मुंबई,2 नवंबर (युआईटीवी)- आईडीबीआई बैंक के प्रस्तावित निजीकरण के खिलाफ कर्मचारियों का विरोध तेज हो गया है। बैंक के 10 हजार से अधिक अधिकारी और कर्मचारी 2 और 3 नवंबर को देशव्यापी दो दिवसीय हड़ताल पर जाने की तैयारी कर रहे हैं। यह हड़ताल यूनाइटेड फोरम ऑफ आईडीबीआई ऑफिसर्स एंड एम्प्लॉइज के आह्वान पर बुलाई गई है। कर्मचारी संगठन ने केंद्र सरकार और बैंक प्रबंधन से निजीकरण की प्रक्रिया को तत्काल वापस लेने की मांग की है। यूनियन का कहना है कि जिस बैंक को कर्मचारियों, सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) के साझा प्रयासों से संकट से बाहर निकाला गया, उसका नियंत्रण अब किसी निजी कंपनी को सौंपने का फैसला उचित नहीं है।
कर्मचारी संगठन के मुताबिक, आईडीबीआई बैंक की वित्तीय स्थिति में सुधार किसी निजी निवेश या निजी प्रबंधन के कारण नहीं हुआ है। इसके पीछे सरकार, एलआईसी और बैंक के कर्मचारियों की वर्षों की मेहनत रही है। यूनियन का दावा है कि जब बैंक वित्तीय संकट से गुजर रहा था, उस समय कर्मचारियों ने मुश्किल परिस्थितियों में भी ग्राहकों का भरोसा बनाए रखा। उन्होंने बैंकिंग सेवाओं को लगातार जारी रखा और संस्थान को दोबारा मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वहीं, सरकार और एलआईसी ने बैंक के पुनर्गठन और वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए बड़ी मात्रा में पूँजी उपलब्ध कराई।
यूनियन ने अपने बयान में कहा कि बैंक के संकट के दौर में कर्मचारियों ने जिम्मेदारी से काम किया और परिचालन को प्रभावित नहीं होने दिया। संगठन का मानना है कि बैंक को मौजूदा स्थिति तक पहुँचाने में कर्मचारियों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। इसी आधार पर यूनियन निजीकरण के फैसले का विरोध कर रही है और सरकार से इस प्रक्रिया पर दोबारा विचार करने की माँग कर रही है।
दरअसल, आईडीबीआई बैंक को वर्ष 2016 से 2020 के बीच गंभीर वित्तीय चुनौतियों का सामना करना पड़ा था। भारतीय रिजर्व बैंक की एसेट क्वालिटी रिव्यू प्रक्रिया के बाद बैंक के बड़े पैमाने पर फंसे हुए कर्ज यानी गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) की पहचान हुई थी। इसके चलते बैंक को भारी नुकसान उठाना पड़ा और उसकी वित्तीय स्थिति कमजोर हो गई थी। बैंक को इस संकट से बाहर निकालने के लिए सरकार और एलआईसी ने वित्तीय सहायता दी। कर्मचारी संगठन के अनुसार, इस अवधि में बैंक को उबारने के लिए दोनों ने मिलकर 46,000 करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी सहायता उपलब्ध कराई थी।
यूनियन का कहना है कि इस आर्थिक सहयोग और कर्मचारियों के प्रयासों का परिणाम अब बैंक के वित्तीय आँकड़ों में साफ दिखाई देता है। संगठन के मुताबिक, पिछले छह वर्षों में आईडीबीआई बैंक ने 30,100 करोड़ रुपये से अधिक का संचयी शुद्ध लाभ दर्ज किया है। इसके अलावा बैंक के सकल एनपीए अनुपात में भी बड़ी गिरावट आई है। वर्ष 2018 में यह अनुपात 31.78 प्रतिशत के ऊंचे स्तर पर था,जो अब घटकर 2.30 प्रतिशत रह गया है। यूनियन इसे बैंक की वित्तीय स्थिति में आए बड़े बदलाव के रूप में देख रही है।
कर्मचारी संगठन ने बैंक के अन्य वित्तीय संकेतकों का भी हवाला दिया है। उसके अनुसार, बैंक का शुद्ध एनपीए अनुपात केवल 0.16 प्रतिशत रह गया है। वहीं, पूँजी पर्याप्तता अनुपात 26.38 प्रतिशत और प्रोविजन कवरेज अनुपात 99.31 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। यूनियन का दावा है कि ये आँकड़े बैंक की बेहतर वित्तीय स्थिति और जोखिमों से निपटने की क्षमता को दर्शाते हैं। संगठन का सवाल है कि जब बैंक संकट से उबरकर मुनाफा कमा रहा है और उसके वित्तीय संकेतक मजबूत हो रहे हैं, तब उसके निजीकरण की जरूरत क्यों है।
आईडीबीआई बैंक के निजीकरण की योजना के तहत सरकार बैंक में अपनी हिस्सेदारी बेचने और प्रबंधन का नियंत्रण नए निवेशक को सौंपने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इस प्रक्रिया में कनाडा के फेयरफैक्स ग्रुप का नाम प्रमुखता से सामने आया है। कर्मचारी संगठन इसी प्रस्ताव का विरोध कर रहा है। यूनियन को आशंका है कि निजीकरण के बाद बैंक की नीतियों, कर्मचारियों की सेवा शर्तों और बैंकिंग सेवाओं पर असर पड़ सकता है। हालाँकि, इन आशंकाओं को लेकर अंतिम स्थिति निजीकरण की शर्तों और भविष्य की व्यवस्था पर निर्भर करेगी।
कर्मचारी संगठन ने बैंक के प्रस्तावित मूल्यांकन पर भी सवाल उठाए हैं। यूनियन का मानना है कि बैंक को संकट से निकालने में सरकार और एलआईसी की ओर से किए गए बड़े वित्तीय योगदान तथा कर्मचारियों की मेहनत को ध्यान में रखे बिना बिक्री का मूल्य तय करना उचित नहीं होगा। संगठन ने पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग की है। उसका कहना है कि बैंक की संपत्तियों, वित्तीय स्थिति और भविष्य की कमाई की संभावनाओं का उचित आकलन होना चाहिए।
दो दिवसीय हड़ताल के जरिए कर्मचारी सरकार और बैंक प्रबंधन तक अपना विरोध पहुंचाना चाहते हैं। यूनियन की मांग है कि निजीकरण की प्रक्रिया को रोका जाए और बैंक के भविष्य को लेकर कर्मचारियों तथा उनके प्रतिनिधि संगठनों से बातचीत की जाए। 2 और 3 नवंबर को प्रस्तावित इस हड़ताल का असर बैंक की शाखाओं और सामान्य कामकाज पर पड़ सकता है। हालाँकि,बैंकिंग सेवाओं पर वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि कितने कर्मचारी हड़ताल में शामिल होते हैं और वैकल्पिक व्यवस्थाएँ किस तरह लागू की जाती हैं।
आईडीबीआई बैंक के निजीकरण को लेकर अब सरकार और कर्मचारी संगठनों के बीच टकराव बढ़ता दिखाई दे रहा है। एक तरफ सरकार बैंक में हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है, वहीं दूसरी ओर कर्मचारी संगठन बैंक के पुनरुद्धार में अपने योगदान और वित्तीय सुधारों का हवाला देकर इस फैसले पर सवाल उठा रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार कर्मचारियों की मांगों पर क्या रुख अपनाती है और निजीकरण की प्रक्रिया को लेकर आगे क्या फैसला लिया जाता है।
