नई दिल्ली,2 नवंबर (युआईटीवी)- रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध अब केवल मिसाइलों, ड्रोन और सैन्य ठिकानों पर हमलों तक सीमित नहीं रह गया है। दोनों देशों के इमरजेंसी अलर्ट सिस्टम भी साइबर हमलावरों के निशाने पर आ गए हैं। यूक्रेन में लोगों के मोबाइल फोन और सार्वजनिक लाउडस्पीकर के जरिए केमिकल तथा रेडिएशन खतरे की झूठी चेतावनियां प्रसारित की गईं,जबकि रूस के आपातकालीन स्थिति मंत्रालय के मोबाइल ऐप में सेंध लगाकर फर्जी सुरक्षा संदेश फैलाए गए। इन घटनाओं ने युद्ध के दौरान नागरिकों की सुरक्षा और सरकारी सूचना प्रणालियों की विश्वसनीयता को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है। अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या साइबर हमलों का इस्तेमाल लोगों में डर, भ्रम और अफरातफरी फैलाने के लिए भी किया जा रहा है?
यूक्रेन में सामने आए मामले के अनुसार,देश का एयर रेड अलर्ट सिस्टम साइबर हमले का शिकार हुआ। इसके बाद कई इलाकों में लोगों के मोबाइल फोन पर ऐसे संदेश पहुँचने लगे,जिनमें केमिकल और रेडिएशन से खतरे की चेतावनी दी गई थी। राजधानी कीव में सार्वजनिक लाउडस्पीकर के माध्यम से भी इसी तरह के संदेश प्रसारित किए गए। युद्ध के माहौल में इस तरह की चेतावनियाँ लोगों के बीच दहशत पैदा कर सकती हैं,क्योंकि मिसाइल और ड्रोन हमलों के खतरे के बीच नागरिक पहले से ही सुरक्षा को लेकर सतर्क रहते हैं।
यूक्रेन की वायुसेना ने इस घटना के पीछे बाहरी हस्तक्षेप की आशंका जताई। उसने नागरिकों को स्पष्ट किया कि देश में रेडिएशन का कोई खतरा नहीं है और उन्हें अफवाहों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। वायुसेना ने सोशल मीडिया मंच टेलीग्राम पर जारी संदेश में कहा कि एयर अलर्ट ऐप के साथ छेड़छाड़ की गई हो सकती है। लोगों से शांत रहने और केवल आधिकारिक माध्यमों से मिलने वाली सूचनाओं पर भरोसा करने की अपील भी की गई।
इस चेतावनी का उद्देश्य नागरिकों को गलत सूचना के प्रभाव से बचाना था। युद्ध के दौरान आपातकालीन अलर्ट सिस्टम का इस्तेमाल लोगों को हवाई हमलों,मिसाइलों और अन्य संभावित खतरों के बारे में समय रहते जानकारी देने के लिए किया जाता है। ऐसे सिस्टम पर गलत संदेश भेजे जाने से लोगों को यह समझने में परेशानी हो सकती है कि कौन-सी चेतावनी वास्तविक है और कौन-सी फर्जी। इससे सुरक्षा व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होने के साथ-साथ आपातकालीन परिस्थितियों में लोगों की प्रतिक्रिया भी प्रभावित हो सकती है।
हालाँकि,यूक्रेन के डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन मंत्रालय ने बाद में स्पष्ट किया कि देश का अलर्ट सिस्टम सामान्य रूप से काम कर रहा है। मंत्रालय ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर जानकारी देते हुए बताया कि खतरे से संबंधित सभी संदेश पहले क्षेत्रीय प्रशासन को भेजे जाते हैं। इसके बाद स्थानीय स्तर पर उन्हें सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर लगे अलर्ट सिस्टम तक पहुँचाया जाता है। मंत्रालय के इस बयान का मकसद यह स्पष्ट करना था कि आधिकारिक चेतावनी व्यवस्था काम कर रही है और लोगों को गलत संदेशों के आधार पर घबराने की जरूरत नहीं है।
दूसरी ओर, रूस में भी इसी तरह की साइबर सेंधमारी की घटना सामने आई। रूस के आपातकालीन स्थिति मंत्रालय ने बताया कि उसके मोबाइल ऐप पर बड़ा साइबर हमला हुआ है। मंत्रालय के अनुसार,हमलावरों ने ऐप की सुरक्षा व्यवस्था में मौजूद तकनीकी कमजोरी का फायदा उठाया और इसके माध्यम से लोगों तक खतरे से जुड़ी फर्जी जानकारी पहुँचाई। इस घटना ने रूस की सरकारी डिजिटल सेवाओं की सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं।
रूस की सरकारी समाचार एजेंसी तास की रिपोर्ट के मुताबिक,आपातकालीन स्थिति मंत्रालय ने ऐप में मौजूद तकनीकी खामियों को दूर करने और उसकी सेवाओं को सामान्य बनाने के लिए कदम उठाए हैं। मंत्रालय की ओर से बताया गया कि सिस्टम को सुरक्षित करने का काम किया जा रहा है,ताकि नागरिकों तक गलत सूचनाएँ पहुँचने की आशंका को कम किया जा सके। हालाँकि,उपलब्ध जानकारी में साइबर हमले के पीछे किस समूह या व्यक्ति का हाथ था,इसकी पुष्टि नहीं की गई है।
