आईएएस के बाद अब राजनीति में दिव्या मित्तल की एंट्री (तस्वीर क्रेडिट@Prajapat204)

आईएएस के बाद अब राजनीति में दिव्या मित्तल की एंट्री, बोलीं- मुझे उन लोगों की आवाज बनना है,जिनकी कहीं सुनवाई नहीं

लखनऊ,29 सितंबर (युआईटीवी)- उत्तर प्रदेश कैडर की पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने करीब 13 साल की प्रशासनिक सेवा के बाद अब सक्रिय राजनीति में कदम रखने का ऐलान कर दिया है। मंगलवार को जारी करीब 10 मिनट के वीडियो संदेश में उन्होंने अपने अगले कदम को लेकर चल रहे सवालों का जवाब दिया और स्पष्ट किया कि वह राजनीति में लोगों की आवाज बनने के उद्देश्य से उतर रही हैं। उन्होंने यह भी साफ किया कि उनकी राजनीतिक यात्रा उत्तर प्रदेश से शुरू होगी और फिलहाल उन्होंने किसी स्थापित राजनीतिक दल के साथ जुड़ने की घोषणा नहीं की है। इसके बजाय उन्होंने जनता के साथ सीधे जुड़कर अपनी अलग राजनीतिक राह बनाने का संकेत दिया है।

दिव्या मित्तल ने अपने वीडियो संदेश की शुरुआत अपने परिचय से की और कहा कि कुछ समय पहले उन्होंने आईएएस पद से त्यागपत्र दिया था,जिसके बाद लोगों के मन में उनके भविष्य को लेकर कई सवाल उठे। उन्होंने बताया कि उन्होंने तत्काल इन सवालों का जवाब इसलिए नहीं दिया,क्योंकि आगे का कदम तय करने और उसके लिए खुद को तैयार करने में उन्हें समय लगा। अब उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी दिशा स्पष्ट करते हुए कहा कि उनका अगला कदम राजनीति है। उनके मुताबिक, प्रशासनिक सेवा में रहते हुए उन्होंने व्यवस्था के भीतर से लोगों की समस्याओं को समझा, लेकिन अब वह ऐसी आवाजों को राजनीतिक स्तर पर उठाना चाहती हैं,जो अक्सर सरकारी दफ्तरों तक पहुँच ही नहीं पातीं।

दिव्या मित्तल ने कहा कि उनके लिए राजनीति किसी पद या उपलब्धि की तलाश नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब कोई व्यक्ति जीवन में कई उपलब्धियाँ हासिल कर लेता है,तो उसके बाद वह क्या चाहता है। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि उन्हें अब उन लोगों की आवाज बनना है,जिनकी शिकायत किसी कार्यालय तक नहीं पहुँचती और पहुँचने के बाद भी कई बार सुनी नहीं जाती। उन्होंने देश की आजादी के बाद के वर्षों में आम नागरिकों के सामने मौजूद सवालों और विकास से जुड़े मुद्दों पर जवाबदेही की जरूरत की बात कही।

अपने प्रशासनिक अनुभवों को राजनीति में आने के कारण से जोड़ते हुए दिव्या मित्तल ने मीरजापुर के लहुरियादह गाँव का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि पहाड़ी इलाके में पानी पहुँचाने के काम के निरीक्षण के दौरान उनकी मुलाकात एक महिला से हुई थी। उनके मुताबिक, उस महिला के घर में उस समय पानी की सुविधा भी नहीं थी,लेकिन उसने अपने लिए पेंशन या मकान की माँग करने के बजाय गाँव में पाँचवीं कक्षा के बाद पढ़ाई के लिए स्कूल की माँग की।

दिव्या मित्तल ने बताया कि उन्होंने इस माँग को गंभीरता से लिया और संबंधित नियमों की जाँच के बाद स्कूल को मंजूरी दी गई,लेकिन उनके अनुसार,करीब तीन साल गुजरने के बावजूद स्कूल का निर्माण शुरू नहीं हो सका। इसी अनुभव को आधार बनाकर उन्होंने सरकारी व्यवस्था में फैसलों के क्रियान्वयन और इच्छाशक्ति को लेकर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि जब किसी काम के लिए पैसा,नियम और स्वीकृति मौजूद हो, लेकिन फिर भी काम आगे न बढ़े तो सवाल यह उठता है कि रुकावट कहाँ है।

