नई दिल्ली,2 नवंबर (युआईटीवी)- ईरान को लेकर अमेरिका और इजराइल की रणनीति में अंतर उभरकर सामने आने लगा है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू चाहते हैं कि अमेरिका मिडटर्म चुनाव के तुरंत बाद ईरान के खिलाफ दोबारा सैन्य कार्रवाई शुरू करे। दूसरी ओर,अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप फिलहाल तेहरान के साथ बातचीत के जरिए किसी समझौते तक पहुँचने की कोशिश में हैं। दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर हुई बातचीत के बाद पश्चिम एशिया में तनाव को लेकर चर्चाएँ तेज हो गई हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ट्रंप ईरान के साथ कूटनीतिक समाधान तलाशने की कोशिश जारी रखेंगे या चुनाव के बाद क्षेत्र में एक बार फिर सैन्य टकराव की स्थिति बन सकती है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक,नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति से ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान दोबारा शुरू करने की अपील की है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इजरायली प्रधानमंत्री चाहते हैं कि मंगलवार को होने वाले अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के तुरंत बाद ईरान पर हमला किया जाए। इजरायल को आशंका है कि अमेरिका सैन्य कार्रवाई के बजाय बातचीत के जरिए ईरान के साथ समझौता करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। इसी वजह से नेतन्याहू चाहते हैं कि वाशिंगटन तेहरान के प्रति सख्त रुख बनाए रखे।
बताया जा रहा है कि ट्रंप और नेतन्याहू के बीच फोन पर बातचीत हुई थी। इस दौरान दोनों नेताओं ने ईरान के साथ अमेरिका की बातचीत में हुई प्रगति और सैन्य अभियान दोबारा शुरू करने की संभावनाओं पर चर्चा की। इस बातचीत को लेकर दोनों देशों के सूत्रों की प्रतिक्रियाएं भी अलग-अलग रहीं। इजरायल के एक सूत्र ने बातचीत को कठिन बताया, जबकि अमेरिकी सूत्र ने इसे सीधी बातचीत करार दिया। हालाँकि,ट्रंप ने रविवार को आयोवा में पत्रकारों से बातचीत के दौरान इस चर्चा को बहुत अच्छा बताया। उन्होंने पुष्टि की कि नेतन्याहू के साथ ईरान के मुद्दे पर बातचीत हुई थी,लेकिन इसके विस्तृत ब्योरे साझा नहीं किए।
रिपोर्ट के अनुसार,नेतन्याहू की प्राथमिकता ईरान के खिलाफ सैन्य दबाव बनाए रखने की है,जबकि ट्रंप फिलहाल बातचीत का रास्ता खुला रखना चाहते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति कूटनीतिक प्रयासों के साथ सैन्य तैयारियों को भी जारी रखे हुए हैं। इसका अर्थ है कि एक ओर अमेरिका ईरान के साथ किसी संभावित समझौते की गुंजाइश तलाश रहा है, वहीं दूसरी ओर वह जरूरत पड़ने पर सैन्य विकल्प को पूरी तरह खारिज नहीं कर रहा है। इस दोहरी रणनीति के कारण अमेरिका और इजरायल के बीच ईरान को लेकर प्राथमिकताओं का अंतर चर्चा का विषय बन गया है।
ट्रंप ने शनिवार को पत्रकारों से बातचीत में कहा था कि ईरान के साथ बातचीत अच्छी दिशा में आगे बढ़ रही है और उन्हें किसी तरह की जल्दबाजी नहीं है। उनके इस बयान से संकेत मिलता है कि अमेरिकी प्रशासन फिलहाल बातचीत के परिणाम का इंतजार करना चाहता है। हालाँकि,इसी दौरान उन्होंने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंता भी जाहिर की। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को ईरान के एक या दो परमाणु ठिकानों पर ध्यान देने की जरूरत है। इस सिलसिले में उन्होंने पिकैक्स माउंटेन में स्थित एक संदिग्ध भूमिगत परमाणु सुविधा का भी उल्लेख किया।
