ढाका,7 सितंबर (युआईटीवी)- बांग्लादेश के प्रमुख हिंदू नेता और ‘बांग्लादेश सम्मिलित सनातनी जागरण जोत’ के प्रवक्ता चिन्मय कृष्ण दास को दो मामलों में हाई कोर्ट से जमानत मिलने के बावजूद जेल से रिहाई नहीं मिल सकी है। उनकी रिहाई दो अन्य मामलों के कारण अटकी हुई है। अदालत के आदेशों के हवाले से स्थानीय मीडिया में सामने आई जानकारी के बाद हिंदू संगठनों ने इस स्थिति पर हैरानी और नाराजगी जताई है। चिन्मय कृष्ण दास नवंबर 2024 से जेल में बंद हैं और उनके खिलाफ हत्या,देशद्रोह सहित कुल छह मामले दर्ज होने की बात कही गई है।
बांग्लादेश हाई कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने रविवार को चिन्मय कृष्ण दास की ओर से दायर दो अलग-अलग जमानत याचिकाओं पर सुनवाई की। पीठ में न्यायमूर्ति केएम जाहिद सरवर और न्यायमूर्ति शेख अबू ताहिर शामिल थे। सुनवाई के बाद अदालत ने चट्टोग्राम के कोतवाली पुलिस थाने में दर्ज दो मामलों में उन्हें जमानत प्रदान कर दी। ये दोनों मामले 26 नवंबर 2024 को हुई कथित तोड़फोड़ और पुलिसकर्मियों को उनके कर्तव्यों का निर्वहन करने से रोकने के आरोपों से संबंधित हैं।
चिन्मय कृष्ण दास के वकील अपूर्व कुमार भट्टाचार्य के मुताबिक,उनके मुवक्किल के खिलाफ कुल छह मामले दर्ज हैं। इनमें हत्या और देशद्रोह जैसे गंभीर आरोप भी शामिल हैं। उन्होंने बताया कि चिन्मय को हाई कोर्ट और निचली अदालतों से अब तक पाँच मामलों में जमानत मिल चुकी है। इसके बावजूद उनकी तत्काल रिहाई संभव नहीं हो सकी है, क्योंकि एक अन्य महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट के अपीलेट डिवीजन ने हाई कोर्ट द्वारा दी गई जमानत पर रोक लगा रखी है।
वकील के अनुसार, देशद्रोह के मामले में हाई कोर्ट ने चिन्मय कृष्ण दास को जमानत दी थी,लेकिन सुप्रीम कोर्ट के अपीलेट डिवीजन ने उस आदेश पर रोक लगा दी। यही वजह है कि अन्य मामलों में जमानत मिलने के बाद भी उन्हें जेल में रहना पड़ रहा है। चिन्मय के समर्थकों और हिंदू संगठनों का कहना है कि इतने मामलों में अदालतों से राहत मिलने के बावजूद जेल से बाहर न आ पाना उनके लिए गंभीर चिंता का विषय है।
चिन्मय कृष्ण दास को 25 नवंबर 2024 को ढाका में गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के अगले दिन उन्हें चट्टोग्राम की अदालत के समक्ष पेश किया गया,जहाँ उनकी जमानत याचिका खारिज होने के बाद उन्हें जेल भेज दिया गया था। इसके बाद 11 दिसंबर को भी इसी मामले में अदालत ने उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया था। उनकी गिरफ्तारी के बाद बांग्लादेश के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ देश के बाहर भी हिंदू समुदाय के लोगों ने विरोध प्रदर्शन किए थे।
चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी और उनके खिलाफ दर्ज मामलों को लेकर बांग्लादेश में अल्पसंख्यक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर बहस लगातार जारी रही है। हिंदू संगठनों का आरोप है कि देश में हिंदू समुदाय को लंबे समय से विभिन्न प्रकार की हिंसा और दबाव का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी ओर,बांग्लादेश की कानून व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों और सरकार की ओर से मामलों को कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाए जाने की बात कही जाती रही है।
इस बीच, उत्तरी अमेरिका के प्रमुख हिंदू अधिकार संगठन ‘कोएलिशन ऑफ हिंदुज ऑफ नॉर्थ अमेरिका’ ने चिन्मय कृष्ण दास की लगातार जेल में मौजूदगी पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। संगठन ने उनकी गिरफ्तारी और लंबे समय से जारी हिरासत की आलोचना करते हुए इसे सरकार द्वारा प्रायोजित उत्पीड़न करार दिया। संगठन ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर कहा कि एक हिंदू नेता, जिन्होंने अपने देश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और मानवाधिकारों के लिए आवाज उठाई,वह लगभग दो वर्षों से जेल में हैं।
