नई दिल्ली,15 अक्टूबर (युआईटीवी)- अमेरिका में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई के इस्तेमाल और उसकी सुरक्षा को लेकर कानूनी बहस तेज हो गई है। ओपनएआई के लोकप्रिय चैटबॉट चैटजीपीटी के खिलाफ आठ अमेरिकी राज्यों ने मुकदमे दायर किए हैं। इन राज्यों की सरकारों का आरोप है कि चैटबॉट का इस्तेमाल कुछ परिस्थितियों में उपयोगकर्ताओं,विशेष रूप से किशोरों,के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। मुकदमों में दावा किया गया है कि चैटजीपीटी खतरनाक व्यवहार को बढ़ावा देने,लोगों को भ्रमित करने और कुछ मामलों में खुद को या दूसरों को नुकसान पहुँचाने से जुड़ी गतिविधियों में मदद करने का जोखिम पैदा कर सकता है।
इन कानूनी कार्रवाइयों ने एआई कंपनियों की जिम्मेदारी,डिजिटल उत्पादों की सुरक्षा और उपभोक्ताओं को संभावित खतरों के बारे में सही जानकारी देने जैसे मुद्दों को फिर चर्चा में ला दिया है। राज्य सरकारों का कहना है कि एआई तकनीक विकसित करने वाली कंपनियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके उत्पाद लोगों की सुरक्षा के लिए खतरा न बनें। वहीं,इस मामले में लगाए गए आरोपों पर अदालतों में विचार किया जाना बाकी है। इसलिए इन्हें फिलहाल राज्यों की ओर से लगाए गए आरोपों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, आयोवा, कंसास, एरिजोना, अर्कांसस, इडाहो, मोंटाना, नेब्रास्का और वेस्ट वर्जीनिया के अटॉर्नी जनरल ने अपने-अपने राज्यों की अदालतों में ओपनएआई के खिलाफ मुकदमे दायर किए हैं। इन मुकदमों में कंपनी के एआई चैटबॉट की कार्यप्रणाली और उपयोगकर्ताओं पर उसके संभावित प्रभाव को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
राज्यों का आरोप है कि चैटजीपीटी को इस तरह विकसित किया गया है कि उपयोगकर्ता उस पर आसानी से भरोसा करने लगते हैं। बातचीत करने की क्षमता,जवाब देने का तरीका और उपयोगकर्ता के साथ लगातार संवाद बनाए रखने की विशेषताएँ लोगों को चैटबॉट के जवाबों पर जरूरत से ज्यादा निर्भर बना सकती हैं। मुकदमों में दावा किया गया है कि इस तरह का भरोसा कुछ परिस्थितियों में नुकसानदेह हो सकता है,खासकर तब जब उपयोगकर्ता किसी संवेदनशील या जोखिम भरे विषय पर सलाह माँग रहे हों।
राज्य सरकारों ने यह भी आरोप लगाया है कि चैटबॉट का इस्तेमाल भ्रम फैलाने या खतरनाक गतिविधियों से जुड़ी जानकारी हासिल करने के लिए किया जा सकता है। मुकदमों में सामूहिक गोलीबारी जैसी हिंसक घटनाओं की योजना बनाने में सहायता मिलने की आशंका का भी उल्लेख किया गया है। हालाँकि,इन आरोपों की सत्यता और प्रत्येक मामले में चैटबॉट की भूमिका का निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के दौरान उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होगा।
आठ राज्यों की ओर से दायर मुकदमों में ओपनएआई पर उपभोक्ता संरक्षण कानूनों के उल्लंघन का आरोप भी लगाया गया है। राज्यों का कहना है कि कंपनी ने चैटजीपीटी की सुरक्षा और उसके इस्तेमाल से जुड़े जोखिमों के बारे में उपयोगकर्ताओं को पर्याप्त या सही जानकारी नहीं दी। उनके मुताबिक,यदि किसी डिजिटल उत्पाद से लोगों के स्वास्थ्य और सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है,तो कंपनी की जिम्मेदारी है कि वह उसके जोखिमों को स्पष्ट रूप से बताए और जरूरी सुरक्षा उपाय लागू करे।
