पुतिन का ट्रंप और जिनपिंग के साथ त्रिपक्षीय बैठक का प्रस्ताव (तस्वीर क्रेडिट@IranNewsAgency0)

रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म कराने के लिए पुतिन की बड़ी पहल,ट्रंप और शी जिनपिंग के साथ त्रिपक्षीय बैठक का प्रस्ताव

नई दिल्ली,19 अक्टूबर (युआईटीवी)- रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध को समाप्त कराने की दिशा में अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक गतिविधियाँ तेज होने के संकेत मिल रहे हैं। इसी बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ त्रिपक्षीय शिखर बैठक आयोजित करने का प्रस्ताव दिया है। इस संभावित बैठक का उद्देश्य रूस,अमेरिका और चीन के शीर्ष नेतृत्व को एक मंच पर लाकर युद्ध से जुड़े मुद्दों तथा व्यापक रणनीतिक संबंधों पर चर्चा करना हो सकता है। हालाँकि, अभी तक तीनों देशों के बीच इस बैठक को लेकर कोई अंतिम सहमति नहीं बनी है। यदि यह पहल आगे बढ़ती है,तो रूस-यूक्रेन संघर्ष के समाधान को लेकर उच्चस्तरीय बातचीत का नया रास्ता खुल सकता है।

अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार,पुतिन ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ फोन पर बातचीत के दौरान इस त्रिपक्षीय बैठक का विचार सामने रखा था। इस बातचीत में रूस से अमेरिका को डीजल की आपूर्ति से जुड़े संभावित समझौते पर भी चर्चा होने की बात कही गई है। इस घटनाक्रम को मॉस्को और वॉशिंगटन के बीच संवाद बढ़ाने तथा द्विपक्षीय संबंधों में सुधार की संभावनाओं से जोड़कर देखा जा रहा है। हालाँकि,बैठक के प्रस्ताव और ऊर्जा आपूर्ति से संबंधित बातचीत के संभावित परिणामों को लेकर अभी विस्तृत आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।

रूसी राष्ट्रपति की ओर से सामने आए इस प्रस्ताव को लेकर तीनों देशों की स्थिति अभी अलग-अलग स्तर पर है। रूस की ओर से इस तरह की बैठक की संभावना को लेकर सकारात्मक संकेत मिलने की बात कही जा रही है। दूसरी ओर,अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अभी तक प्रस्तावित शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए औपचारिक सहमति नहीं दी है। चीन की ओर से भी संकेत मिले हैं कि यदि अमेरिका इस पहल में शामिल होने के लिए तैयार होता है,तो बीजिंग इसमें भाग लेने पर विचार कर सकता है।

इस स्थिति से स्पष्ट है कि फिलहाल यह प्रस्ताव शुरुआती कूटनीतिक चर्चा के स्तर पर है। बैठक की तारीख, स्थान, भागीदारी और एजेंडे जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है। तीनों देशों के बीच सहमति बनने के बाद ही यह तय हो सकेगा कि बातचीत किस स्वरूप में आयोजित की जाएगी और उसमें किन मुद्दों को प्राथमिकता दी जाएगी।

रूस के लिए इस तरह की बैठक कई मायनों में महत्वपूर्ण हो सकती है। यूक्रेन के साथ युद्ध के कारण मॉस्को और पश्चिमी देशों के बीच संबंध लंबे समय से तनावपूर्ण बने हुए हैं। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ सीधी बातचीत और चीन की संभावित भागीदारी रूस को अपनी रणनीतिक प्राथमिकताएँ रखने का अवसर दे सकती है। हालाँकि,इस प्रस्ताव के पीछे रूस की वास्तविक मंशा और इससे युद्ध समाप्त करने की दिशा में कितनी प्रगति होगी,इसका आकलन बैठक के संभावित एजेंडे तथा संबंधित पक्षों की औपचारिक प्रतिक्रियाओं के बाद ही किया जा सकेगा।