संगठन ने चिन्मय कृष्ण दास के खिलाफ हत्या के आरोप को लेकर भी सवाल उठाया। उसके अनुसार,जिस हत्या के मामले में उन पर आरोप लगाया गया है,वह घटना कथित तौर पर उनके पुलिस हिरासत में होने के बाद हुई थी। संगठन ने इसी आधार पर मामले की निष्पक्षता और उनके खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई को लेकर सवाल खड़े किए हैं। हालाँकि,इन आरोपों और दावों पर अंतिम स्थिति अदालत की कानूनी प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
हिंदू अधिकार संगठन ने बांग्लादेश में राजनीतिक सत्ता परिवर्तन के बावजूद अल्पसंख्यकों की स्थिति में सुधार नहीं होने का दावा भी किया। संगठन ने कहा कि चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी के समय बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार थी,जबकि अब देश में निर्वाचित सरकार सत्ता में है। संगठन का आरोप है कि सरकार बदलने के बावजूद बांग्लादेशी हिंदुओं के खिलाफ कथित उत्पीड़न और हिंसा का सिलसिला नहीं रुका है।
संगठन ने बांग्लादेश में हिंदू आबादी के घटते अनुपात का भी उल्लेख किया। उसके अनुसार,वर्ष 1951 में बांग्लादेश की आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी करीब 22 प्रतिशत थी,जो वर्तमान समय में घटकर लगभग 8 प्रतिशत रह गई है। संगठन ने इस जनसांख्यिकीय बदलाव को हिंदू समुदाय के खिलाफ लंबे समय से जारी दबाव और हिंसा से जोड़ते हुए इसे ‘धीमा नरसंहार’ तक बताया। हालाँकि,आबादी में बदलाव के पीछे ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक और प्रवासन से जुड़े कई कारणों पर अलग-अलग मत रहे हैं।
‘कोएलिशन ऑफ हिंदुज ऑफ नॉर्थ अमेरिका’ ने अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर नजर रखने वाली अमेरिकी संस्था से भी सवाल किया कि क्या वह बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर पर्याप्त ध्यान दे रही है। संगठन ने विशेष रूप से बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ कथित हिंसा और चिन्मय कृष्ण दास की लंबे समय से चली आ रही हिरासत को लेकर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की भूमिका पर सवाल उठाया।
चिन्मय कृष्ण दास का मामला बांग्लादेश में अल्पसंख्यक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ी व्यापक बहस के केंद्र में रहा है। उनकी गिरफ्तारी के बाद से ही हिंदू संगठनों ने उनकी रिहाई की माँग उठाई है। वहीं,उनके खिलाफ दर्ज गंभीर मामलों के कारण कानूनी प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण बनी हुई है। मौजूदा स्थिति में उन्हें पाँच मामलों में अलग-अलग अदालतों से जमानत मिल चुकी है,लेकिन देशद्रोह से जुड़े मामले में जमानत पर रोक और अन्य लंबित कानूनी बाधाओं के कारण उनकी जेल से रिहाई नहीं हो सकी है।
अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट के अपीलेट डिवीजन में चल रही कानूनी प्रक्रिया पर टिकी हैं। यदि देशद्रोह मामले में लगी रोक हटती है और अन्य कानूनी अड़चनें समाप्त होती हैं,तभी उनकी रिहाई का रास्ता साफ हो सकता है। दूसरी ओर,हिंदू संगठन इस मामले को केवल एक व्यक्ति की कानूनी लड़ाई के रूप में नहीं,बल्कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के अधिकारों और सुरक्षा से जुड़े बड़े मुद्दे के तौर पर देख रहे हैं।
चिन्मय कृष्ण दास की हिरासत और उन्हें अलग-अलग मामलों में मिली जमानत ने बांग्लादेश की न्यायिक प्रक्रिया तथा अल्पसंख्यक अधिकारों को लेकर एक बार फिर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज कर दी है। फिलहाल उनकी रिहाई दो लंबित मामलों के कारण रुकी हुई है और आगे की कानूनी कार्रवाई यह तय करेगी कि वह जेल से कब बाहर आ पाएँगे।