एआई चैटबॉट अब शिक्षा, शोध, लेखन, कामकाज और रोजमर्रा की जानकारी हासिल करने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ऐसे में उनकी विश्वसनीयता और सुरक्षा का महत्व लगातार बढ़ रहा है। उपयोगकर्ता अक्सर चैटबॉट से व्यक्तिगत समस्याओं, मानसिक दबाव, स्वास्थ्य या अन्य संवेदनशील विषयों पर भी बातचीत करते हैं। राज्यों की चिंता इसी बात को लेकर है कि अगर कोई उपयोगकर्ता एआई के जवाबों पर अत्यधिक भरोसा करता है,तो गलत या नुकसानदेह प्रतिक्रिया उसके फैसलों को प्रभावित कर सकती है।
किशोरों की सुरक्षा इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू है। कम उम्र के उपयोगकर्ताओं के लिए डिजिटल सामग्री और एआई से मिलने वाले जवाबों का प्रभाव अलग हो सकता है। ऐसे में राज्यों का मानना है कि कंपनियों को अपने उत्पादों को विकसित करते समय संभावित जोखिमों का आकलन करना चाहिए और कमजोर आयु वर्ग के उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा के लिए प्रभावी उपाय अपनाने चाहिए।
मुकदमा दायर करने वाले राज्यों ने अदालतों से ऐसे आदेश जारी करने की माँग की है, जिनसे ओपनएआई को चैटजीपीटी के काम करने के तरीके में बदलाव करना पड़े। उनकी मांगों में एआई की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना और ऐसे मॉडलों के विकास पर शर्तें लगाने का प्रस्ताव शामिल है,जो खुद में सुधार करने की क्षमता रखते हैं। राज्यों का कहना है कि इस तरह के मॉडल विकसित करने से पहले यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि वे मानवीय मूल्यों और सुरक्षा संबंधी अपेक्षाओं के अनुरूप काम करें।
यह माँग एआई उद्योग में एक बड़े सवाल को सामने लाती है कि तेजी से विकसित हो रही तकनीक पर निगरानी किस तरह रखी जाए। एआई प्रणालियों को बेहतर बनाने के लिए कंपनियाँ लगातार नए तरीके अपनाती हैं,लेकिन उनकी क्षमताओं में बढ़ोतरी के साथ संभावित जोखिमों का आकलन भी जरूरी हो जाता है। नियामकों और कंपनियों के सामने चुनौती यह है कि तकनीकी विकास को जारी रखते हुए उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
राज्य सरकारों ने आर्थिक हर्जाने और कथित कानूनी उल्लंघनों के लिए जुर्माना लगाने की माँग भी की है। यदि अदालतें आरोपों को स्वीकार करती हैं,तो कंपनी को अपने उत्पादों की कार्यप्रणाली,सुरक्षा उपायों और उपयोगकर्ताओं को दी जाने वाली जानकारी में बदलाव करना पड़ सकता है। हालाँकि,मुकदमों के नतीजे आने तक यह कहना संभव नहीं है कि अदालतें किन मांगों को स्वीकार करेंगी।
रिपोर्ट के मुताबिक,आठ राज्यों की यह पहल किसी एआई कंपनी के खिलाफ अमेरिकी राज्य सरकारों की सबसे बड़ी समन्वित कानूनी कार्रवाइयों में से एक है। इससे पहले फ्लोरिडा के अटॉर्नी जनरल ने जून में ओपनएआई के खिलाफ इसी तरह का मुकदमा दायर किया था। ताजा मामलों से संकेत मिलता है कि अमेरिकी राज्यों में एआई कंपनियों के उत्पादों की सुरक्षा और उपभोक्ता अधिकारों को लेकर निगरानी बढ़ाने की माँग जोर पकड़ रही है।
ओपनएआई के प्रवक्ता ने इन मुकदमों पर टिप्पणी के अनुरोध का तत्काल जवाब नहीं दिया। ऐसे में कंपनी का विस्तृत पक्ष सामने आना बाकी है। अदालतों में आगे होने वाली सुनवाई के दौरान कंपनी की प्रतिक्रिया,राज्यों की ओर से पेश किए जाने वाले साक्ष्य और कानूनी दलीलें महत्वपूर्ण होंगी।
