इजरायल में संसदीय चुनाव के लिए मतदान शुरू, नेतन्याहू और आइजनकोट के बीच मुकाबला (तस्वीर क्रेडिट@AliTallat1)

इजराइल में त्रिशंकु संसद के बाद सरकार गठन की कवायद तेज,नेतन्याहू के खिलाफ विपक्षी दलों ने मिलाया हाथ

तेल अवीव,30 अक्टूबर (युआईटीवी)- इजराइल में आम चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद राजनीतिक तस्वीर साफ होने के बजाय और जटिल हो गई है। 120 सदस्यीय संसद में किसी भी राजनीतिक गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने से देश में नई सरकार के गठन को लेकर चर्चाएँ तेज हो गई हैं। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाला दक्षिणपंथी गठबंधन बहुमत के जरूरी आँकड़े से पीछे रह गया है। वहीं,विपक्षी दल भी अभी सरकार बनाने के लिए आवश्यक सीटों का आँकड़ा नहीं जुटा पाए हैं। ऐसे में छोटे दलों और स्वतंत्र राजनीतिक गुटों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। इसी बीच विपक्ष के प्रमुख नेता गादी आइजनकोट ने नेतन्याहू को सत्ता से बाहर रखने के उद्देश्य से अलग-अलग दलों के नेताओं के साथ बातचीत शुरू कर दी है।

गादी आइजनकोट ने डेमोक्रेट्स पार्टी के प्रमुख यायर गोलान,बियाचाद पार्टी के नेता नफ्ताली बेनेट और मुख्य विपक्षी नेता यायर लैपिड के साथ महत्वपूर्ण बैठकें की हैं। इन मुलाकातों का उद्देश्य विपक्षी दलों के बीच सहमति बनाकर ऐसा गठबंधन तैयार करना है, जो मौजूदा प्रधानमंत्री के बिना नई सरकार का गठन कर सके। विपक्षी नेताओं के बीच बातचीत से संकेत मिल रहे हैं कि चुनाव परिणाम आने के बाद अब राजनीतिक गतिविधियाँ तेज हो गई हैं और सत्ता परिवर्तन की संभावनाओं पर विचार किया जा रहा है।

आइजनकोट ने इस दौरान नेतन्याहू और उनकी लिकुड पार्टी पर चुनावी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि बहुमत हासिल नहीं होने के बाद प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी चुनाव परिणामों तथा मतदान प्रक्रिया को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। आइजनकोट ने स्पष्ट किया कि संसद की निर्धारित बैठक को बाधित नहीं होने दिया जाएगा। उनके मुताबिक,लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत संसद की कार्यवाही आगे बढ़नी चाहिए और चुनाव के बाद सरकार गठन से जुड़ी संवैधानिक प्रक्रिया का पालन होना चाहिए।

इजराइल की संसद को नेसेट कहा जाता है। इसमें कुल 120 सदस्य होते हैं और सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। मौजूदा चुनावी नतीजों में किसी भी एक गठबंधन को यह संख्या हासिल नहीं हुई है। प्रधानमंत्री नेतन्याहू के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी खेमे को 53 सीटें मिली हैं,जबकि गादी आइजनकोट के नेतृत्व में विपक्षी गठबंधन के खाते में 48 सीटें आई हैं। इसके अलावा अरब पार्टियों ने कुल 19 सीटों पर जीत दर्ज की है।

इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि दोनों प्रमुख राजनीतिक खेमों को सरकार बनाने के लिए दूसरे दलों के समर्थन की आवश्यकता होगी। नेतन्याहू का गठबंधन बहुमत से आठ सीट पीछे है,जबकि विपक्षी गठबंधन को जरूरी संख्या तक पहुँचने के लिए 13 अतिरिक्त सांसदों के समर्थन की जरूरत है। ऐसे में अरब पार्टियों और छोटे राजनीतिक दलों के सांसदों का रुख सरकार गठन की दिशा तय कर सकता है।

चुनाव के बाद पैदा हुई इस स्थिति ने इजराइल की राजनीति में गठबंधन संबंधी बातचीत को अहम बना दिया है। अलग-अलग दलों के बीच वैचारिक मतभेद और राजनीतिक प्राथमिकताएं भी सरकार गठन की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं। विपक्षी दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे आपसी सहमति बनाकर ऐसा साझा कार्यक्रम तैयार करें,जिस पर सभी सहयोगी दल समर्थन देने के लिए तैयार हों।

सरकार गठन की बातचीत के बीच एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है,जिसने राजनीतिक समीकरणों को और दिलचस्प बना दिया है। नेतन्याहू के पारंपरिक सहयोगी दल यूनाइटेड टोरा जूडिज्म यानी यूटीजे ने कथित तौर पर गादी आइजनकोट को प्रधानमंत्री बनाने के लिए समर्थन देने का गोपनीय प्रस्ताव रखा है। इस प्रस्ताव के सामने आने से नेतन्याहू के पुराने सहयोगियों और विपक्षी खेमे के बीच संभावित नए समीकरणों को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।

यूटीजे के पास सात सीटें हैं। पार्टी की ओर से कथित तौर पर यह प्रस्ताव दिया गया है कि वह आइजनकोट के नेतृत्व वाली सरकार को बाहर से समर्थन दे सकती है। हालाँकि, इसके बदले पार्टी ने एक महत्वपूर्ण शर्त रखी है। उसकी माँग है कि हरेदी यहूदी समुदाय के लोगों को अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट दी जाए। पार्टी सरकार में सीधे शामिल हुए बिना समर्थन देने की इच्छुक बताई जा रही है।