रूस के राष्ट्रपति कार्यालय क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने प्रस्तावित बैठक के संबंध में कहा है कि फिलहाल इसके आयोजन और संभावित एजेंडे को लेकर कोई ठोस सहमति नहीं बनी है। उनके बयान से संकेत मिलता है कि इस विचार पर चर्चा की गुंजाइश मौजूद है,लेकिन इसे अभी तय कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

यदि रूस,अमेरिका और चीन के नेता एक साथ बैठक करते हैं,तो बातचीत का दायरा केवल रूस-यूक्रेन युद्ध तक सीमित रहने की संभावना नहीं होगी। तीनों देशों के बीच रणनीतिक संबंध,अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा,ऊर्जा सहयोग और वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियाँ भी चर्चा का हिस्सा बन सकती हैं। फिर भी,इन विषयों को लेकर अभी कोई आधिकारिक एजेंडा जारी नहीं किया गया है।

इस संभावित बैठक की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है,क्योंकि रूस,अमेरिका और चीन वैश्विक राजनीति की तीन प्रमुख शक्तियाँ हैं। इनके नेताओं के बीच सीधा संवाद अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर व्यापक चर्चा का अवसर प्रदान कर सकता है,लेकिन किसी बैठक का आयोजन अपने आप में युद्ध समाप्त होने की गारंटी नहीं है। इसके लिए रूस और यूक्रेन के बीच विवादित मुद्दों पर सहमति, सुरक्षा संबंधी चिंताओं का समाधान और किसी समझौते को लागू करने की व्यवस्था जैसे विषयों पर ठोस प्रगति आवश्यक होगी।

डोनाल्ड ट्रंप ने जनवरी 2025 में दूसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति पद सँभालने के बाद से रूस-यूक्रेन युद्ध समाप्त कराने के लिए कूटनीतिक प्रयासों पर जोर दिया है। उन्होंने कई अवसरों पर कहा है कि युद्ध को बातचीत के जरिए खत्म करने की कोशिश की जानी चाहिए। हालाँकि,संघर्ष को समाप्त करने के तरीके, दोनों पक्षों की शर्तों और संभावित समझौते की रूपरेखा को लेकर मतभेद बने हुए हैं।

इस दौरान ट्रंप ने यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की के रुख की भी कई बार आलोचना की है। अमेरिकी प्रशासन की ओर से युद्ध समाप्त करने के लिए बातचीत और समझौते की संभावनाओं पर जोर दिया जाता रहा है। इसके बावजूद रूस और यूक्रेन के बीच स्थायी शांति स्थापित करने की राह आसान नहीं दिखाई देती,क्योंकि दोनों पक्षों की मांगों और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बीच अंतर बना हुआ है।

ट्रंप की नीति में बातचीत को प्राथमिकता देने के साथ-साथ रूस पर दबाव और यूक्रेन को दी जाने वाली सहायता जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण रहे हैं। ऐसे में पुतिन के साथ प्रस्तावित त्रिपक्षीय बैठक का विचार अमेरिकी प्रशासन के सामने एक नया कूटनीतिक विकल्प पेश कर सकता है। हालाँकि,यह स्पष्ट नहीं है कि ट्रंप इस प्रस्ताव को स्वीकार करेंगे या युद्ध समाप्त कराने के लिए किसी अन्य प्रारूप में बातचीत को आगे बढ़ाना पसंद करेंगे।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने रविवार को अपने सोशल मीडिया मंच ‘ट्रुथ सोशल’ पर दावा किया कि रूस और यूक्रेन के बीच शांति वार्ता में प्रगति हो रही है। उन्होंने यूक्रेन की ओर से रूसी तेल रिफाइनरियों पर किए जा रहे हमलों की आलोचना भी की। ट्रंप के अनुसार,इन हमलों का प्रभाव अंतर्राष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ रहा है।

ट्रंप ने अपने बयान में बातचीत जारी रखने और युद्ध समाप्त कराने की इच्छा जाहिर की। उनके रुख से संकेत मिलता है कि वह ऐसे कदमों से बचना चाहते हैं,जिनसे रूस वार्ता की प्रक्रिया से पीछे हट जाए। अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए एक ओर शांति वार्ता को आगे बढ़ाना और दूसरी ओर अपने सहयोगियों के साथ संबंधों का संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है।