परमाणु ठिकानों को लेकर ट्रंप की टिप्पणी से स्पष्ट है कि बातचीत के बावजूद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका की चिंताएँ बनी हुई हैं। अमेरिका लंबे समय से ईरान की परमाणु गतिविधियों पर निगरानी और उन्हें सीमित करने की माँग करता रहा है। दूसरी ओर, ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर अपने अधिकारों और सुरक्षा से जुड़े सवाल उठाता रहा है। ऐसे में किसी समझौते तक पहुँचने के लिए दोनों पक्षों के बीच कई मुद्दों पर सहमति बनना जरूरी होगा।
इस बीच,अमेरिका की ओर से ईरान के साथ संपर्क बढ़ाने की कोशिशें भी जारी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक,अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने पिछले सप्ताह ईरान के राष्ट्रीय सुरक्षा प्रमुख मोहसेन रेजाई को एक पत्र भेजा था। इस पत्र में दोनों देशों के बीच बातचीत दोबारा शुरू करने की संभावनाओं पर चर्चा की गई थी। इसे कई महीनों के दौरान ईरान तक अमेरिका की ओर से की गई उच्चस्तरीय पहुँच के प्रयासों में अहम माना जा रहा है। हालाँकि,इस संपर्क से किसी ठोस समझौते की पुष्टि नहीं हुई है।
कूटनीतिक प्रयासों में कतर भी मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। बताया गया है कि कतर के मध्यस्थों ने अमेरिका और ईरान के बीच सीधी बातचीत फिर से शुरू कराने के उद्देश्य से लगातार तीसरे दिन ईरानी अधिकारियों से मुलाकात की। कतर पहले भी पश्चिम एशिया के कई संवेदनशील मुद्दों पर मध्यस्थता की कोशिश करता रहा है। मौजूदा स्थिति में उसकी भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है,क्योंकि अमेरिका और ईरान के बीच सीधे संवाद की संभावनाएँ अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। मध्यस्थों के जरिए बातचीत आगे बढ़ने से दोनों पक्षों को अपने रुख और शर्तें सामने रखने का अवसर मिल सकता है।
हालाँकि,ईरान की ओर से अभी किसी समझौते की पुष्टि नहीं की गई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने स्पष्ट कहा है कि अमेरिका के साथ अब तक कोई समझौता नहीं हुआ है। उन्होंने बताया कि बातचीत में आगे की प्रगति इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिका ईरान की ओर से उठाए गए सवालों का क्या जवाब देता है। अराघची के मुताबिक,उनका देश कूटनीतिक समाधान तक पहुँचने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि अमेरिका दूसरे विकल्पों को अपनाने के बजाय बातचीत का रास्ता चुनेगा।
ईरान के विदेश मंत्री का बयान ऐसे समय आया है,जब एक ओर अमेरिका बातचीत में प्रगति की बात कर रहा है और दूसरी ओर इजरायल सैन्य कार्रवाई की माँग कर रहा है। इससे यह साफ होता है कि किसी समझौते तक पहुँचने से पहले कई अहम सवालों का समाधान होना बाकी है। परमाणु कार्यक्रम,सुरक्षा संबंधी चिंताएँ और संभावित सैन्य कार्रवाई जैसे मुद्दे दोनों देशों के बीच बातचीत को जटिल बना रहे हैं।
पश्चिम एशिया में पहले से मौजूद तनाव के बीच अमेरिका और इजरायल के अलग-अलग रुख का असर क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति पर पड़ सकता है। यदि बातचीत आगे बढ़ती है और दोनों पक्ष किसी सहमति तक पहुँचते हैं,तो सैन्य टकराव की आशंका कम करने का रास्ता खुल सकता है। वहीं, कूटनीतिक प्रयास विफल होने की स्थिति में सैन्य विकल्प को लेकर चर्चाएँ फिर तेज हो सकती हैं। फिलहाल किसी नए हमले या समझौते को लेकर अंतिम फैसला सामने नहीं आया है।
आने वाले दिनों में अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के बाद ट्रंप प्रशासन का रुख इस पूरे घटनाक्रम के लिए महत्वपूर्ण होगा। नेतन्याहू की माँग,ईरान के साथ जारी संपर्क और कतर की मध्यस्थता के बीच अमेरिका को अपनी आगे की रणनीति तय करनी होगी। दूसरी ओर, ईरान ने भी स्पष्ट कर दिया है कि बातचीत तभी आगे बढ़ेगी,जब उसके सवालों का जवाब दिया जाएगा। ऐसे में फिलहाल पश्चिम एशिया की स्थिति कूटनीतिक प्रयासों और सैन्य विकल्पों के बीच बनी हुई है।
