वाशिंगटन, 7 मई (युआईटीवी)- पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर गहरा गया है। एक ओर दोनों देशों के बीच युद्ध को समाप्त करने और किसी समझौते तक पहुँचने के लिए कूटनीतिक बातचीत जारी है,वहीं दूसरी ओर समुद्र में सैन्य कार्रवाई और आक्रामक बयानबाजी ने हालात को और जटिल बना दिया है। अमेरिकी सेना द्वारा ईरानी झंडे वाले एक तेल टैंकर को निशाना बनाए जाने की घटना ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नई चिंता पैदा कर दी है। इस घटनाक्रम के बीच तेहरान की सड़कों पर हजारों लोग अपने नेतृत्व और सेना के समर्थन में उतर आए हैं,जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान पर दबाव बढ़ाने वाले बयान दे रहे हैं।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि अमेरिकी सेना ने ओमान की खाड़ी में एक ईरानी तेल टैंकर को निशाना बनाया। कमांड के अनुसार यह जहाज,जिसका नाम “हस्ना” बताया गया,ईरानी झंडे के साथ अंतर्राष्ट्रीय जलक्षेत्र से होकर एक ईरानी बंदरगाह की ओर जा रहा था। अमेरिका का दावा है कि यह जहाज बिना माल के था,लेकिन उसे रोकने के लिए कई बार चेतावनी दी गई। जब जहाज के चालक दल ने चेतावनियों का पालन नहीं किया,तब अमेरिकी नौसेना ने कार्रवाई की।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड के बयान के मुताबिक यह हमला बुधवार को अमेरिकी पूर्वी समयानुसार सुबह लगभग नौ बजे किया गया। कार्रवाई में अमेरिकी युद्धपोत यूएसएस अब्राहम लिंकन से उड़ान भरने वाले नौसेना के लड़ाकू विमान एफ/ए-18 सुपर हॉर्नेट का इस्तेमाल किया गया। अमेरिकी सेना ने विमान की 20 एमएम कैनन गन से कई राउंड फायर किए,जिससे टैंकर के रडर को नुकसान पहुँचा और वह आगे बढ़ने में असमर्थ हो गया। कमांड ने दावा किया कि इस कार्रवाई के बाद जहाज ईरान की ओर नहीं बढ़ रहा है।
अमेरिका ने यह भी कहा कि ईरानी बंदरगाहों की ओर आने-जाने वाले जहाजों पर उसकी नाकाबंदी पूरी तरह लागू है और किसी भी जहाज को नियमों की अनदेखी करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। इस बयान ने संकेत दिया कि अमेरिका ईरान पर समुद्री दबाव बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम केवल सैन्य कार्रवाई नहीं,बल्कि ईरान को आर्थिक और रणनीतिक रूप से कमजोर करने की कोशिश का हिस्सा भी हो सकता है।
इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी ईरान के खिलाफ बेहद आक्रामक बयान दिए हैं। उन्होंने दावा किया कि हालिया संघर्ष में ईरान की सैन्य क्षमता को भारी नुकसान पहुँचा है। ट्रंप ने कहा कि ईरान की नौसेना लगभग तबाह हो चुकी है और उसके कई जहाज समुद्र में डूब गए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान की वायुसेना,मिसाइल भंडार और रडार सिस्टम गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं। ट्रंप के अनुसार ईरान की अधिकांश एंटी-एयरक्राफ्ट क्षमता खत्म हो चुकी है।
हालाँकि,ट्रंप के इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है,लेकिन उनके बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका अभी भी ईरान के खिलाफ दबाव की नीति अपनाए हुए है। इसके बावजूद अमेरिकी प्रशासन यह संकेत भी दे रहा है कि वह युद्ध को पूरी तरह लंबा खींचने के पक्ष में नहीं है। अमेरिकी मीडिया संस्थान सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका और ईरान एक छोटे समझौता ज्ञापन के करीब पहुँच रहे हैं,जिसका उद्देश्य मौजूदा संघर्ष को समाप्त करना है। रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया कि तेहरान जल्द ही मध्यस्थों के जरिए अपना जवाब सौंप सकता है।
यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि एक ओर बातचीत जारी है,वहीं दूसरी ओर दोनों देशों के बीच अविश्वास और सैन्य तनाव बना हुआ है। ट्रंप ने हाल ही में कहा था कि पिछले 24 घंटों में ईरान के साथ “बहुत अच्छी बातचीत” हुई है,लेकिन इसके साथ ही उन्होंने चेतावनी भी दी कि अगर ईरान किसी समझौते के लिए तैयार नहीं होता,तो अमेरिका फिर से बमबारी शुरू कर सकता है। इस बयान ने यह साफ कर दिया कि अमेरिका बातचीत और सैन्य दबाव दोनों को एक साथ इस्तेमाल कर रहा है।
ईरान के भीतर भी हालात तेजी से बदल रहे हैं। तेहरान समेत कई शहरों में लोग सड़कों पर उतर आए हैं और अपने नेतृत्व के समर्थन में रैलियाँ निकाल रहे हैं। बुधवार रात राजधानी तेहरान में हजारों लोगों की भीड़ जमा हुई। लोगों ने ईरानी झंडे लहराए,देशभक्ति गीत गाए और अमेरिका तथा इजरायल के खिलाफ नारे लगाए। प्रदर्शनकारियों के हाथों में ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की तस्वीरें भी देखी गईं।
रैली में शामिल लोगों का कहना था कि वे अपने देश और सेना के समर्थन में खड़े हैं। एक ईरानी महिला नाहल रहमतपुर ने मीडिया से बातचीत में कहा कि जब तक देश का नेतृत्व कहेगा,वे सड़कों पर बने रहेंगे और अपनी सशस्त्र सेनाओं का समर्थन करेंगे। उन्होंने कहा कि ईरानी जनता किसी भी बाहरी दबाव से डरने वाली नहीं है। रहमतपुर ने यह भी दावा किया कि अमेरिका दोबारा हमला करने की हिम्मत नहीं करेगा क्योंकि ईरान खुद एक बड़ी ताकत है।
ईरानी नागरिकों के इस प्रदर्शन को वहाँ की सरकार के लिए समर्थन के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों और लगातार सैन्य दबाव के बावजूद ईरान के भीतर राष्ट्रवाद और सरकार समर्थक भावनाएँ मजबूत होती दिखाई दे रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका की सैन्य कार्रवाइयों से ईरान में सरकार के खिलाफ असंतोष कम होने के बजाय कई बार राष्ट्रीय एकता मजबूत हो जाती है।
इस पूरे घटनाक्रम का असर वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। ओमान की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल हैं। यहाँ किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव तेल आपूर्ति और वैश्विक बाजारों को प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष और बढ़ता है,तो इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर पड़ेगा।
पश्चिम एशिया में पहले से ही इजरायल,हमास और अन्य क्षेत्रीय संघर्षों के कारण अस्थिरता बनी हुई है। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव पूरे क्षेत्र को और अधिक असुरक्षित बना सकता है। कई देशों ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है। संयुक्त राष्ट्र समेत कई अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने भी युद्ध जैसी स्थिति से बचने की जरूरत पर जोर दिया है।
हालाँकि,फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत किस दिशा में जाएगी। एक ओर दोनों देश समझौते की संभावना तलाश रहे हैं,वहीं दूसरी ओर समुद्र में सैन्य कार्रवाई और आक्रामक बयानबाजी यह संकेत देती है कि अविश्वास अब भी गहरा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ दिन बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं,क्योंकि इन्हीं दिनों में यह तय होगा कि दोनों देश युद्धविराम और समझौते की ओर बढ़ेंगे या फिर संघर्ष और तेज होगा।
फिलहाल दुनिया की नजरें तेहरान और वॉशिंगटन पर टिकी हुई हैं। वैश्विक समुदाय यह उम्मीद कर रहा है कि दोनों देश बातचीत के रास्ते पर आगे बढ़ेंगे और पश्चिम एशिया को एक बड़े युद्ध की आग में झोंकने से बचाएँगे।