रूसी तेल रिफाइनरियों पर हमलों को लेकर ट्रंप की टिप्पणी ऊर्जा बाजार के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है। तेल उत्पादन और प्रसंस्करण से जुड़ी सुविधाओं पर हमलों के कारण आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका पैदा हो सकती है,जिसका असर वैश्विक बाजार में कीमतों पर पड़ सकता है। हालाँकि,कच्चे तेल की कीमतें केवल युद्ध से जुड़े घटनाक्रमों पर निर्भर नहीं करतीं। वैश्विक माँग,उत्पादन, आपूर्ति और अन्य अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियाँ भी इन पर प्रभाव डालती हैं।

ट्रंप ने अपने बयान में यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि यूरोपीय देशों और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के प्रशासन से आर्थिक सहायता मिलने के बावजूद यूक्रेनी नेतृत्व युद्ध समाप्त करने के लिए पर्याप्त इच्छाशक्ति नहीं दिखा रहा है। यह ट्रंप का राजनीतिक आकलन है। इस मुद्दे पर यूक्रेन का पक्ष और उसकी सुरक्षा संबंधी चिंताएँ भी महत्वपूर्ण हैं।

यूक्रेन के लिए किसी भी शांति समझौते में क्षेत्रीय अखंडता,राष्ट्रीय सुरक्षा और भविष्य में संभावित हमलों से बचाव जैसे विषय प्रमुख हो सकते हैं। दूसरी ओर,रूस की अपनी रणनीतिक और सुरक्षा संबंधी मांगें हैं। इन अलग-अलग प्राथमिकताओं के बीच सहमति बनाना ही शांति वार्ता की सबसे बड़ी चुनौती है।

ऐसे में यदि प्रस्तावित त्रिपक्षीय बैठक आयोजित होती है,तो यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या इसमें यूक्रेन की भागीदारी होगी और क्या युद्ध से सीधे प्रभावित देश की चिंताओं को बातचीत में पर्याप्त स्थान दिया जाएगा। केवल रूस,अमेरिका और चीन के बीच सहमति बनना संघर्ष के स्थायी समाधान के लिए पर्याप्त नहीं होगा। युद्ध समाप्त करने वाले किसी भी समझौते में रूस और यूक्रेन की सहमति तथा उसे लागू करने के लिए विश्वसनीय व्यवस्था की भूमिका निर्णायक रहेगी।

फिलहाल पुतिन के प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। अमेरिका की औपचारिक सहमति और चीन की भागीदारी को लेकर स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही इस पहल की वास्तविक दिशा सामने आएगी। यदि तीनों देशों के नेता बैठक के लिए तैयार होते हैं,तो यह युद्ध से जुड़े मुद्दों पर उच्चस्तरीय बातचीत का नया मंच बन सकती है। साथ ही,इससे रूस-अमेरिका संबंधों और वैश्विक रणनीतिक समीकरणों पर भी असर पड़ सकता है।

हालाँकि,कूटनीतिक बैठक और स्थायी शांति समझौते के बीच लंबी प्रक्रिया हो सकती है। इसके लिए युद्धविराम की शर्तें,विवादित क्षेत्रों का भविष्य,सुरक्षा गारंटी,प्रतिबंधों से जुड़े मुद्दे और समझौते की निगरानी जैसे विषयों पर सहमति आवश्यक होगी। इन सवालों का समाधान किए बिना केवल शीर्ष नेताओं की मुलाकात से संघर्ष खत्म होने की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी।

आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होना बाकी है कि ट्रंप और शी जिनपिंग पुतिन के प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाते हैं। फिलहाल इतना तय है कि रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर कूटनीतिक गतिविधियाँ जारी हैं और तीनों प्रमुख शक्तियों के बीच संभावित बातचीत पर नजर बनी हुई है। यदि प्रस्ताव आगे बढ़ता है,तो यह शांति प्रयासों को नई दिशा दे सकता है,लेकिन युद्ध का वास्तविक समाधान संबंधित पक्षों की सहमति और ठोस समझौते पर ही निर्भर करेगा।