रूस और यूक्रेन दोनों देशों के इमरजेंसी सिस्टम को निशाना बनाए जाने से यह स्पष्ट हुआ है कि युद्ध के दौरान डिजिटल बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा भी एक बड़ी चुनौती बन गई है। किसी देश की आपातकालीन सूचना प्रणाली में सेंधमारी होने पर केवल सरकारी सेवाएँ प्रभावित नहीं होतीं,बल्कि आम नागरिकों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है। यदि लोग बार-बार फर्जी अलर्ट प्राप्त करते हैं,तो वास्तविक खतरे के समय वे चेतावनी को गंभीरता से लेने में हिचकिचा सकते हैं। दूसरी ओर,गलत संदेशों के कारण लोग अनावश्यक रूप से सुरक्षित स्थानों की ओर भाग सकते हैं,जिससे अफरातफरी की स्थिति पैदा हो सकती है।
ये घटनाएँ ऐसे समय सामने आई हैं,जब यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने रूस के साथ ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोकने के लिए सीजफायर की अपील की है। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से भी इस दिशा में पहल करने का आग्रह किया है। जेलेंस्की ने एक साक्षात्कार में कहा कि यदि अमेरिकी राष्ट्रपति को लगता है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण वैश्विक ऊर्जा कीमतों पर असर पड़ रहा है,तो वह दोनों देशों से ऊर्जा बुनियादी ढाँचे पर हमले रोकने की अपील कर सकते हैं।
ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोकने की माँग का संबंध युद्ध के व्यापक आर्थिक और मानवीय प्रभावों से भी है। ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने से आम लोगों को बिजली,हीटिंग और अन्य जरूरी सुविधाओं की कमी का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में यूक्रेन की ओर से इस तरह के हमले रोकने की अपील को नागरिकों और जरूरी बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है। हालाँकि,इस दिशा में किसी व्यापक और स्थायी समझौते की स्थिति स्पष्ट नहीं है।
इस बीच,अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पत्नी मेलानिया ट्रंप ने रूस और यूक्रेन के बीच पाँच दिन के मानवीय सीजफायर में सहयोग के लिए दोनों देशों की सराहना की है। यह अस्थायी संघर्षविराम यूक्रेन के खेरसॉन क्षेत्र के ओलेश्की में लागू किया गया था और एक नवंबर को समाप्त हो गया। मेलानिया ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर पोस्ट साझा करते हुए बताया कि इस अवधि में जरूरी मानवीय सहायता पहुँचाने और करीब 800 लोगों को सुरक्षित निकालने में मदद मिली।
मानवीय सीजफायर का उद्देश्य युद्ध प्रभावित इलाके में नागरिकों तक आवश्यक सहायता पहुँचाने और उन्हें सुरक्षित स्थानों पर ले जाने का अवसर उपलब्ध कराना था। मेलानिया ट्रंप ने इस पहल में सहयोग करने के लिए दोनों देशों की तारीफ की। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है,जब युद्ध के बीच मानवीय जरूरतों को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लगातार चिंता जताई जा रही है।
रूस और यूक्रेन में इमरजेंसी अलर्ट सिस्टम पर हुए साइबर हमलों ने युद्ध के एक नए पहलू को उजागर किया है। अब खतरा केवल सैन्य ठिकानों या हथियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि नागरिकों तक पहुँचने वाली सूचनाएँ भी निशाने पर हैं। फर्जी चेतावनियों के जरिए लोगों को भ्रमित करना किसी भी युद्धग्रस्त देश के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। ऐसे में दोनों देशों के लिए अपने डिजिटल सुरक्षा तंत्र को मजबूत करना और नागरिकों तक भरोसेमंद जानकारी पहुँचाना बेहद जरूरी हो गया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन साइबर हमलों की जाँच में क्या सामने आता है और दोनों देश अपने आपातकालीन सूचना तंत्र को सुरक्षित रखने के लिए क्या कदम उठाते हैं।
