव को लिखित शिकायत देकर कथित फर्जी स्क्रीनशॉट के बारे में बताया था। उनका कहना है कि उन्होंने जयपुर पुलिस आयुक्त से मुलाकात भी की थी और इस मामले में अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए अशोक नगर थाने में परिवाद सौंपा था।
उनका पक्ष है कि जब उनके नाम से फर्जी सामग्री प्रसारित की जा रही थी,तब उन्होंने इसकी शिकायत प्रशासन और पुलिस दोनों स्तरों पर की थी। ऐसे में अब विभागीय जाँच के दौरान यह भी महत्वपूर्ण होगा कि कथित पोस्ट की वास्तविकता और उनके सोशल मीडिया खातों से उनके संबंध की पुष्टि किस आधार पर की जाती है। फिलहाल विभाग की ओर से जारी आरोप पत्र में लगाए गए आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है।
पंकज कुमार ओझा का नाम इससे पहले भी अलग-अलग प्रशासनिक घटनाक्रमों और विवादों के दौरान चर्चा में रहा है। वर्ष 2011 में जयपुर नगर निगम से जुड़े एक मामले में उनका नाम सामने आया था। उस समय तत्कालीन महापौर ज्योति खंडेलवाल की ओर से अवैध निर्माणों को संरक्षण दिए जाने की शिकायत की गई थी। इसके बाद नगरीय विकास विभाग ने ओझा सहित पाँच आरएएस अधिकारियों का तबादला किया था। हालाँकि, तबादला प्रशासनिक कार्रवाई थी और इसे अपने आप में किसी कानूनी दोषसिद्धि के रूप में नहीं देखा जा सकता।
वर्ष 2017 में कोटा के राजस्व अपील प्रकरण के दौरान भी उनका नाम चर्चा में आया था। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की ओर से दर्ज मामले में बिचौलियों द्वारा राजस्व संबंधी फैसले के बदले 15 लाख रुपये माँगने के आरोपों की जाँच की जा रही थी। उस समय ओझा राजस्व अपील अधिकारी के पद पर थे। उपलब्ध विवरण के अनुसार,मामले में प्रत्यक्ष आरोप बिचौलियों पर केंद्रित थे। इस प्रकरण में उनके नाम की चर्चा होने को अंतिम कानूनी दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं माना जा सकता।
वर्ष 2025 में खाद्य सुरक्षा विभाग में अतिरिक्त निदेशक के पद पर रहते हुए ओझा से जुड़ा एक कथित ऑडियो सामने आया था। आरोप लगाया गया था कि इस ऑडियो के माध्यम से मिलावटखोरों को कार्रवाई से पहले सतर्क किया जा रहा था। इस मामले में आईपीएस अधिकारी पंकज चौधरी की शिकायत के बाद मुख्य सचिव स्तर पर संबंधित रिकॉर्ड तलब किए गए थे। इसके बाद 15 सितंबर 2025 को ओझा का तबादला गौपालन विभाग में कर दिया गया था।
इसी वर्ष देवस्थान विभाग से जुड़े एक अन्य प्रकरण में भी उनका नाम चर्चा में आया था। शासन सचिव के नाम से कथित तौर पर एक भ्रामक धार्मिक संदेश प्रसारित होने के मामले में विभागीय जाँच समिति गठित की गई थी। जाँच के दौरान उनसे जुड़े व्हाट्सऐप समूहों को लेकर सवाल उठे थे। हालाँकि,ओझा ने इस मामले में किसी भी प्रकार की जानकारी होने से इनकार किया था।
इन पुराने घटनाक्रमों के बीच अब सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर जारी नई चार्जशीट ने उनके प्रशासनिक करियर से जुड़े सवालों को फिर चर्चा में ला दिया है। हालाँकि,अलग-अलग मामलों में सामने आए आरोपों,तबादलों और विभागीय कदमों को अंतिम दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता। हर प्रकरण का निष्कर्ष संबंधित जाँच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही तय होगा।
कार्मिक विभाग की ओर से जारी ताजा चार्जशीट के बाद अब सबसे महत्वपूर्ण चरण पंकज कुमार ओझा का लिखित जवाब होगा। उन्हें 15 दिनों के भीतर अपने बचाव में स्पष्टीकरण और संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने हैं। अधिकारी पहले ही फर्जी स्क्रीनशॉट और साजिश का आरोप लगा चुके हैं। ऐसे में उनके जवाब में इस दावे के समर्थन में क्या तथ्य रखे जाते हैं,इस पर ध्यान रहेगा।
विभागीय प्रक्रिया के तहत आरोपों की पुष्टि, सोशल मीडिया पोस्ट की प्रामाणिकता और अधिकारी की भूमिका की जांच की जाएगी। यदि जवाब संतोषजनक नहीं पाया जाता है,तो नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जा सकती है। वहीं,ओझा की ओर से प्रस्तुत दस्तावेजों और तकनीकी साक्ष्यों की जाँच भी मामले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होगी। फिलहाल राजस्थान के प्रशासनिक गलियारों में इस प्रकरण को लेकर चर्चा जारी है और आगे की स्थिति 15 दिनों के भीतर मिलने वाले जवाब तथा उसके बाद होने वाली विभागीय जाँच पर निर्भर करेगी।
