काहिरा,23 फरवरी (युआईटीवी)- अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रहा परमाणु विवाद एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर पहुँचता नजर आ रहा है। दोनों देशों ने तमाम मतभेदों और बढ़ते सैन्य तनाव के बावजूद बातचीत जारी रखने का फैसला किया है। ओमान के विदेश मंत्री सैय्यद बद्र बिन हमद बिन हमूद अलबुसैदी ने पुष्टि की है कि अमेरिका-ईरान वार्ता का अगला दौर इस गुरुवार को जिनेवा में आयोजित होगा। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर कहा कि यह बैठक संभावित परमाणु समझौते को अंतिम रूप देने की दिशा में एक सकारात्मक कदम होगी। हालाँकि,कूटनीतिक स्तर पर उम्मीदें जताई जा रही हैं,लेकिन जमीनी हालात अब भी बेहद नाजुक बने हुए हैं।
ओमान ने एक बार फिर मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। इससे पहले भी मस्कट में दोनों देशों के बीच अप्रत्यक्ष बातचीत हो चुकी है। खबरों के अनुसार,पहली बातचीत 6 फरवरी को मस्कट में और दूसरी 17 फरवरी को जिनेवा में हुई थी। इन वार्ताओं का उद्देश्य 2015 के परमाणु समझौते के बाद पैदा हुए गतिरोध को खत्म करना और एक नए ढाँचे पर सहमति बनाना था। अब तीसरे दौर की बातचीत जिनेवा में होने जा रही है,जिससे यह संकेत मिलता है कि दोनों पक्ष संवाद की प्रक्रिया को जारी रखना चाहते हैं।
इस बीच ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरघची ने अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के प्रमुख राफेल ग्रॉसी से फोन पर बातचीत की। ईरान की आधिकारिक समाचार एजेंसी आईआरएनए के मुताबिक, इस चर्चा में “कंस्ट्रक्टिव एंगेजमेंट” और स्थायी परमाणु समझौते के लिए बातचीत को ही एकमात्र रास्ता बताया गया। यह बातचीत ऐसे समय हुई है जब क्षेत्र में सैन्य गतिविधियाँ बढ़ने की खबरें भी सामने आ रही हैं।
अराघची ने अमेरिकी मीडिया संस्थानों को दिए साक्षात्कार में कहा है कि तेहरान दो से तीन दिनों के भीतर एक संभावित परमाणु समझौते का प्रारूप तैयार कर अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल को सौंप सकता है। उन्होंने संकेत दिया कि जिनेवा में उनकी मुलाकात अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ से हो सकती है। अराघची ने कहा कि अब भी कूटनीतिक समाधान संभव है,बशर्ते दोनों पक्ष मूलभूत मुद्दों पर सहमति बनाएँ।
ईरान की ओर से स्पष्ट किया गया है कि किसी भी समझौते में उसके शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम को मान्यता दी जानी चाहिए। साथ ही,अमेरिका द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना भी अनिवार्य शर्त है। अराघची का कहना है कि ईरान अपने राष्ट्रीय परमाणु कार्यक्रम के तहत यूरेनियम संवर्धन के अधिकार से पीछे नहीं हटेगा,लेकिन वह यह सुनिश्चित करने को तैयार है कि उसका कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण रहे। उन्होंने यह भी दावा किया कि नया समझौता 2015 में हुए समझौते से बेहतर और अधिक व्यावहारिक हो सकता है।
2015 में ईरान और विश्व की छह प्रमुख शक्तियों के बीच जिस परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे, उसे आधिकारिक तौर पर संयुक्त व्यापक कार्य योजना कहा जाता है। इस समझौते के तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर कई प्रतिबंध स्वीकार किए थे,बदले में उस पर लगे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध हटाए गए थे। हालाँकि,बाद में अमेरिका के समझौते से बाहर होने के बाद स्थिति फिर बिगड़ गई और ईरान ने भी कई शर्तों का पालन करना कम कर दिया।