यूटीजे के एक वरिष्ठ नेता ने संकेत दिया है कि नेतन्याहू के साथ पार्टी का गठबंधन अब समाप्त हो चुका है। यदि यह रुख आगे भी कायम रहता है,तो इसका असर प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाले गठबंधन की स्थिति पर पड़ सकता है। सात सांसदों वाली पार्टी का समर्थन किसी भी नए राजनीतिक गठबंधन के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है,क्योंकि दोनों प्रमुख खेमे बहुमत के आँकड़े से पीछे हैं।

हालाँकि,यूटीजे की माँग और आइजनकोट की राजनीतिक विचारधारा के बीच बड़ा अंतर है। आइजनकोट लंबे समय से इजराइल के सभी नागरिकों के लिए समान अनिवार्य सैन्य सेवा की वकालत करते रहे हैं। ऐसे में हरेदी समुदाय को सैन्य सेवा से छूट देने की शर्त उनके लिए स्वीकार करना आसान नहीं होगा। इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच सहमति बनती है या नहीं,यह आगे की बातचीत में महत्वपूर्ण रहेगा। यूटीजे का प्रस्ताव सामने आने के बावजूद इसे अंतिम राजनीतिक समझौता नहीं माना जा सकता।

विपक्षी दलों के बीच एकजुटता बढ़ाने की कोशिशें भी जारी हैं। डेमोक्रेट्स पार्टी के प्रमुख यायर गोलान ने मुख्य विपक्षी नेता यायर लैपिड के साथ अलग से मुलाकात की है। इस बैठक के बाद गोलान ने कहा कि देश में सत्ता परिवर्तन का जो अवसर सामने आया है,उसे गंवाया नहीं जाना चाहिए। उन्होंने संकेत दिया कि विपक्षी दलों को आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर साझा लक्ष्य की दिशा में काम करना होगा।

गोलान और लैपिड ने इजराइल की सुरक्षा तथा लोकतांत्रिक भविष्य को ध्यान में रखते हुए मिलकर नई सरकार बनाने की प्रतिबद्धता जताई है। विपक्षी नेताओं के बीच यह सहमति ऐसे समय में सामने आई है,जब चुनाव परिणामों ने किसी भी दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं दिया है। विपक्ष के लिए अब केवल सीटों का गणित ही नहीं,बल्कि अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं वाले दलों को एक साथ लाना भी बड़ी चुनौती है।

गादी आइजनकोट की ओर से बेनेट,लैपिड और गोलान जैसे नेताओं के साथ बातचीत इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। विपक्षी खेमे की कोशिश है कि सरकार गठन से पहले समर्थन का ऐसा आधार तैयार किया जाए,जिससे संसद में बहुमत साबित किया जा सके। हालाँकि,अभी यह स्पष्ट नहीं है कि सभी दल किसी एक नेतृत्व और साझा राजनीतिक कार्यक्रम पर सहमत हो पाएँगे या नहीं।

इजराइल के चुनाव परिणामों पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जेवियर मिलेई ने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को उनकी लिकुड पार्टी के सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में उभरने पर बधाई दी है। मिलेई ने कहा कि चुनाव से पहले सामने आए कई सर्वेक्षणों में विपरीत संकेत मिलने के बावजूद नेतन्याहू ने अपना नेतृत्व साबित किया है। उनकी प्रतिक्रिया ऐसे समय में आई है,जब इजराइल में चुनाव के बाद सरकार गठन को लेकर राजनीतिक अनिश्चितता बनी हुई है।

दूसरी ओर,कतर ने इजराइल में चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। इजराइल की ओर से आरोप लगाए गए थे कि अरब मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए कतर की ओर से वित्तीय मदद दी गई। कतर के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माजिद अल अंसारी ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि इस तरह के दावे भ्रामक और बेतुके हैं।

कतर ने आरोपों को राजनीतिक विफलता की जिम्मेदारी दूसरे पक्ष पर डालने की कोशिश करार दिया है। उसका कहना है कि चुनावी नतीजों को लेकर उठे सवालों के बीच इस तरह के आरोप लगाना उचित नहीं है। कतर की प्रतिक्रिया से यह भी स्पष्ट हुआ है कि इजराइल के चुनाव परिणामों के बाद घरेलू राजनीतिक विवाद के साथ-साथ क्षेत्रीय कूटनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है।

फिलहाल इजराइल में सरकार गठन की प्रक्रिया कई राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर है। नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गठबंधन के पास 53 सीटें हैं, जबकि विपक्षी गठबंधन 48 सीटों पर है। अरब पार्टियों के 19 सांसदों और यूटीजे जैसे छोटे दलों का समर्थन इस पूरे घटनाक्रम में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। हालाँकि,सैन्य सेवा से छूट जैसे मुद्दों पर वैचारिक मतभेद समझौते की राह में बाधा बन सकते हैं। आने वाले दिनों में विपक्षी नेताओं की बैठकों और छोटे दलों के फैसलों से यह तय होगा कि इजराइल में नई सरकार किस नेतृत्व में बनेगी और क्या नेतन्याहू एक बार फिर सत्ता में बने रहने के लिए आवश्यक समर्थन जुटा पाएँगे।