उन्होंने इसी संदर्भ में कहा कि अगर इरादा हो तो पहाड़ भी रास्ता दे देता है,लेकिन इरादा न हो,तो एक फाइल ही पहाड़ बन जाती है। उन्होंने ऐसे स्कूलों का हिसाब माँगने की बात कही,जो कागजों और मंजूरियों के बावजूद जमीन पर दिखाई नहीं देते। उनका कहना था कि प्रशासन में काम करने के दौरान उन्होंने ऐसी कई परिस्थितियाँ देखीं,जहाँ व्यवस्था के भीतर समाधान की संभावना मौजूद थी,लेकिन प्रक्रिया आगे बढ़ाने में गंभीरता की कमी दिखाई दी।

पूर्व आईएएस अधिकारी ने अपने प्रशासनिक कार्यकाल का एक और उदाहरण राजस्व विभाग में विशेष सचिव के रूप में काम करने के दौरान का बताया। उन्होंने कहा कि एक भूमिहीन व्यक्ति सरकारी जमीन का पट्टा मिलने के बावजूद उस पर कब्जा नहीं मिलने की शिकायत लेकर उनके पास आया था। दिव्या मित्तल के अनुसार, उन्होंने मामले से जुड़े दस्तावेजों की जाँच की तो संबंधित रिपोर्ट में खामी मिली। उन्होंने अधिकारियों से बात कर रिपोर्ट वापस कराई और कार्रवाई भी की गई। हालाँकि,उनके अनुसार जब उस व्यक्ति को जमीन पर कब्जा दिलाने का सवाल आया तो उन्हें यह जवाब मिला कि ऊपर से ऐसा करने के लिए मना किया गया है।

इसी बात को लेकर दिव्या मित्तल ने सवाल उठाया कि आखिर वह ‘ऊपर’ कौन है। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुसार लोकतंत्र में सबसे ऊपर जनता है और यदि किसी नागरिक को अपने अधिकार के लिए लगातार इधर-उधर भटकना पड़े तो यह व्यवस्था के सामने बड़ा सवाल है। उन्होंने कहा कि किसी नागरिक को अधिकार मिलने पर उसे इसे किसी की कृपा के रूप में नहीं देखना चाहिए,बल्कि न्याय और अधिकार को उसका हक माना जाना चाहिए। उन्होंने ऐसे मामलों में जवाबदेही तय करने की जरूरत पर जोर दिया।

दिव्या मित्तल ने बुनियादी ढाँचे से जुड़े मुद्दों को भी अपने राजनीतिक एजेंडे का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश समेत देश के कई हिस्सों में आज भी ऐसे गाँव हैं, जहाँ सड़क की समस्या बनी हुई है। कहीं नदी पर पुल नहीं है तो बारिश के दौरान गांवों का संपर्क आसपास के इलाकों से कट जाता है। उन्होंने सड़कों पर मौजूद गड्ढों का जिक्र करते हुए कहा कि संबंधित अधिकारियों को इन समस्याओं की जानकारी होती है। उनके पास फाइलें होती हैं,आँकड़े होते हैं और कई मामलों में दुर्घटनाओं तथा मौतों का रिकॉर्ड भी मौजूद होता है,लेकिन समस्या को लेकर अपेक्षित चिंता दिखाई नहीं देती।

इसी संदर्भ में उन्होंने एक कड़ा सवाल उठाते हुए कहा कि जब किसी समस्या को लेकर फिक्र नहीं होती,तो सड़क पर होने वाली मौत को केवल हादसा कहकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसी मौतों का भी हिसाब चाहिए। हालाँकि,ये उनके राजनीतिक संदेश में व्यक्त किए गए विचार और आरोप हैं; इनसे किसी विशेष अधिकारी या विभाग की व्यक्तिगत जिम्मेदारी स्वतः सिद्ध नहीं होती।

दिव्या मित्तल के राजनीतिक प्रवेश की घोषणा उनके प्रशासनिक करियर के समाप्त होने के कुछ ही समय बाद हुई है। उनका इस्तीफा केंद्र सरकार ने सितंबर में स्वीकार किया था और यह 15 सितंबर 2026 से प्रभावी हुआ। इस्तीफा देने के बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर कवि जयशंकर प्रसाद के नाटक ‘चंद्रगुप्त’ की पंक्ति लिखी थी—“प्रशस्त पुण्य पंथ है,बढ़े चलो,बढ़े चलो।” उस समय भी उनके अगले कदम को लेकर कई तरह की चर्चाएँ थीं। अब उन्होंने स्वयं स्पष्ट कर दिया है कि वह राजनीति में उतरने जा रही हैं।

दिव्या मित्तल वर्ष 2013 बैच की आईएएस अधिकारी रही हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश में अलग-अलग प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभालीं और मिर्जापुर,संतकबीरनगर तथा देवरिया जैसे जिलों में जिलाधिकारी के रूप में भी काम किया। सितंबर में उनका इस्तीफा स्वीकार होने के बाद से ही इस बात को लेकर चर्चा थी कि प्रशासनिक सेवा छोड़ने के बाद वह किस क्षेत्र में जाएँगी। उस समय राजनीति में आने की संभावना को लेकर अटकलें जरूर थीं, लेकिन उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपने अगले कदम की घोषणा मंगलवार को ही की।