वर्तमान वार्ता में अमेरिका की शर्तें कहीं अधिक कठोर मानी जा रही हैं। वॉशिंगटन चाहता है कि ईरान न केवल यूरेनियम संवर्धन पर रोक लगाए,बल्कि अपने समृद्ध तत्वों का भंडार भी हटाए। इसके अलावा लंबी दूरी की मिसाइलों के विकास पर प्रतिबंध और क्षेत्रीय प्रॉक्सी समूहों को समर्थन समाप्त करने की माँग भी अमेरिकी पक्ष की प्राथमिकताओं में शामिल है। विश्लेषकों का मानना है कि इन शर्तों को स्वीकार करना ईरान के लिए राजनीतिक रूप से बेहद कठिन होगा।
कूटनीतिक प्रयासों के समानांतर सैन्य गतिविधियों ने भी चिंता बढ़ा दी है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक,अमेरिका ने हाल ही में जॉर्डन स्थित मुवफ्फाक साल्टी हवाई अड्डा पर बड़ी संख्या में फाइटर जेट और ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट तैनात किए हैं। यह तैनाती सामान्य स्तर से कहीं अधिक बताई जा रही है। जॉर्डन की राजधानी अम्मान से लगभग 100 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित यह एयर बेस मध्य पूर्व में अमेरिका के प्रमुख सैन्य ठिकानों में से एक है। क्षेत्र के अन्य अमेरिकी ठिकानों पर भी अतिरिक्त सैन्य संसाधनों की तैनाती की खबरें सामने आई हैं।
ईरान ने इस सैन्य तैयारी पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। अराघची ने स्पष्ट कहा कि यदि अमेरिका हमला करता है तो ईरान को अपनी रक्षा करने का पूरा अधिकार है। उन्होंने संकेत दिया कि क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने संभावित जवाबी कार्रवाई का निशाना बन सकते हैं। यह बयान दर्शाता है कि बातचीत की मेज पर बैठने के बावजूद दोनों पक्षों के बीच अविश्वास गहरा है।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन ने भी सोशल मीडिया पर कहा कि उनका देश क्षेत्र में शांति और स्थिरता के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि हालिया वार्ता में व्यवहारिक प्रस्तावों का आदान-प्रदान हुआ है और कुछ सकारात्मक संकेत मिले हैं,लेकिन ईरान अमेरिका की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी संभावित स्थिति के लिए सभी आवश्यक तैयारियाँ कर ली गई हैं।
एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि दोनों पक्षों को प्रतिबंध हटाने के लिए एक तार्किक समयसीमा तय करनी होगी। यह बयान संकेत देता है कि ईरान के लिए आर्थिक प्रतिबंधों का हटना सर्वोच्च प्राथमिकता है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ा है और यही वजह है कि तेहरान किसी भी समझौते में इस मुद्दे को केंद्रीय स्थान देना चाहता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जिनेवा वार्ता का यह दौर निर्णायक साबित हो सकता है। यदि दोनों पक्ष आधारभूत मुद्दों पर सहमति बना लेते हैं,तो एक प्रारंभिक ड्राफ्ट तैयार हो सकता है, जिससे व्यापक समझौते की दिशा में रास्ता खुलेगा,लेकिन यदि यूरेनियम संवर्धन,मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव जैसे मुद्दों पर गतिरोध बना रहता है,तो तनाव और बढ़ सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच यह कूटनीतिक रस्साकशी ऐसे समय में हो रही है,जब मध्य पूर्व पहले से ही कई संघर्षों से जूझ रहा है। जिनेवा में होने वाली बैठक से उम्मीदें तो बँधी हैं,लेकिन साथ ही सैन्य तैयारियों और सख्त बयानों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि हालात बेहद संवेदनशील हैं। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि क्या दोनों देश टकराव की राह छोड़कर स्थायी समझौते की दिशा में बढ़ पाते हैं या फिर क्षेत्र एक नए संकट की ओर बढ़ेगा।
