भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामला पहुँचा सुप्रीम कोर्ट,जल्द सुनवाई से इनकार (तस्वीर क्रेडिट@piyush_bebak_)

भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिका पर सुनवाई से किया इंकार,हाईकोर्ट जाने की दी सलाह

दिल्ली,30 जून (युआईटीवी)- बिहार के भोजपुर जिले में भरत भूषण तिवारी के कथित एनकाउंटर को लेकर दायर जनहित याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने सुनवाई करने से इंकार कर दिया है। अदालत ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वह इस मामले में संबंधित उच्च न्यायालय का रुख करे। इसके साथ ही सर्वोच्च अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि याचिकाकर्ता ने किस आधार पर यह जनहित याचिका दायर की है। इस फैसले के बाद अब इस मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई के लिए उच्च न्यायालय का रास्ता खुला है।

यह जनहित याचिका उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता विशाल तिवारी की ओर से दायर की गई थी। याचिका में माँग की गई थी कि भोजपुर में 17 जून को हुए भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर की जाँच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो से कराई जाए। इसके अलावा याचिका में उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित करने की भी माँग की गई थी,ताकि पूरे मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जाँच सुनिश्चित की जा सके।

याचिका में यह भी अनुरोध किया गया था कि एनकाउंटर में शामिल पुलिस अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जाए और मामले की स्वतंत्र जाँच कराई जाए। याचिकाकर्ता का तर्क था कि भरत भूषण तिवारी की मौत को केवल पुलिस कार्रवाई मानकर नहीं देखा जा सकता,बल्कि यह एक गंभीर घटना है,जिसकी निष्पक्ष जाँच होना आवश्यक है। याचिका में इसे हत्या का मामला बताते हुए कहा गया कि यदि स्वतंत्र एजेंसी से जाँच नहीं कराई गई तो सच्चाई सामने आने में कठिनाई हो सकती है।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिकाकर्ता से पूछा कि उन्होंने किस हैसियत से यह जनहित याचिका दायर की है। अदालत ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में पहले संबंधित उच्च न्यायालय के समक्ष जाना अधिक उपयुक्त होगा। इसके बाद पीठ ने याचिका पर सुनवाई करने से इंकार करते हुए याचिकाकर्ता को उच्च न्यायालय में अपनी बात रखने की सलाह दी।

सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि न्यायिक प्रक्रिया के तहत प्रत्येक मामले के लिए उपयुक्त मंच निर्धारित होता है और कई मामलों में संबंधित उच्च न्यायालय पहले स्तर पर उचित मंच माना जाता है। इसी आधार पर सर्वोच्च अदालत ने याचिकाकर्ता को पहले उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का सुझाव दिया।

यह पहला अवसर नहीं था जब इस मामले को लेकर उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया गया। इससे पहले भी इस मामले का उल्लेख न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष किया गया था। उस समय तत्काल सुनवाई की माँग की गई थी,लेकिन अदालत ने उस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया था। पीठ ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया था कि वह मामले को सूचीबद्ध कराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की रजिस्ट्री से संपर्क करे। इसके बाद औपचारिक रूप से जनहित याचिका दायर की गई,जिस पर अब सुनवाई से इंकार कर दिया गया है।

जनहित याचिका में भोजपुर में 17 जून को हुई घटना का विस्तार से उल्लेख किया गया है। याचिका के अनुसार,भरत भूषण तिवारी की मौत पुलिस एनकाउंटर में हुई थी और इस पूरे घटनाक्रम को लेकर कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं। याचिका में कहा गया कि इस मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए स्वतंत्र जाँच आवश्यक है,क्योंकि पुलिस द्वारा की गई जाँच पर निष्पक्षता को लेकर संदेह व्यक्त किया गया है।

याचिका में यह भी कहा गया कि कथित एनकाउंटर में होने वाली मौतें लोकतांत्रिक व्यवस्था और कानून के शासन के लिए गंभीर चुनौती मानी जाती हैं। इसमें तर्क दिया गया कि यदि किसी व्यक्ति की मौत पुलिस मुठभेड़ में होती है,तो उसकी परिस्थितियों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच होना बेहद आवश्यक है,ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बल प्रयोग कानून के दायरे में और आवश्यक परिस्थितियों में ही किया गया था।

याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में यह भी उल्लेख किया कि कई मामलों में पुलिस की ओर से एक जैसा स्पष्टीकरण दिया जाता है कि आरोपी ने पुलिस से हथियार छीनने या भागने की कोशिश की,जिसके बाद आत्मरक्षा में गोली चलानी पड़ी। याचिका में कहा गया कि ऐसे दावों की सत्यता की जाँच स्वतंत्र एजेंसी द्वारा की जानी चाहिए,ताकि किसी भी प्रकार की आशंका या विवाद को दूर किया जा सके।

भरत भूषण तिवारी से जुड़े घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए याचिका में कहा गया कि कथित एनकाउंटर से कुछ घंटे पहले उन्होंने फेसबुक लाइव के माध्यम से अपनी बात रखी थी। याचिका के अनुसार,उस प्रसारण में उन्होंने कुछ मांगें पूरी होने की स्थिति में आत्मसमर्पण करने की इच्छा जताई थी। इस आधार पर याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया कि यदि आत्मसमर्पण की संभावना मौजूद थी,तो उसके बाद हुई पुलिस कार्रवाई की परिस्थितियों की विस्तृत जाँच आवश्यक है।

याचिका में मृतक के पिता काशीनाथ तिवारी के दावों का भी उल्लेख किया गया है। उनके अनुसार,उनके पुत्र के खिलाफ कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था। उन्होंने दावा किया कि न तो उसके खिलाफ कोई प्राथमिकी दर्ज थी और न ही किसी मामले में आरोपपत्र दाखिल किया गया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनके बेटे ने हथियार डाल दिए थे,इसके बावजूद उसे गोली मार दी गई। हालाँकि,इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया और जाँच के बाद ही हो सकेगी।

घटना के बाद भोजपुर के संबंधित गाँव में विरोध प्रदर्शन भी हुए थे। स्थानीय लोगों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जाँच की माँग की थी। ग्रामीणों का कहना था कि यदि वास्तव में आत्मसमर्पण की स्थिति बन चुकी थी,तो यह जाँच की जानी चाहिए कि उसके बाद घातक बल का प्रयोग क्यों किया गया। इसी पृष्ठभूमि में जनहित याचिका दायर की गई थी,जिसमें न्यायिक जाँच और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो से जाँच कराने की माँग शामिल थी।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा याचिका पर सुनवाई से इंकार किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि मामले की सुनवाई का रास्ता पूरी तरह बंद हो गया है। अदालत ने केवल यह कहा है कि याचिकाकर्ता पहले संबंधित उच्च न्यायालय का रुख करें। यदि वहाँ सुनवाई होती है और आवश्यक समझा जाता है,तो मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रह सकती है।

अब इस पूरे मामले में आगे की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि याचिकाकर्ता उच्च न्यायालय में कब और किस प्रकार से अपनी याचिका प्रस्तुत करते हैं। यदि उच्च न्यायालय मामले को सुनवाई के योग्य मानता है,तो वह उपलब्ध तथ्यों,साक्ष्यों और कानूनी पहलुओं के आधार पर आवश्यक आदेश जारी कर सकता है। फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामले में न्यायिक लड़ाई अब उच्च न्यायालय के स्तर पर आगे बढ़ेगी,जहाँ याचिकाकर्ता अपनी मांगों और आरोपों को विस्तार से अदालत के समक्ष रख सकेंगे।