कंपनी को निजी व्यक्तियों की ओर से दायर कई अन्य मुकदमों का भी सामना करना पड़ रहा है। इन मामलों में आरोप लगाया गया है कि चैटजीपीटी ने कुछ उपयोगकर्ताओं को सामूहिक गोलीबारी या अन्य हिंसक घटनाओं की योजना बनाने में मदद की। इन आरोपों ने इस सवाल को प्रमुखता दी है कि यदि एआई प्रणाली के जवाबों का इस्तेमाल किसी गंभीर नुकसान के लिए किया जाता है,तो उस स्थिति में कंपनी की कानूनी जिम्मेदारी किस तरह तय की जानी चाहिए।
ओपनएआई के सामने चुनौतियां केवल अमेरिका तक सीमित नहीं हैं। इटली, कनाडा, ऑस्ट्रिया और पोलैंड जैसे देशों में भी कंपनी को डेटा गोपनीयता, व्यक्तिगत जानकारी के इस्तेमाल और नियामकीय नियमों के पालन से जुड़े मामलों का सामना करना पड़ा है। हालाँकि, इन मामलों की प्रकृति अमेरिकी राज्यों की ओर से दायर मौजूदा मुकदमों से अलग है। जहाँ अमेरिकी मामले मुख्य रूप से सुरक्षा और उपभोक्ता संरक्षण पर केंद्रित हैं, वहीं दूसरे देशों में व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल और उसकी सटीकता को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
इटली के डेटा संरक्षण प्राधिकरण ने दिसंबर 2024 में गोपनीयता नियमों के उल्लंघन के आरोप में ओपनएआई पर 1.5 करोड़ यूरो का जुर्माना लगाया था। इस मामले ने एआई सेवाओं के प्रशिक्षण और संचालन में व्यक्तिगत जानकारी के इस्तेमाल को लेकर बहस को तेज किया। ऐसे सिस्टम बड़ी मात्रा में उपलब्ध जानकारी पर निर्भर करते हैं,इसलिए यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि डेटा किस तरह जुटाया जाता है,उसका उपयोग किन उद्देश्यों के लिए किया जाता है और संबंधित नियमों का पालन कैसे सुनिश्चित होता है।
कनाडा में भी ओपनएआई की ओर से डेटा जुटाने और लोगों की सहमति के बिना निजी जानकारी का इस्तेमाल किए जाने से जुड़े सवालों की जाँच की गई। वहीं,ऑस्ट्रिया में डिजिटल अधिकारों से जुड़े संगठन नोयब ने चैटजीपीटी से गलत व्यक्तिगत जानकारी मिलने और उसे सुधारने या हटाने के अधिकार से जुड़े मुद्दों पर शिकायत दर्ज कराई थी।
पोलैंड में भी चैटजीपीटी के जरिए गलत जानकारी तैयार होने और डेटा प्रसंस्करण में पारदर्शिता की कमी को लेकर ओपनएआई के खिलाफ जाँच शुरू की गई थी। इन मामलों में प्रमुख चिंता यह रही है कि लोगों की व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा कैसे की जाए और एआई प्रणालियों से तैयार होने वाले जवाबों की सटीकता तथा जवाबदेही कैसे सुनिश्चित हो।
अमेरिका में आठ राज्यों की ओर से दायर मुकदमे एआई उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी परीक्षा साबित हो सकते हैं। इनसे यह तय करने की दिशा में बहस आगे बढ़ेगी कि एआई कंपनियों को अपने उत्पादों से जुड़े संभावित जोखिमों के बारे में किस स्तर तक जानकारी देनी चाहिए और उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कौन-से कदम जरूरी हैं।
इस मामले का असर केवल ओपनएआई तक सीमित नहीं रह सकता। यदि अदालतें सुरक्षा और उपभोक्ता संरक्षण से जुड़े नए मानक तय करती हैं,तो दूसरी एआई कंपनियों को भी अपनी प्रणालियों,सुरक्षा उपायों और पारदर्शिता संबंधी नीतियों की समीक्षा करनी पड़ सकती है।
फिलहाल,मुकदमों में लगाए गए आरोपों पर अंतिम फैसला आना बाकी है,लेकिन इन कानूनी कार्रवाइयों ने स्पष्ट कर दिया है कि एआई तकनीक के विस्तार के साथ उसकी सुरक्षा,गोपनीयता और जवाबदेही को लेकर सवाल भी बढ़ रहे हैं। आने वाले समय में अदालतों के फैसले यह निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं कि तकनीकी नवाचार और उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा के बीच संतुलन किस तरह स्थापित किया जाए।