अब अपने राजनीतिक प्रवेश के साथ उन्होंने सीधे जनता से संवाद का रास्ता भी चुना है। वीडियो संदेश में उन्होंने लोगों से व्हाट्सऐप के माध्यम से जुड़ने की अपील की। इससे संकेत मिलता है कि उनकी प्रस्तावित राजनीतिक गतिविधियों में डिजिटल माध्यम और सीधे जनसंपर्क की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। उन्होंने लोगों से अपनी समस्याओं, सवालों और विचारों को उनके साथ साझा करने का आह्वान किया है। उनका कहना है कि यदि आम लोग भी व्यवस्था में बदलाव और जवाबदेही को लेकर उनके साथ खड़े होना चाहते हैं,तो वे सीधे उनसे जुड़ सकते हैं।

उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा के लिए उत्तर प्रदेश को चुना है। इसे लेकर उनका कहना है कि उत्तर प्रदेश उनके लिए केवल एक राजनीतिक क्षेत्र नहीं,बल्कि उनकी कर्मभूमि है। उन्होंने यहाँ प्रशासनिक सेवा के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों, शिक्षा, पानी, जमीन, सड़क और अन्य जनसमस्याओं को करीब से देखने का अनुभव हासिल किया। अब वह इन्हीं अनुभवों को राजनीति के माध्यम से व्यापक स्तर पर उठाने की बात कर रही हैं।

दिव्या मित्तल ने फिलहाल किसी राजनीतिक दल में शामिल होने या किसी चुनाव क्षेत्र से चुनाव लड़ने की घोषणा नहीं की है। इससे पहले उनके राजनीति में आने को लेकर अलग-अलग अटकलें लगाई जाती रही थीं और मिर्जापुर से संभावित चुनावी पारी की चर्चा भी सामने आई थी,लेकिन अभी तक उन्होंने इस संबंध में कोई औपचारिक घोषणा नहीं की है। इसलिए उनके अगले चुनावी कदम को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुँचना जल्दबाजी होगी।

उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए राजनीतिक गतिविधियां पहले से तेज हैं। ऐसे समय में एक पूर्व आईएएस अधिकारी का किसी राजनीतिक दल का हिस्सा बने बिना सीधे जनता के बीच जाने का ऐलान अपने आप में एक अलग राजनीतिक घटनाक्रम है। हालाँकि,उनकी राजनीतिक भूमिका, संगठनात्मक ढाँचा, संभावित चुनावी भागीदारी और आगे की रणनीति अभी स्पष्ट नहीं है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वह अपने प्रस्तावित जनसंपर्क अभियान को किस रूप में आगे बढ़ाती हैं और क्या इसे किसी औपचारिक राजनीतिक संगठन या चुनावी मंच में बदला जाता है।

अपने वीडियो संदेश में दिव्या मित्तल ने बार-बार जवाबदेही और आम नागरिक की आवाज का मुद्दा उठाया। प्रशासनिक सेवा के दौरान देखे गए अनुभवों को उन्होंने अपनी राजनीतिक सोच की पृष्ठभूमि बताया है। उनका कहना है कि कई समस्याओं के समाधान के लिए केवल नियम और बजट पर्याप्त नहीं होते, बल्कि उन्हें लागू करने की इच्छा और जिम्मेदारी भी जरूरी होती है। राजनीति में आने के बाद अब वह इसी सवाल को व्यापक स्तर पर उठाने की बात कर रही हैं।

इस तरह करीब 13 वर्षों तक प्रशासनिक सेवा का हिस्सा रहने के बाद दिव्या मित्तल ने अपने करियर की दूसरी पारी के रूप में राजनीति को चुना है। उन्होंने किसी स्थापित राजनीतिक दल के साथ जाने के बजाय फिलहाल जनता के बीच से अपनी राह बनाने का संकेत दिया है। अब उनकी चुनौती प्रशासनिक अनुभव को राजनीतिक संगठन और जनसमर्थन में बदलने की होगी। उनकी आगे की रणनीति,जनता से संवाद का स्वरूप और उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनकी वास्तविक भूमिका आने वाले समय में ही स्पष्ट होगी। फिलहाल उनका संदेश साफ है कि वह सत्ता या पद की तलाश से ज्यादा उन सवालों को राजनीतिक मंच पर उठाना चाहती हैं,जिन्हें वह प्रशासनिक सेवा के दौरान जमीन पर देखती रही हैं।